गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

श्रीविद्या साधना प्रणाली?.

क्या है तांत्रोत्क श्रीविद्या साधना प्रणाली?.
साधना के प्रकार;- 

यह साधना मुख्यतः दो प्रकार से की जाती है :-

प्रथम प्रकार में (दीक्षा लेकर):- 

1-श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा लेकर साधना संपन्न की जाती है, जिसका प्रथम चरण पूर्ण होने के बाद शेष तीन चरणों के लिए साधक स्वतन्त्र हो जाता है, और केवल कर्ता व दृष्टा मात्र होता है, क्योंकि प्रथम पद धर्म में स्थित होने के बाद के तीनों चरणों में पराम्बा द्वारा अपने साधक को स्वयं में लीन कर लेने तक की क्रिया को पराम्बा अपने साधक से स्वयं ही संपन्न कराती है, और इसी मध्य पराम्बा अपने साधक के सभी कर्मों को भी आंशिक रूप में भोगवाकर कर्मों के बंधन से निवृत कर देती है, क्योंकि मोक्ष के लिए कर्म बंधन से निवृत्ति परम अनिवार्य है ! 

2-इस प्रकार से शेष तीन चरण भी सहज ही संपन्न हो जाते हैं, और साधक को नियमों की बाध्यता भी प्रभावित नहीं करती है ! यह विधि सर्वोत्तम है क्योंकि इसमें एक बार प्रथम चरण किसी प्रकार पूर्ण होने के बाद साधक पर पराम्बा का स्वतन्त्र नियन्त्रण हो जाने के कारण पथभ्रष्ट, पतन व त्रुटि होने की सम्भावनाएं पुर्णतः शून्य हो जाती हैं ! 

3-किन्तु इस विधि से साधना करने वाले साधक को गुरुगम्य होना भी अनिवार्य होता है, तभी तो गुरु उस शिष्य की पात्रता व ग्राह्यता के आधार पर उसको गहन रहस्यों को समझाते हुए सफल होने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है !

दुसरे प्रकार में (दीक्षा अनिवार्य नहीं ) :-

1-उपरोक्त महाविद्या शक्तियों की बालरूपा से वृद्धा रूपा तक की चारों महाविद्याओं की एक-एक करके क्रमशः क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करते हुए साधना की जाती है, इसमें प्रत्येक अवस्था के अनुसार पृथक-पृथक नियमों की बाध्यता सहित साधना विधान पूर्ण करना 

पड़ता है ! 

2-यह अनिवार्य नहीं होता है कि चारों महाविद्याओं के पृथक-पृथक साधना विधान एक-एक या दो-दो बार में ही निर्बाध संपन्न हो जायेंगे! 

3-यदि यह क्रम पूर्ण हो जाए तब पराम्बा चतुर्थ चरण में अपने साधक के सभी कर्मों को भी आंशिक रूप में भोगवाकर कर्मों के बंधन से निवृत कर उसका मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है !

4-किन्तु चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले साधकों को अकेले किसी एक महाविद्या की साधना करके चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेने की भावना व आग्रह से सदैव दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि यदि आप केवल धर्म की सूचक बाल स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो धर्म के साथ-साथ आपके पास धन व सत्ता भी हो यह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि बाल स्वरुपा महाविद्या पुर्णतः धर्म ही सिखाती हैं ! 

5-और यदि आप केवल अर्थ की सूचक तरुण स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो थोड़ा सा धन हाथ में आते ही आप धर्म को कैसे भूल जाते हैं यह आपको स्वयं ही ज्ञात है, क्योंकि तरुण स्वरुपा महाविद्या अतिशय धन के मार्ग बनाती हैं ! 

6-इसी प्रकार से यदि आप केवल काम की सूचक प्रौढ़ा स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो थोड़ा सा धन ओर भले ही छोटा सा ग्राम प्रधान के रूप में थोड़ी सत्ता हाथ में आते ही आप धर्म, नीति ओर मानवता को कैसे भूल जाते हैं यह भी आपको स्वयं ही ज्ञात है, क्योंकि प्रौढ़ा स्वरुपा महाविद्या शासन सत्ता प्रदान करती हैं !

7- तो फिर ऐसे में कर्म बंधन से मुक्त हुए बिना चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति केवल दिवास्वपन से अधिक और कुछ नहीं है, किन्तु यदि धर्म की सूचक बाल स्वरुपा महाविद्या की उपासना व उसका अनुसरण करते हैं तो धर्म जनित संस्कार आपको मोक्ष मार्गी होने के लिए प्रेरित अवश्य ही करेंगे !

8-चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले साधकों को श्रीविद्या क्रम के सम्पूर्ण चारों क्रम की साधना को संपन्न करना चाहिए ! और इस प्रकार से किसी भी कुल में श्रीविद्या की चारों क्रम की पूर्ण साधना संपन्न कर चुका साधक धर्म से प्रारम्भ होकर मोक्ष तक निश्चित ही पहुँच जाता है, यह परम सत्य है !

श्रीविद्या साधना क्रम;-‘

`1-दस महा-विद्याओ’ में तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि वास्तव में आदि-शक्ति एक ही हैं, उन्हीं का आदि रुप ‘काली’ है और उसी रुप का विकसित स्वरुप ‘षोडशी’ है, इसी से ‘षोडशी’ को ‘रक्त-काली’ नाम से भी स्मरण किया जाता है । भगवती तारा का रुप ‘काली’ और ‘षोडशी’ के मध्य का विकसित स्वरुप है । प्रधानता दो ही रुपों की मानी जाती है और तदनुसार ‘काली-कुल′ एवं ‘श्री-कुल′ इन दो विभागों में दशों महा-विद्यायें परिगणित होती हैं ।

2-माँ की पूजाप्रधान रूप से चार स्वरूपों में होती है ।भगवती षोडशी के मुख्यतःचार रुप हैं ;–

( 1) श्री बाला त्रिपुर-सुन्दरी या श्री बाला त्रिपुरा,

( 2) श्री षोडशी या महा-त्रिपुर सुन्दरी तथा

( 3) श्री राज-राजेश्वरी

( 4)ललिता त्रिपुर-सुन्दरी या श्री श्रीविद्या

 3-माँ की दीक्षा और साधना भी इसी क्रम में करनी चाहिए। 

 3-1- श्री बाल सुंदरी >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म,

 3-2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ

 3-3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम

 3-4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष

4-श्री विद्या की प्रधान देवि ललिता त्रिपुर सुन्दरी है । यह धन, ऐश्वर्य भोग एवं मोक्ष की अधिष्ठातृ देवी है । अन्य विद्यायें को मोक्ष की विशेष फलदा है, तो कोई भोग की विशेष फलदा है परन्तु श्रीविद्या की उपासना से दोनों ही करतल-गत हैं ।

5-इसकी उपासना तंत्रों में अति रहस्यमय व गुप्त है तथा पूर्व जन्म के विशेष संस्कारों के बलवान होने पर ही इस विद्या की दीक्षा का योग माना है । साधक को क्रम-पूर्वक दीक्षा लेनी चाहिए तभी उत्तम रहता है । कहीं-कहीं ऐसा देखा गया है कि जिन्होंने क्रम-दीक्षा के बिना ललिता त्रिपुर सुन्दरी की उपासना सीधे की है, उन्हें पहले आर्थिक कठिनाईयाँ प्राप्त हुई है एवं बाद में उसका विकास हुआ ।

1-श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी साधना क्रम;-

1-‘श्री बाला’ का मुख्य मन्त्र तीन अक्षरों का है और उनका पूजा-यन्त्र ‘नव-योन्यात्मक’ है । अतः उन्हें ‘त्रिपुरा’ या ‘त्र्यक्षरी’ नामों से भी अभिहित करते हैं ।

2-श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:- 

ॐ - ऐं - क्लीं – सौः

रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। 

51 माला मंत्र 21 दिन तक लगातार जप अवश्य करें ।

3-मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर 

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2-षोडशी त्रिपुर सुंदरी साधना क्रम;-

1-ध्यान मंत्र;-

बालार्कायुंत तेजसं त्रिनयना रक्ताम्ब रोल्लासिनों। 

नानालंक ति राजमानवपुशं बोलडुराट शेखराम्।। 

हस्तैरिक्षुधनु: सृणिं सुमशरं पाशं मुदा विभृती। 

श्रीचक्र स्थित सुंदरीं त्रिजगता माधारभूता स्मरेत्।।

2-आवाहन मंत्र;-

ऊं त्रिपुर सुंदरी पार्वती देवी मम गृहे आगच्छ आवहयामि स्थापयामि।

रुद्राक्ष/कमल गट्टे की माला लेकर करीब नीचे लिखे मंत्र का जप करें 

3-पंचदशी मंत्र:-

ॐ क ए इ ल ह्रीं ।

ह स क ह ल ह्रीं। 

स क ल ह्रीं ॥

श्रावण मास में आराधना;-

1-श्रावण मास में शिव कृपा पाने के लिए भक्त कई तरह की पूजा करते हैं। इस दौरान यदि माता त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जाए, तो भक्त कई परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। मां त्रिपुर सुंदरी पार्वती का ही रूप हैं और इन्हें प्रसन्न करने का अर्थ है, शिव कृपा की प्राप्ति। यह मास पूजा-पाठ एवं शिव आराधना का महीना है। इस दौरान शिव जी की स्तुति करने से भक्तों के जीवन में खुशहाली आती है और उनके राह की बाधाएं भी दूर होती हैं। इस मास में शिव आराधना का काफी अधिक महत्व है।

2-दरअसल हमार जीवन एवं शरीर नौ ग्रहों से प्रेरित होता है। इन ग्रहों में चंद्रमा पृथ्वी के निकटस्थ होने की वजह से हमारे शरीर पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। चंद्रमा के स्वामी हैं, शिव। श्रावण ऐसा मास है, जिसमें वातावरण में अत्यधिक नमी होती है। यह सब चंद्रमा के प्रभाव की वजह से होता है। इसलिए इस मास में शिव को प्रसन्न करने का उपाय किया जाता है, ताकि उनकी कृपा से शिव कृपा से भी भक्त लाभान्वित हो जाएं।

3- अगर चंद्रमा की कृपा भक्तों पर हो जाए, तो हमें राजसी सुख मिल सकते हैं और यश भी मिलता है। अगर व्यापारिक क्षेत्रों में तरक्की चाहते हों, तो वे इस मास में किसी भी सप्ताह यह साधना कर सकते हैं। दस महाविधाओं में से एक महाविद्या त्रिपुर सुंदरी, राज राजेश्वरी, षोड्षी, पार्वती जी की सूक्ष्म साधना भी लाभप्रद साबित हो सकती है।

4-इस मास के लिए किसी भी सोमवार से अगले सोमवार तक साधना की जा सकती है। प्रात: से लेकर रात्रि तक जो भी समय सुविधापूर्ण लगे, उसमें साधना की जा सकती है। साधना काल के सप्ताह में मांस, मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। साथ ही अनैतिक कृत्यों से भी बचना चाहिए।

5-साधना आरंभ करने से पहले स्नान आदि कर शुद्ध होकर सफेद वस्त्र धारण करें। इसके बाद रेशमी या सफेद रंग के वस्त्र का आसन लें। एक सुपारी को कलावे से अच्छी तरह लपेटकर उसे एक थाली में सफेद वस्त्र के ऊपर रखें। अब देवी पार्वती का ध्यान करते हुए उनसे प्रार्थना करते हुए उनसे उस सुपारी में अपना अंश प्रदान करने की प्रार्थना करें। यह क्रिया ग्यारह बार करें। अब देवी का ध्यान, आवाहन मंत्र जपे।

6-इसके बाद देवी को सुपारी में प्रतिष्ठित कर दें। इसे तिलक करें और धूप-दीप आदि पूजन सामग्रियों के साथ पंचोपचार विधि से पूजन पूर्ण करें अब कमल गट्टे की माला लेकर उपरोक्त लिखे मंत्र का जप करें

7-जब मंत्र जप पूर्ण हो जाए, तो देवी जी से आज्ञा लेकर अपने द्वारा की गई गलतियों की क्षमा मांगकर पूजन कार्य समाप्त करें। यह प्रक्रिया लगातार सात दिनों तक करें। आठवें दिन खील, सफेद तिल, बताशे, चीनी और गुलाब के फूल, बेल पत्र को एक साथ मिलाकर 108 आहूतियों से हवन करें। हवन के लिए मंत्र के आगे ऊं नम: स्वाहा: जोड़कर मंत्रोच्चार करें।

8-साधना आरंभ करने से पहले यह संकल्प जरूर लें कि साधना का उद्देश्य क्या है और यथाशक्ति दान क्या होगा? इस साधना से आपकी कामना पूरी होगी और शिव कृपा भी मिलेगी। पूजा के बाद पूजन सामग्री को एक जगह इकट्ठा कीजिए और देवी से प्रार्थना करें कि वे अब अपने स्थान पर वापस जा सकती हैं। उन्हें धन्यवाद देते हुए साधना का विसर्जन करें। इसके बाद सारी पूजन सामग्री की माला ,प्रतिष्ठित सुपारी को आदरपूर्वक नदी में विसर्जित करें।

9-मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है ।

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3-श्रीराज-राजेश्वरी साधना क्रम;-

श्री राजराजेश्वरी महाविद्या का मूल स्वरूप और साधना विधान ;-

1-भगवती राजराजेश्वरी मूलप्रकृति शक्ति की सुन्दर प्रौढ़ावस्था स्वरूप श्री विग्रह वाली देवी हैं । उदय कालीन सूर्य के समान जिनकी कान्ति है, चतुर्भुजी, त्रिनेत्री, पाश, अंकुश, इक्षु (गन्ना) व पद्म की मुद्रा को धारण किये हुए हैं ।

2- ये भगवती सहज व शांत मुद्रा में सृष्टि संचालक ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र व इन्द्र रूपी चार स्तम्भों के ऊपर स्थित पंचमहाभूतों के संयुक्त स्वरूप शिव रूपी आधारपृष्ठ पर माया "ह"कार की मुद्रा में विराजमान होती हैं । जो जीव इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और कुबेर में कोई भेद नहीं रह जाता है । ललिता, राजराजेश्वरी, षोडशी, बाला, आदि इनकी विभिन्न अवस्थाओं नाम हैं ।

3-भगवती राजराजेश्वरी श्यामा और अरूण वर्ण के भेद से दो कही गयी है प्रथम श्यामा रूप में श्री आनन्दभैरवी, कहलाती हैं तथा द्वितीय अरूण वर्णा श्री राजराजेश्वरी कहलाती हैं ।

4-ये शक्ति तीनों लोकों के समस्त शासन, सत्ता, आदि राजसी सर्वैश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, इसलिए ये राजराजेश्वरी, कमला, महाराज्ञी व महासम्राज्ञी कहलाती हैं ।

5-भगवती राजराजेश्वरी इस सृष्टि के सर्वोच्च आध्यात्म साधना विधान "श्रीविद्या" समूह के अधीन तृतीय पुरुषार्थ "काम" की कुल भेद के अनुसार चार अधिष्ठात्रियों में से एक देवी हैं, व अखिल ब्रह्माण्ड के द्योतक श्रीचक्र में इनका निवास माना जाता है, जिस कारण इनको श्रीविद्या की देवी व श्रीचक्रराज निलया के रूप में भी जाना जाता है।

6-इनकी साधना (अर्थात जप, तप, आत्मसंधान, यज्ञ आदि के द्वारा परा या अपरा अवस्था में स्वयं को इनकी शक्ति में अथवा इनकी शक्ति को स्वयं में विलय करने की प्रक्रिया) प्रमुख रूप में निम्नलिखित दो प्रकार से की जाती है :-

1- महाविद्या साधना विधान :-

1-1-राजराजेश्वरी महाविद्या के रूप में पंचदशाक्षरी मन्त्रों से इनकी साधना की जाती है, महाविद्या रूप में इनकी साधना को संपन्न करने से इस साधना के परिणाम स्वरूप भगवती राजराजेश्वरी अपने महाविद्या साधक के जीवन को समस्त प्रकार के केवल भौतिक शासन, सत्ता, राज सुख, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, धन, धान्य, समृद्धि रत्न, पुत्र आदि सर्वैश्वर्यों से सम्पन्न कर देती हैं !

1-2-महाविद्या के रूप में इनकी साधना करने से केवल भौतिक सम्पन्नता की ही प्राप्ति होती है, जिस सम्पन्नता के मद में स्वार्थवश जीव अपनी मानवीय, धार्मिक, नैतिक व न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने से तनिक भी नहीं चूकता है ! अतः इस प्रकार से की जाने वाली साधना पुर्णतः भौतिक साधना होती है, जिसमें धर्म व आध्यात्म की उपस्थिति व लाभ अनिवार्य नहीं होता है, साधक स्वयं के प्रयास से स्वयं को मानवीय, धार्मिक, नैतिक व न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने से रोक कर आध्यात्मिक बना रह सकता है !

यह साधना मन्त्र भेद के अनुसार 11, 21 या 41 दिन में विधिवत् सम्पन्न कर ली जाती है !

2- श्रीविद्या साधना विधान :-

2-1-श्रीकुल की रीती से "श्रीविद्या पूर्णाभिषेक" में दीक्षित हुआ साधक अपनी श्रीविद्या साधना के अन्तर्गत श्रीविद्या के नियमानुसार "षोडशाक्षरी विद्या" द्वारा सबसे पहले प्रथम पुरुषार्थ "धर्म" की अधिष्ठात्री के रूप में बालस्वरुप व द्वितीय पुरुषार्थ "अर्थ" की अधिष्ठात्री की अधिष्ठात्री तरुण स्वरूपा की साधना सम्पन्न करने के उपरान्त तृतीय पुरुषार्थ "काम" की अधिष्ठात्री के प्रौढ़ स्वरूप में भगवती राजराजेश्वरी का ध्यान करते हुए इनकी साधना को सम्पन्न करता है !

2-2-साधक की यह साधना विधिवत् संपन्न हो जाने पर भगवती राजराजेश्वरी अपने श्रीविद्या साधक के निष्पाप "धर्म व अर्थमय" जीवन को "धर्म व अर्थ से परिपूर्ण काम" पुरुषार्थ प्रदान कर समस्त प्रकार के शासन, सत्ता, राज सुख, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, धन, धान्य, समृद्धि रत्न, पुत्र आदि सर्वैश्वर्यों से सम्पन्न कर उसके लिए शेष अन्तिम पुरुषार्थ "मोक्ष" पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर उसको अग्रिम साधना की ओर अग्रसारित करने के साथ ही उसकी साधना में "मोक्ष" पुरुषार्थ प्राप्त होने तक आध्यात्म मार्ग में स्वयं उसका पूर्ण मार्गदर्शन व सहयोग करती हैं ।

2-3-इस प्रकार से की गई साधना पूर्ण रूप से आध्यात्मिक साधना होती है, क्योंकि इस साधनाकाल में भगवती षोडशी द्वारा पहले ही श्रीविद्या साधक को "धर्म" में स्थित कर दिए जाने पर भगवती त्रिपुरसुन्दरी द्वारा "धर्म से परिपूर्ण अर्थ" पुरुषार्थ प्रदान किया जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप वाह्यान्तर से निष्पाप हो चुका व "धर्म से परिपूर्ण अर्थ व काम" से समृद्ध हुआ साधक नीति, धर्म, मानवता व न्याय के विपरीत कोई कर्म ही नहीं करता है !

2-4-श्रीविद्या साधना विधान "षोडशाक्षरी विद्या" के अन्तर्गत होने के कारण पृथक से किसी महाविद्या की दीक्षा नहीं लेनी होती है, केवल श्रीविद्या साधना विधान के अनुसार साधक के प्रथम व द्वितीय पुरुषार्थ "धर्म व अर्थ" में स्थित हो जाने पर यह साधना भगवती राजराजेश्वरी द्वारा स्वयं ही सम्पन्न करा ली जाती है !

2-5-इनकी उपासना (अर्थात विभिन्न प्रकार से पूजा, पाठ, अर्चना, यज्ञ, स्तोत्र, भक्ति, आदि के द्वारा इनको परा अवस्था में प्रसन्न (सिद्ध) कर मनोरथ सिद्ध करना, अथवा परा या अपरा अवस्था में स्वयं को इनकी शक्ति में अथवा इनकी शक्ति को स्वयं में विलय करने की प्रक्रिया) "महाविद्या" व "श्रीविद्या" दोनों ही विधान में दीक्षित हुए साधकों द्वारा श्रीचक्र (श्री यन्त्र) या नव योनी चक्र के केंद्र में प्रौढ़स्वरुप में की जाती है ।

2-6-भगवती राजराजेश्वरी अपने स्वभाव के अनुसार ही "महाविद्या" व "श्रीविद्या" दोनों ही विधान में दीक्षित होकर साधना पूर्ण कर चुके साधकों को शासन, सत्ता व राजसुख अवश्य ही प्रदान करती हैं !

2-7-जिस प्रकार जंगल की सूखी हुयी घास और पत्तियों को प्रचंड

अग्नि एक क्षण में जला देती है ठीक उसी प्रकार ये साधना पूर्व

जीवन और इस जीवन के सभी पापों को एक ही क्षण में समाप्त

कर भस्मीभूत कर देती है lये साधना तंत्र का आधारहै ,और इसके

बाद कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता हैl

2-8-इस साधना के प्रभाव से साधक सहस्रार से टपकते अमृत को

धारण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है ,और वही अमृत

उसके बिंदु के साथ मिलकर ओजस में परिवर्तित हो जाता है

तथा निर्जरा देह और पूर्ण ऐश्वर्य की प्राप्ति कराता है l

2-9-किसी भी शुक्ल पक्ष की पंचमी को इस साधना का प्रारंभ

किया जाता है , साधना के लिए , श्री यन्त्र की आवशयकता

होती है, श्वेत वस्त्र पहनकर मध्य रात्रि में इस साधना

का प्रारम्भ करे,पूर्ण भगवती राजराजेश्वरी की साधना

में सफलता हेतु श्वेत वस्त्र, आसन, श्वेत पुष्प और खीर

से भगवती और श्री यन्त्र का पूजन करे l ये शास्त्रोक्त पद्धति से पंचोपचार पूजन करने के बाद स्फटिक माला से राजराजेश्वरी मन्त्र की

१०८ माला जप करे,

2-10-दीपक शुद्ध घी का होना चाहिए और इस साधना क्रम को

७ दिनों तक संपन्न करना हैlइस साधना के प्रभाव से स्फटिक

माला विजय माला में परिवर्तित हो जाती हैlइस माला को पूरे

जीवन भर धारण करना हैlराज राजेश्वरी मंत्र में ग की ध्वनि आयेगीl

ये एक अद्विय्तीय साधना है ,जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन को

जगमगाहट से भरा जा सकता हैl

दिव्य भगवती राजराजेश्वरी मंत्र;-

1-''ॐ ऐं ह्रीं श्रीं''

AUM AING HREENG SHREENG

2-षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:-

''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥

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4-माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी आराधना;-

1-ललिता त्रिपुर सुंदरी या त्रिपुर सुंदरी को श्री विद्या भी कहा जाता है ,जो दस महाविद्या में से एक प्रमुख महाविद्या हैं और श्री कुल की अधिष्ठात्री |इन्हें ५१ शक्तिपीठों में भी स्थान प्राप्त है और कामाख्या को भी इनका स्वरुप कहा जाता है [यद्यपि कामाख्या को काली से भी जोड़ा जाता है ]|देवी ललिता आदि शक्ति का वर्णन देवी पुराण में प्राप्त होता है. भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिष में लिंगधारिणीनाम से विख्यात हुईं इन्हें ललिता देवी के नाम से पुकारा जाने लगा.
2-एक अन्य कथा अनुसार ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा जी द्वारा छोडे गये चक्र से पाताल समाप्त होने लगा. इस स्थिति से विचलित होकर ऋषि-मुनि भी घबरा जाते हैं, और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगती है. तब सभी ऋषि माता ललिता देवी की उपासना करने लगते हैं. उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी जी प्रकट होती हैं तथा इस विनाशकारी चक्र को थाम लेती हैं. सृष्टि पुन: नवजीवन को पाती है.
3-श्री ललिता जयंती पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है. पौराणिक मान्यतानुसार इस दिन देवी ललिता भांडा नामक राक्षस को मारने के लिए अवतार लेती हैं. राक्षस भांडा कामदेव के शरीर के राख से उत्पन्न होता है. इस दिन भक्तगण षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते है. इस दिन मां ललिता के साथ साथ स्कंदमाता और शिव शंकर की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है.

4-माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी रक्त काली स्वरूपा हैं।बृहन्नीला तंत्र के अनुसार काली के दो भेद कहे गए हैं कृष्ण वर्ण और रक्त वर्ण।महा विद्याओं में

कोई स्वरुप भोग देने में प्रधान है तो कोई स्वरूप मोक्ष देने में परंतु त्रिपुरसुंदरी अपने साधक को दोनों ही देती है। 

2-शुक्ल पक्ष के समय प्रात:काल माता की पूजा उपासना करनी चाहिए. कालिकापुराण के अनुसार देवी की दो भुजाएं हैं, यह गौर वर्ण की, रक्तिम कमल पर विराजित हैं. प्रतिदिन अथवा पंचमी के दिन ललिता माता के निम्न मंत्र का जाप करने का कुछ विशेष ही महत्व होता है।

माता ललिता का ध्यान धरकर उनकी प्रार्थना एवं निम्न 

मंत्र का जाप करने से मनुष्य सभी कष्टों से मुक्ति पा जाता है।

3-पंचमी के दिन इस ध्यान मंत्र से मां को लाल रंग के पुष्प, लाल वस्त्र आदि भेंट कर इस मंत्र का अधिकाधिक जाप करने से जीवन की आर्थिक समस्याएं दूर होकर धन की प्राप्ति के सुगम मार्ग मिलता है।

4-देवी ललिता जी का ध्यान रुप बहुत ही उज्जवल व प्रकाश मान है. ललिता देवी की पूजा से समृद्धि की प्राप्त होती है. दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को चण्डी का स्थान प्राप्त है. इनकी पूजा पद्धति देवी चण्डी के समान ही है।

5-ललिता माता का पवित्र मंत्र :-

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'

ध्यान मन्त्र से माँ को रक्त पुष्प , वस्त्र आदि चढ़ाकर अधिकाधिक जप करें।

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है। 

 IN NUTSHELL;-

श्रीविद्या साधना संसार की सर्वश्रेष्ठ साधनाओ मे से एक हैं।ध्यान के बिना केवल मन्त्र का जाप करना श्री विद्या साधना नही है।बिना ध्यान के केवल दस प्रतिशत का ही लाभ मिल सकता है।श्रीविद्या साधना में ध्यान का विशेष महत्व हैं। इसलिए पहले ध्यान का अभ्यास करे व साथ-साथ जप करे,अन्त मे केवल ध्यान करें।

साधना क्रम;-

1- श्री बाल सुंदरी >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म,

श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:-

ॐ - ऐं - क्लीं – सौः

मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर

2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ

 षोडशी त्रिपुर सुंदरी(पंचदशी) मंत्र:-

ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं ॥

मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है ।

3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम

षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:-

''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है।

 4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष

 ललिता माता का पवित्र मंत्र :-

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।' 

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

जानिए आपका कौनसा चक्र बिगडा है एवं उसको ठीक कैसे करें-

जानिए आपका कौनसा चक्र बिगडा है एवं उसको ठीक कैसे करें- 

(1) मूलाधार चक्र - गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन ,समृधि ,आत्मबल ,शारीरिक बल ,रोजगार ,कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग ,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार ,डिप्रेशन ,केंसर अदि होता है।
(2) स्वाधिष्ठान चक्र - इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुरियाँ हैं । इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता ,बाँझपन ,मंद्बुधिता ,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।
(3) मणिपूर चक्र - नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता ,गुस्सा ,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया ,दवावो का काम न करना ,अज्ञात भय ,चहरे का तेज गायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता ,हिंशा,दुश्मनी ,अपयश ,अपमान ,आलोचना ,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिरएवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।
(4) अनाहत चक्र - हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है । इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी , जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचनी,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत ,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी अदि ।
(5) विशुद्धख्य चक्र - कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष ,अभिब्यक्ति में कमी ,गले ,नाक,कान,दात, थाई रायेड,आत्मजागरण में बाधा आती है।
(6) आज्ञाचक्र - भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ '?' उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता ,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।
(7) सहस्रार चक्र - सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव ,भाग्य का साथ न देना आदि ।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

सूर्यदेव

#सूर्यदेव साधना।। रवि सप्तमी 8/2/2026 पर अवश्य करें 
       सुख सौभाग्य की वृद्धि के लिए, दुःख दारिद्र्‌य को दूर करने के लिए, रोग व दोष के शमन के लिए इस प्रभावकारी मंत्र की साधना रविवार के दिन करनी चाहिए।
         ॐ सूर्यदेवं नमस्तेस्तु गृहाणं करूणा करं। 
      अर्घ्यं च फलं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम्।। 
       ॐ सर्वतीर्थं समूदभूतं पाद्य गन्धदिभिर्युतम्। 
      प्रचंण्ड ज्योति गृहाणेदं दिवाकर भक्त वत्सलां।। 
                   दिव्यं गन्धाढ़्य सुमनोहरम् । 
          बिलेपनं रश्मिदाता चन्दनं प्रतिगृह यन्ताम्।

इस साधना में रविवार का व्रत अनिवार्य है। व्रत के दिन नमक का उपयोग न करें। रविवार के दिन खुले आकाश के नीचे पूर्व की ओर मुँह करके शुद्ध ऊन के आसन या कुशासन पर बैठकर काले तिल, जौ, गूगल, कपूर और घी मिला हुआ शाकल्य तैयार करके आम की लकड़ियों से अग्नि को प्रदीप्त कर उक्त मंत्र से एक 108आहुतियाँ दें।

मंत्र:-ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः श्रीम्। 
Om hreem ghrani sury aditya shreem. 
सुख सौभाग्य की वृद्धि के लिए, दुःख दारिद्र्‌य को दूर करने के लिए, रोग व दोष के शमन के लिए इस प्रभावकारी मंत्र की साधना रविवार के दिन करनी चाहिए।

तत्पश्चात सिद्धासन लगाकर इसी मंत्र का सौ बार जप करें। जप करते समय दोनों भौंहों के मध्य भाग में भगवान सूर्य का ध्यान करते रहें। इस तरह 11 दिन तक करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। इस साधना में रविवार का व्रत अनिवार्य है।

व्रत के दिन नमक का उपयोग न करें। इसके बाद प्रतिदिन स्नान के बाद ताम्र-पात्र में जल भरकर इसी मंत्र से सूर्य को अर्घ्य दें। जमीन पर जल न गिरे इसलिए नीचे दूसरा ताम्रपात्र रखें। तत्पश्चात इस मंत्र का एक 108बार जप करें।

भगवान सूर्य को नवग्रहों का राजा कहा गया है। जो मनुष्य सूर्य को12 नाम लेते हुए जल अर्पण करते हैं पाप मुक्त होते हुए आरोग्य प्राप्त करते हैं। 
 
                ।।सूर्य अष्टकम।। 
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। 
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥१॥

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥२॥

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥३ ॥

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥४ ॥

बृंहितं तेजसां पुञ्जं वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥५॥

बन्धूकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम् । 
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥६ ॥

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥७ ॥

तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम्। 
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥८॥

मात्र इतना स्तोत्र, मंत्र जप करने से आयुष्य, आरोग्य, ऐश्वर्य और कीर्ति की उत्तरोत्तर वृद्धि होती है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

अश्लेषा नक्षत्र शास्त्रीय, गणितीय एवं दार्शनिक विवेचन सहित"

"अश्लेषा नक्षत्र शास्त्रीय, गणितीय एवं दार्शनिक विवेचन सहित" 

✓•१. प्रस्तावना: वैदिक नक्षत्र–पद्धति भारतीय खगोल–ज्योतिष की अत्यन्त सूक्ष्म एवं गणितीय संरचना पर आधारित है। नक्षत्र केवल तारामण्डलीय खण्ड नहीं, बल्कि काल–चेतना, कर्म–विधान तथा मानसिक प्रवृत्तियों के गूढ़ संकेतक हैं। इन्हीं नक्षत्रों में अश्लेषा को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि यह बंधन, आवेष्टन, विष, रहस्य, गूढ़ बुद्धि तथा मानसिक ग्रन्थियों का प्रतिनिधि है।

अश्लेषा नक्षत्र को सामान्यतः “नाग–नक्षत्र” कहा गया है। यह नक्षत्र चेतना को बाँधने और मुक्त करने—दोनों की क्षमता रखता है। इस शोधप्रबंध में अश्लेषा नक्षत्र का वैदिक–शास्त्रीय, गणितीय–खगोलिक, फलित–ज्योतिषीय, नवांश–कर्मिक, तथा दार्शनिक स्तर पर चरणबद्ध विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।

✓•२. नक्षत्र–स्थान एवं गणितीय संरचना:

✓•२.१ राशि–नक्षत्र सम्बन्ध:
•अश्लेषा नक्षत्र कर्क राशि में स्थित है।
•कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा है।
•अतः अश्लेषा का मूल स्वभाव मानसिक, भावनात्मक एवं स्मृति–प्रधान होता है।

✓•२.२ खगोलीय सीमा (Ecliptic Longitude):
•अश्लेषा नक्षत्र की दीर्घांश सीमा:
कर्क १६°४०′ से कर्क ३०°००′ तक

∆इसे दशांश में व्यक्त करें तो—
•प्रारम्भ: १०६°४०′
•समाप्ति: १२०°००′
यह सीमा नक्षत्र–वृत्त के अंतिम भाग को दर्शाती है, जहाँ चन्द्रमा का ग्रन्थि–स्वरूप अत्यधिक सक्रिय हो जाता है।

✓•२.३ नक्षत्र–विस्तार गणना
•प्रत्येक नक्षत्र का विस्तार =
१३°२०′ (तेरह अंश बीस कला)
अश्लेषा भी इसी गणितीय मान पर स्थित है।

✓•३. वैदिक एवं शास्त्रीय प्रमाण:

✓•३.१ वैदिक सन्दर्भ:
अश्लेषा का सम्बन्ध सर्प–तत्त्व से है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में सर्प को गुप्त शक्ति एवं रहस्यमय चेतना का प्रतीक माना गया है।
अथर्ववेद में सर्प–विद्या को भय और रक्षा—दोनों का कारण कहा गया है।

✓•३.२ तैत्तिरीय संहिता का संकेत

"तैत्तिरीय संहिता","यजुर्वेद" में नागों को अन्तःस्थ शक्तियों का अधिष्ठाता कहा गया है—जो बन्धन भी देती हैं और मुक्ति भी।

 “नागा वै प्राणाः”
(नाग ही प्राण–शक्ति हैं)

यह कथन अश्लेषा की मूल दार्शनिक व्याख्या का आधार है।

✓•४. अश्लेषा नक्षत्र के अधिष्ठाता:

✓•४.१ देवता – नाग (सर्प)
•देवता: नाग
•प्रतीक: सर्प का कुण्डलित रूप
•तत्त्व: विष + औषधि
नाग का अर्थ केवल भौतिक सर्प नहीं, बल्कि कुण्डलिनी शक्ति से भी है।

✓•४.२ नक्षत्र–शक्ति (Shakti):
अश्लेषा की शक्ति –
 विष–प्रयोग द्वारा नियंत्रण एवं उपचार

अर्थात जो व्यक्ति को बाँध भी सकती है और उसी बन्धन से मुक्त भी कर सकती है।

✓•५. नक्षत्र–पाद (चरण) एवं नवांश गणना:
प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं, प्रत्येक का विस्तार:
•३°२०′ (तीन अंश बीस कला)

चरण नवांश राशि मानसिक प्रवृत्ति
प्रथम मेष आक्रामक बुद्धि
द्वितीय वृषभ संग्रहात्मक प्रवृत्ति
तृतीय मिथुन छल–युक्त वाणी
चतुर्थ कर्क भावनात्मक बन्धन

•यह गणना स्पष्ट करती है कि अश्लेषा के प्रत्येक चरण में बंधन की प्रकृति अलग–अलग प्रकार से कार्य करती है।

✓•६. फलित–ज्योतिषीय विश्लेषण:

✓•६.१ चन्द्रमा अश्लेषा में:
•तीव्र स्मरण–शक्ति
•मानसिक चातुर्य
•रहस्यप्रियता
भावनात्मक नियंत्रण की प्रवृत्ति

✓•६.२ लग्न या दशा में अश्लेषा:
व्यक्ति मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने में सक्षम
गुप्त रणनीति
तांत्रिक, औषधीय, विष–विज्ञान या गूढ़ विषयों में रुचि

✓•७. अश्लेषा एवं कर्म–बंधन:
अश्लेषा नक्षत्र को कर्म–ग्रन्थि कहा गया है।
यह नक्षत्र—
•पूर्वज–ऋण
•मानसिक संस्कार
•वाणी से उत्पन्न कर्म
को सक्रिय करता है।

यदि अश्लेषा पीड़ित हो, तो व्यक्ति स्वयं के ही जाल में फँसता है।

✓•८. अश्लेषा नक्षत्र एवं आयुर्वेद:
आयुर्वेद में विष को भी औषधि माना गया है—

 “विषमेव अमृतं भवेत्”

अश्लेषा इसी सिद्धान्त का ज्योतिषीय रूप है।
इस नक्षत्र में जन्मा व्यक्ति—
•विष–औषधि
•मनोचिकित्सा
•हर्बल–टॉक्सिन अध्ययन
में दक्ष हो सकता है।

✓•९. तांत्रिक एवं दार्शनिक पक्ष:
अश्लेषा नक्षत्र का सीधा सम्बन्ध—
•कुण्डलिनी
•नाग–साधना
•मन्त्र–गोपनीयता
से है।

∆यह नक्षत्र बताता है कि—
• बंधन ही मुक्ति का द्वार है।

✓•१०. दोष, शान्ति एवं उपाय:

✓•१०.१ अश्लेषा दोष के लक्षण:
•मानसिक भय
•अवसाद
•वाणी–दोष
•गुप्त शत्रु

✓•१०.२ शान्ति उपाय:
•नाग–पूजन
•चन्द्र शान्ति
•दुग्ध–अभिषेक
•मौन–व्रत
विशेषतः कर्क मास एवं श्रावण में उपाय प्रभावी माने गए हैं।

✓•११. गणितीय निष्कर्ष:
यदि चन्द्रमा की औसत दैनिक गति १३°१०′३५″ मानी जाए, तो—
अश्लेषा में चन्द्रमा का औसत प्रवास ≈ एक दिन
यह नक्षत्र क्षणिक लेकिन तीव्र कर्म–फल देता है।

✓•१२. उपसंहार:
अश्लेषा नक्षत्र केवल भय या विष का प्रतीक नहीं, बल्कि गहन चेतना–परिवर्तन का द्वार है।
यह नक्षत्र बताता है कि—
जो बाँधता है, वही मुक्त करता है।
जो विष है, वही औषधि बन सकता है।
अतः अश्लेषा को समझना, स्वयं के मानसिक बन्धनों को समझने के समान है।

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

भगवान विष्णु

★★★भगवान विष्णु ★★★

   √● (१) विष्णु का स्वरूप विष्णु क्या हैं ?- विष्णु का अर्थ है- 'वेवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णुः' जो सर्वत्र व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। वह व्यापनशील तत्त्व जो संसार के कण-कण में व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। यह विष्णु सर्वव्यापक, विश्वात्मा और सर्व नियन्ता है। इसके दो रूप हैं- एक सूक्ष्म सत्ता या वामनरूप (Microcosm), इस रूप में यह अणु या परमाणु (Atom) है। इसका दूसरा रूप है- विराट् सत्ता या बृहत् रूप (Macrocosm), इस रूप में यह ब्रह्माण्ड या संसार (Universe) है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि जो विष्णु है, वही वामन है, अर्थात् विष्णु और वामन एक ही तत्व हैं। 

"वामनो ह विष्णुरास।"
  (शत०१.२.५.५)

√● विष्णु के अणुरूप या अणिमा को वामन कहते हैं और विस्तृत या व्याप्तरूप को भूमा (भूमन्) कहते हैं। यह बीजरूप में अणु या परमाणु (Atom) है। यही विराट् रूप में सृष्टि, ब्रह्माण्ड या संसार है। इस सृष्टि का निर्माण जिस आधार पर हुआ है, वह आधार या ईंट रूप तत्त्व परमाणु है। परमाणु के मध्य में एक धन विद्युत् (Positive) का बिन्दु है, इसे केन्द्र या न्यूक्लियस (Nucleus) कहा जाता है। इसका व्यास एक इंच के दस लाखवें भाग का भी दस लाखवां भाग माना जाता है। परमाणु के अस्तित्व का सार इसी केन्द्र या हृदय भाग में माना जाता है। इसी केन्द्र के चारों ओर लाखों अतिसूक्ष्म विद्युत्- कण चक्कर काटते हैं। ये ऋण विद्युत्-प्रधान (Negative) होने के कारण इलेक्ट्रान (Electron) कहे जाते हैं। ये इलेक्ट्रान केन्द्र से अत्यन्त आकृष्ट हैं और केन्द्र से मिलने के लिए आतुर रहते हैं । अतएव ये केन्द्र के चारों ओर चक्कर काटते रहते हैं।

√●● विज्ञान ने सूक्ष्म (वामन अणु) और विराट् (भूमा) के संबन्ध और कार्यविधि पर विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जो नियम और विधि परमाणु में कार्य कर रही है, वही नियम और विधि ब्रह्माण्ड में भी काम करती है। अतएव कहा गया है कि- 

"यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे।"

  √● अर्थात् जो नियम पिण्ड (अणु) में कार्य कर रहे हैं, वे ही ब्रह्माण्ड में भी चल रहे हैं। इन शाश्वत नियमों को वैदिक भाषा में 'ऋत' (Eternal laws) कहते हैं। इस प्रकार विज्ञान की दृष्टि में भी अणु और ब्रह्माण्ड की रचना में कार्यविधि की दृष्टि से एकरूपता है। इसी विचार से भारतीय मनीषियों ने विष्णु को एक ओर 'अणोरणीयान्' (सूक्ष्म से सूक्ष्मतर) कहा और दूसरी ओर 'महतो महीयान्' (बड़े से बड़ा) कहा है।

√● विष्णु के तीन पग- वेदों के अनेक मंत्रों में विष्णु के तीन पगों (पैरों, चरणों) का उल्लेख मिलता है।

"इदं विष्णुर्वि चक्रमे, त्रेधा निदधे पदम् ।
 समूढमस्य पांसु ।।"
  ( ऋग्० १.२२.१७ । यजु० ५.१५ । अथर्व० ७.२६.४ । साम० २२२)

√● मंत्र का अभिप्राय है कि विष्णु ने पराक्रम किया और उसने तीन पद (पैर, पग) रखे । उसके धूलियुक्त पैरों में सारा संसार व्याप्त है। 

√●विष्णु के तीन पगों की अनेक प्रकार से व्यवस्था की गई है। संसार की दृष्टि से विष्णु के तीन पग हैं- द्यु, अन्तरिक्ष और भूलोक । गुणों की दृष्टि से द्युलोक सात्त्विक है, अन्तरिक्ष राजस और भूलोक (पृथ्वी) तामस है। जीवन की दृष्टि से तीन पग है- आदि, मध्य और अन्त । जन्म, विकास और मृत्यु । सूर्य का उदय होना, मध्याह्न और सायंकाल ये विष्णु (सूर्य) के तीन पग हैं। इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु का आदि, मध्य और अन्त है। इन तीन पगों में जीवन की समग्रता आ जाती है। 

√●मंत्र में 'पांसुरे' (धूलियुक्त) शब्द विचारणीय है। पांसु (धूल, रज) शब्द संकेत करता है कि अणु का स्वरूप कण-रूप है। यह तेजोमय कण है, जो तीन तत्त्वों- प्रोटान (Proton, धनात्मक विद्युत्), इलेक्ट्रान (Electron, ऋणात्मक विद्युत् ) और न्यूट्रान (Neutron, उदासीन) का संमिलित रूप है। इनमें प्रोटॉन प्रेरक तत्त्व है। यह गति और प्रेरणा देता है। इलेक्ट्रान प्रेरित होने वाला तत्त्व है। इसमें प्रेरणा होती है, गति होती है और वस्तु का विकास होता है। न्यूट्रान यह उदासीन तत्त्व है। यह आश्रय, आधार या स्थिति- स्थापक है । इसकी सत्ता से ही उक्त दोनों की स्थिति है। गणित की दृष्टि से इन्हें क्रमशः घन (Plus+), ऋण (Minus) और शून्य (Zero, ०) कह सकते हैं। 

√◆◆पृथ्वी के सात धाम- ऋग्वेद का कथन है कि पृथिवी के सात धाम हैं। उनके आधार पर विष्णु अपना पराक्रम करता है। वहाँ से सारे देव हमारी रक्षा करें। 

"अतो देवा अवन्तु नो, यतो विष्णुर्विचक्रमे ।
 पृथिव्याः सप्त धामभिः ।।"
   ( ऋग्० १.२२.१६)

√● पृथिवी के सात धाम कौन से हैं, जहाँ से विष्णु का पराक्रम प्रारम्भ होता है। पृथिवी के सात धाम से अभिप्राय है- पृथिवी के सात परत, तह (Layers, Strata) । पृथ्वी के नीचे सात परत या तह हैं। पृथिवी की सबसे मोटी परत पहली परत है। इसके नीचे पत्थर या चट्टानों की परत है। उससे नीचे जल, अग्नि, गैस, आदि की परत हैं। अन्त में सातवीं परत में नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) है। यह नाभिकीय ऊर्जा ही पृथिवी को निरन्तर घुमा रही है। नाभिकीय ऊर्जा सहित सातों परत विष्णु के स्थान हैं। सर्वत्र विष्णु व्याप्त है। विष्णु का पराक्रम सातों धाम और मुख्य रूप से नाभिकीय ऊर्जा से प्रारम्भ होता है। इसी से पृथ्वी का रक्षण, संरक्षण, पालन-पोषण होता है। पृथिवी की सारी ऊर्जा का श्रेय विष्णु को है। यदि नाभिकीय ऊर्जा का संरक्षण प्राप्त न हो तो पृथिवी मरुस्थल बन जाएगी। 

√●●विष्णु और वरुण सारे लोकों के धारक- यजुर्वेद के एक महत्त्वपूर्ण मंत्र में कहा गया है कि विष्णु और वरुण के प्रताप से ही सारे लोक रुके हुए हैं। ये दोनों देव सबसे अधिक वीर और पराक्रमी हैं। ये सबसे अधिक बली हैं। इनको किसी अन्य के सहयोग की आवश्यकता नहीं है। ये सबके स्वामी हैं, अतएव इनका सबसे पहले आह्वान किया जाता है । 

"ययोरोजसा स्कभिता रजांसि वीर्येभिर्वीरतमा शविष्ठा । 
या पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन् वरुणा पूर्वहूतौ ।।"
     ( यजु० ८.५९ )

√●लोकों की स्थिरता के लिए दो तत्त्वों की अनिवार्य आवश्यकता है। वे हैं- अग्नि और सोम । सारा संसार अग्नि और सोमीय तत्त्वों के मिश्रण से बना है। अतएव बृहत् जाबाल उपनिषद् में कहा गया है कि- 

"अग्नीषोमात्मकं विश्वम् ।"
     ( बृहत्० उप० २.२)

" अग्नीषोमात्मकं जगत् ।"
    ( बृहत्० उप० २.३)

√● विष्णु नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) होने से अग्नि या आग्नेय तत्त्व है और वरुण सोम या सोमीय तत्त्व है, अतः ये दोनों लोकों के निर्माता, रक्षक और स्थिरता के कारण हैं। इन दोनों की महिमा अपार है। इन्हें किसी अन्य की सहायता और सहयोग अपेक्षित नहीं है। अतएव मंत्र में कहा गया है कि इनकी शक्ति से सारे लोक स्थिर हैं। 

√●विष्णु के सहयोगी वरुण और अश्विनी ऋग्वेद का कथन है कि विष्णु के कार्य को वरुण और अश्विनी अपना सहयोग देकर पूरा करते हैं। विष्णु अपने मित्रों के सहयोग से अंधकार को दूर करता है और प्रकाश फैलाता है। 

"तमस्य राजा वरुणस्तमश्विना, 
क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः ।
 दाधार दक्षमुत्तममहर्विदं, 
व्रजं च विष्णुः सखिवाँ अपोर्णुते ।"
     ( ऋग्० १.१५६.४ )

√●शरीर-संरचना की दृष्टि से विष्णु मेरुदण्ड (Spinal Cord) है। यह उदासीन (Neutral) है। इसमें बहने वाला सोमरस या द्रव (Cerebro- spinal fluid ) है। यह वरुण है। मेरुदंड के दोनों ओर विद्यमान Afferent और Efferent herves ही अश्विनीकुमार रूपी गुगल है । मंत्र का कथन है कि वरुण और अश्विनी के सहयोग से ही विष्णु अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करके मस्तिष्क को ज्ञानरूपी प्रकाश देता है।

√●भौतिकविज्ञान की दृष्टि से विष्णु का अर्थ सूर्य है। सूर्य की किरणों को अश्विनी अर्थात् Electro-magnetic waves पृथिवी तक लाते हैं। वरुण अर्थात् Electron का इसमें सहयोग रहता है। इस प्रकार विष्णु (सूर्य) पृथिवी के अंधकार को दूर करके भूमंडल पर प्रकाश फैलाता है।

√● विष्णु का वृत्त - ऋग्वेद का कथन है कि विष्णु संसार में एक वृत्त (Circle, Circumference) या परिधि के रूप में है। इसके ९०° अंश वाले ४ भाग हैं अर्थात् ९०x४= ३६०° अंश की पूरी परिधि है। विष्णु 'युवा कुमार' है अर्थात् नित्य युवा है और 'बृहत्-शरीरः' बड़े शरीर अर्थात् विराट् रूप में इस वृत्त में विद्यमान है और उसी से कालचक्ररूपी यज्ञ को चला रहा है। 

"चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभि श्चक्रं न वृत्तं व्यतींरवीविपत् ।
 बृहच्छरीरो विभिमान ऋक्वभिर्युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम् ।।"
      ( ऋग्० १.१५५.६)

√● इसका अभिप्राय यह है कि विष्णु विराट् रूप में परिधि (घेरे) की तरह इस पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है । सारा संसार उस घेरे में आ जाता है। ऐसी कोई चीज नहीं है जो वृत्त या घेरे से बाहर हो । इस वृत्त (घेरे) के ९०° अंश वाले चारों भाग हैं अर्थात् ९०x४= ३६०° अंश इस वृत्त के हैं। विष्णु नित्य युवा या तरुण है। यह ब्रह्माण्ड उसका विशाल शरीर है। इस परिधि-रूपी वृत्त से यह कालचन्द्ररूपी यज्ञ सदा चल रहा है।

√★★★ (२) विष्णु का जीव वैज्ञानिक स्वरूप प्रो० रेले (V.G. Rele) ने जीव-विज्ञान की दृष्टि से विवेचन करते हुए यह निष्कर्ष दिया है कि विष्णु पृष्ठवंश या मेरुदण्ड (Spinal Cord) है। विष्णु के विषय में त्रिविक्रम या तीन पग चलना आदि जो बातें कही गई हैं, वे मेरुदण्ड मानने पर सरलता से स्पष्ट हो जाती हैं। 

     √★मनुष्य आदि सभी पृष्ठधारी जीवों में मेरुदण्ड गर्भ में सर्वप्रथम पूर्त रूप लेता है। उसके बाद अन्य अवयवों का प्रादुर्भाव होता है। विष्णु को पृथिवी का धारक माना जाता है। मेरुदंड ही शरीर के सभी अंगों और मांसपेशियों आदि को धारण करता है। यह भूतल या शरीर का सबसे नीचे का भाग है, अतएव इसको विष्णु का प्रथम पग माना जाता है। इसका कार्य है- शरीर की सभी संवेदनाओं का आदान-प्रदान। यह ज्ञानतन्तुओं (Afferent Nerves) के द्वारा संवेदनाओं को ग्रहण करता है और क्रियातन्तुओं (Efferent) के द्वारा उसे कार्यान्वित करता है। मेरुदण्ड में ज्ञान और क्रियात तुओं का जाल बिछा हुआ है। ये तन्तु (Nerves) मेरुदण्ड के दोनों ओर फैले हुए हैं। ज्ञानतन्तुओं से सूचना प्राप्त करना और क्रियातन्तुओं से तदनुसार कार्य करने की प्रेरणा देना इनका कार्य है।

√★मेरुदण्ड के विविध केन्द्र परस्पर जुड़े हुए हैं। ये जब तक पूर्ण विकसित नहीं हो जाते हैं, तब तक बच्चे में इन दोनों प्रकार के तन्तुओं से ही बालक में जीवन-प्रणाली काम करती है। इसके बाद जब भ्रूण विकसित अवस्था में आता है तो इसका संबन्ध केन्द्रीय तन्त्री- जाल (Central Nervous System) से होता है। अब केन्द्रीय तन्त्री-जाल दो प्रकार से कार्य करता है। प्रथम है- बाहर से ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा सूचनाएं प्राप्त करना । यह ज्ञानतन्तुओं (Afferent nerves) का काम है। ये जो सूचनाएं प्राप्त करती हैं, उन्हें ऊपर केन्द्रीय नाडी जाल को भेजती हैं और केन्द्रीय नाडीजाल उन पर अपना निर्णय कार्यतन्तुओं (Efferent) के द्वारा नीचे भेजता है। ज्ञानतन्तुओं की गति धीमी है। ये आसपास के विभिन्न केन्द्रों को उत्तेजित करते हैं और उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे क्रियातन्तुओं को प्रेरित करें कि वे तदनुकूल कार्य करें। क्रियातन्तुओं की गति तीव्र है । 

√★अब ज्ञानतन्तुओं और क्रियातन्तुओं का क्षेत्र बढ़कर मेडुला ऑब्लोंगाटा (Medulla Oblongata) तक हो जाता है। मेडुला ऑब्लोंगाटा बृहत् मस्तिष्क का सबसे नीचे का भाग है। यह मस्तिष्क और मेरुदण्ड के बीच मध्यस्थता का काम करता है। इसका ऊपर संबन्ध बृहत् मस्तिष्क से है और नीचे मेरुदण्ड से। यह मानवशरीर का मध्य या अन्तरिक्ष है। यह विष्णु का द्वितीय पग (Step) है। इसके ऊपर बृहत् मस्तिष्क विष्णु का तृतीय पग माना जाता है। इसको ही मानवशरीर में द्युलोक कहा जाता है। भूरे कण (Grey matter) ज्ञानतन्तु का कार्य करते हैं और श्वेत कण (White matter) क्रियातन्तु का काम करते हैं।

√★ मेडुला ऑब्लोंगाटा के बाद ज्ञानतन्तु थेलमस (Thalamus) तक पहुंचते हैं। थेलमस बृहत् मस्तिष्क के मध्य में स्थित है। यह भूरे कणों का केन्द्र है। थेलमस के द्वारा ही ज्ञानतन्तु बृहत् मस्तिष्क के दोनों भागों तक पहुंचते हैं। थेलमस बृहत् मस्तिष्क के निचले भाग में स्थित है। यहाँ तक विष्णु के द्वितीय पग अर्थात् अन्तरिक्ष का क्षेत्र है । इसके ऊपर द्युलोक अर्थात् बृहत् मस्तिष्क है । द्युलोक या बृहत् मस्तिष्क को अदृश्य बताया गया है। इसका अभिप्राय है कि जो ध्यानी या योगी जन हैं, वे ही इसके क्रिया- कलाप का साक्षात् ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं। 

√★इस प्रकार जीवविज्ञान की दृष्टि से विष्णु के तीन पग क्रमशः नीचे भूलोक से अन्तरिक्ष और अन्तरिक्ष से द्युलोक को जाते हैं। यह विष्णु (मेरुदण्ड) का क्रमिक ऊर्ध्वारोहण है । ये तीन पग ज्ञान तन्तुओं के तीन प्रसारण केन्द्र (Relay stations) समझने चाहिएं । 

√★थेलमस को जीव-विज्ञान की दृष्टि से अग्नि देवता कहा जाता है और बृहत् मस्तिष्क को इन्द्र देवता । इस प्रकार विष्णु, अग्नि और इन्द्र देव संबद्ध हैं और इनका परस्पर आदान-प्रदान है।

"आर्द्रा नक्षत्र"

"आर्द्रा नक्षत्र" 

✓•१. भूमिका: वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों की अवधारणा केवल खगोलीय विभाजन नहीं, अपितु काल, कर्म और चेतना के सूक्ष्म गणित का प्रत्यक्ष निरूपण है। प्रत्येक नक्षत्र निश्चित अंशात्मक परिमाण, चरणात्मक संरचना तथा दार्शनिक अर्थ से संयुक्त होता है। आर्द्रा नक्षत्र इस दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह परिवर्तन, विदारण, दुःख-जन्य बोध तथा नवसृष्टि का नक्षत्र है।

पूर्व प्रस्तुति में नक्षत्र-चरण (पाद) तथा गणितीय मानों का अभाव था। अतः इस शोधप्रबंध में आर्द्रा नक्षत्र का पूर्ण खगोलीय–ज्योतिषीय गणित, चरण-विभाजन, नवांश-संबंध, राशि-अंश, तथा शास्त्रीय प्रमाणों सहित क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।

✓•२. आर्द्रा नक्षत्र : नाम-व्युत्पत्ति एवं निरुक्तीय अर्थ
‘आर्द्रा’ शब्द संस्कृत धातु अर्द् से निष्पन्न है।

∆निरुक्त (यास्क) के अनुसार—

 “अर्दनात् द्रवणात् च आर्द्रा।”

•अर्थात् जो द्रवण, पीड़ा या विदारण के कारण आर्द्रता उत्पन्न करे, वही आर्द्रा है।
यह आर्द्रता केवल भौतिक जल नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक द्रवण का प्रतीक है।

✓•३. खगोलीय एवं गणितीय संरचना (Astronomical & Mathematical Framework):

✓•३.१ नक्षत्र का कुल परिमाण:

∆वैदिक सिद्धान्त के अनुसार—
•सम्पूर्ण राशि-चक्र = ३६० अंश
•कुल नक्षत्र = २७
•एक नक्षत्र का मान =
३६० ÷ २७ = १३ अंश २० कला

∆अतः—
•१ नक्षत्र = १३°२०′

✓•३.२ आर्द्रा नक्षत्र के अंशात्मक मान:
आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में स्थित है।
•मिथुन राशि का आरम्भ = ६० अंश
•आर्द्रा का आरम्भ = ६°४०′ मिथुन
•आर्द्रा का अन्त = २०°००′ मिथुन

∆गणितीय रूप से—
•६°४०′ = ६ + (४० ÷ ६०) = ६.६६… अंश
•२०°००′ = २० अंश

∆अतः आर्द्रा का क्षेत्र =
६°४०′ से २०°००′ (मिथुन राशि)

✓•४. आर्द्रा नक्षत्र के चरण (पाद) : पूर्ण गणितीय विवेचन
•प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण (पाद) होते हैं।
•१ चरण = ३°२०′
•३°२०′ = ३ + (२० ÷ ६०) = ३.३३… अंश

✓•४.१ प्रथम चरण (पाद):
•सीमा : ६°४०′ – १०°००′ मिथुन

∆गणित :
६°४०′ + ३°२०′ = १०°००′
•नवांश राशि : मेष
•नवांश स्वामी : मंगल

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण तीव्र, उग्र, साहसी, विद्रोही एवं कर्मप्रधान होता है। जातक में रुद्र का उग्र स्वरूप प्रधान रहता है।

✓•४.२ द्वितीय चरण (पाद):
•सीमा : १०°००′ – १३°२०′ मिथुन
•नवांश राशि : वृषभ
•नवांश स्वामी : शुक्र

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण आर्द्रा की कठोरता में स्थायित्व, भोग, कला एवं आकर्षण जोड़ता है। मानसिक द्वन्द्व अधिक होता है।

✓•४.३ तृतीय चरण (पाद):
•सीमा : १३°२०′ – १६°४०′ मिथुन
•नवांश राशि : मिथुन
•नवांश स्वामी : बुध

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण बौद्धिकता, तर्क, विज्ञान, लेखन, शोध एवं भाषिक क्षमता को प्रबल करता है। आर्द्रा का दार्शनिक रूप यहाँ स्पष्ट होता है।

✓•४.४ चतुर्थ चरण (पाद):
•सीमा : १६°४०′ – २०°००′ मिथुन
•नवांश राशि : कर्क
•नवांश स्वामी : चन्द्र

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण अत्यन्त भावनात्मक, करुणाशील, संवेदनशील तथा अन्तर्मुखी होता है। यहाँ आर्द्रा की ‘आर्द्रता’ पूर्ण रूप से प्रकट होती है।

✓•५. नक्षत्र-स्वामी, देवता एवं तत्त्व:
•नक्षत्र स्वामी : राहु
•अधिदेवता : रुद्र
•तत्त्व : जल
•गुण : तामस-रजस मिश्रित
•गण : मनुष्य

•बृहत्पाराशर होराशास्त्र में राहु को असामान्य कर्मपथ का कारक कहा गया है। अतः आर्द्रा जातक परम्परागत मार्ग से भिन्न दिशा में अग्रसर होते हैं।

✓•६. वैदिक एवं शास्त्रीय प्रमाण:

✓•६.१ ऋग्वेद:

ऋग्वेद (२।३३।११)—

 “मृळा नो रुद्रो मृळयति।”

•रुद्र यहाँ संहारक ही नहीं, बल्कि उपचारक भी हैं। यही द्वैत आर्द्रा नक्षत्र का मूल है।

✓•६.२ तैत्तिरीय संहिता:

 “नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः।”

•यह श्लोक रुद्र की उग्र शक्ति के शमन का संकेत देता है—आर्द्रा में शमन अनुभव के पश्चात् होता है।

✓•७. मनोवैज्ञानिक एवं कर्मफलात्मक विश्लेषण:

∆आर्द्रा नक्षत्र में जन्मा जातक—
•तीव्र मानसिक संघर्ष से गुजरता है
•अचानक परिवर्तन झेलता है
•दुःख के माध्यम से बोध प्राप्त करता है
•वैज्ञानिक, ज्योतिषी, दार्शनिक या शोधकर्ता बनता है
यह नक्षत्र कर्म-शोधन का कार्य करता है।

✓•८. नवांश एवं आर्द्रा का विशेष सम्बन्ध:
•आर्द्रा के चारों चरण चार भिन्न नवांशों में स्थित होकर यह स्पष्ट करते हैं कि—
•आर्द्रा एक बहु-आयामी नक्षत्र है
•केवल राशि से नहीं, नवांश से फल का निर्णय आवश्यक है

∆विशेषतः चतुर्थ चरण (कर्क नवांश) में आर्द्रा जातक आध्यात्मिक पीड़ा के उच्चतम स्तर को स्पर्श करता है।

✓•९. आध्यात्मिक दृष्टि से आर्द्रा:
आर्द्रा नक्षत्र रुद्र-तत्त्व का प्रत्यक्ष क्षेत्र है। यह नक्षत्र—
•महामृत्युंजय जप
•रुद्राभिषेक
•तांत्रिक साधना
के लिए अत्यन्त प्रभावी माना गया है।

∆उपनिषदों का वाक्य—

 “दुःखमेव ज्ञानाय कल्पते।”

आर्द्रा नक्षत्र का दार्शनिक सूत्र है।

✓•१०. निष्कर्ष: गणितीय, खगोलीय, शास्त्रीय एवं दार्शनिक—चारों स्तरों पर विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि आर्द्रा नक्षत्र परिवर्तन का गणितीय सूत्र है। इसके चरण, अंश, नवांश और देवता—सभी मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि—

• विनाश के बिना नवसृजन सम्भव नहीं।

आर्द्रा नक्षत्र मानव चेतना को विदीर्ण कर उसे उच्चतर बोध की ओर ले जाता है। यही इसका वास्तविक ज्योतिषीय एवं आध्यात्मिक महत्त्व है।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

"याजुषज्योतिषम्"

"याजुषज्योतिषम्" 

पंचसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम् ।
दिनर्त्वयनमासांगं प्रणम्य शिरसा शुचिः ॥ १॥

ज्योतिषामयनं पुण्यं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।
विप्राणां सम्मतं लोके यज्ञकालार्थ सिद्धये ॥ २॥

वेद हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः ।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान् ॥ ३॥

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा ।
तद्वद्वेदांगशास्त्राणां ज्यौतिषं मूर्धानि स्थितम् ॥ ४॥

ये बृहस्पतिना भुक्ता मीनात्प्रभृति राशयः ।
ते हृताः पंचभिर्भूता यः शेषः स परिग्रहः ॥ ०॥

माघशुक्लप्रपन्नस्य पौषकृष्णसमापिनः ।
युगस्य पंचवर्षस्य कालज्ञानं प्रचक्षते ॥ ५॥

स्वराक्रमेते सोमार्कौ यदा साकं सवासवौ ।
स्यात्तदादियुगं माघस्तपः शुक्लोऽयनं ह्युदक् ॥ ६॥

प्रपद्यते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक् ।
सार्पार्धे दक्षिणार्कस्तु माघश्रावणयोः सदा ॥ ७॥

धर्मवृद्धिरपां प्रस्थः क्षपाह्रास उदग्गतौ ।
दक्षिणे तौ विपर्यासः षण्मुहूर्त्ययनेन तु ॥ ८॥

प्रथमं सप्तमं चाहुरयनाद्यं त्रयोदशम् ।
चतुर्थं दशमं चैव द्विर्युग्मं बहुलेप्यृतौ ॥ ९॥

वसुस्त्वष्टा भवोऽजश्च मित्रः सर्पोऽश्विनौ जलम् ।
धाता कश्चायनाद्याः स्युरर्धपंचमभस्त्वृतुः ॥ १०॥

एकान्तरेऽह्नि मासे च पूर्वान् कृत्वादिमुत्तरः ।
अर्धयोः पंचवर्षाणामृदु पंचदशाष्टमौ ॥ ११॥

द्युहेयं पर्व चेत्पादे पादस्त्रिंशत्तु सैकिका ।
भागात्मनापवृज्यांशान् निर्दिशेदधिको यदि ॥ १२॥

निरेकं द्वादशाभ्यस्तं द्विगुणं गतसंज्ञिकम् ।
षष्ट्या षष्ट्या युतं द्वाभ्यां पर्वणां राशिरुच्यते ॥ १३॥

स्युः पादोऽर्धंत्रिपाद्याया त्रिद्वयेकऽह्नः कृतस्थितिम् ।
साम्येन्दोस्तृणोऽन्ये तु पर्वकाः पंच सम्मिताः ॥ १४॥

भांशाः स्युरष्टकाः कार्याः पक्षद्वादशकोद्गताः ।
एकादशगुणश्चोनः शुक्लेऽर्धं चैन्दवा यदि ॥ १५॥

नवकैरुद्गतोंशः स्यादूनः सप्तगुणो भवेत् ।
आवापस्त्वयुजेऽर्धं स्यात्पौलस्ये।आस्तंगतेऽपरम् ॥ १६॥

जावाद्यंशैः समं विद्यात् पूर्वार्धे पर्व सूत्तरे ।
भादानं स्याच्चतुर्दश्यां काष्ठानां देविना कलाः ॥ १७॥

जौ द्रा गः खे श्वे ही रो षा श्चिन्मूषक्ण्यः सूमाधाणः ।
रे मृ घाः स्वापोजः कृष्यो ह ज्येष्ठा इत्यृक्षा लिंगैः ॥ १८॥

कार्या भांशाष्टकास्थाने कला एकान्नविंशतिः ।
उनस्थाने त्रिसप्तति मुद्ववपेदूनसम्भवे ॥ १९॥

तिथिमेकादशाभ्यस्तां पर्वभांशसमन्विताम् ।
विभज्य भसमूहेन तिथिनक्षत्रमादिशेत् ॥ २०॥

याः पर्वाभादानकलास्तासु सप्तगुणां तिथिम् ।
युक्त्या तासां विजानीयात् तिथिभादानिकाः कलाः ॥ २१॥

अतीतपर्वभागेभ्यः शोधयेद् द्विगुणां तिथिम् ।
तेषु मण्डलभागेषु तिथिनिष्ठांगतो रविः ॥ २२॥

विषुवन्तं द्विरभ्यस्तं रूपोनं षड्गुणीकृतम् ।
पक्षा यदर्धं पक्षाणां तिथिः स विषुवान् स्मृतः ॥ २३॥

पलानि पंचाशदपां धृतानि तदाढकं द्रोणमतः प्रमेयम् ।
त्रिभिर्विहीनं कुड्वैस्तु कार्यं तन्नाडिकायास्तु भवेत् प्रमाणम् ॥ २४॥

एकादशभिरभ्यस्य पर्वाणि नवभिस्तिथिम् ।
युगलब्धं सपर्व स्याद् वर्तमानार्कभं क्रमात् ॥ २५॥

सूर्यर्क्षभागान् नवभिर्विभज्य शेषान् द्विरभ्यस्य दिनोपभुक्तिः ।
तिथेर्युता भुक्तिदिनेषु कालो योगो दिनैकादशकेन् तद्भम् ॥ २६॥

त्र्यंशो भशेषो दिवसांशभागश्चतुर्दशस्याप्यपनीय भिन्नम् ।
भार्धेऽधिके चाधिगते परोंऽशोद्वावुत्तमे तन्नवकैरवेत्य ॥ २७॥

त्रिंशत्यह्नां सषट्षष्टिरब्दः षट् चर्तवोऽयने ।
मासा द्वादश सौर्याः स्युरेतत् पंचगुणं युगम् ॥ २८॥

उदयावासवस्य स्युर्दिनराशि सपंचकः ।
ऋषेर्द्विषष्टिहीनः स्याद् विंशत्या चैकयास्तृणाम् ॥ २९॥

पंचत्रिंशं शतं पौष्णम् एकोनमयनोन्यृषेः ।
पर्वणां स्याच्चतुष्पादी काष्ठानां चैव ताः कलाः ॥ ३०॥

सावनेन्दुस्तृमासानां षष्टिः सैकद्विसप्तिका ।
द्युस्त्रिंशत् सावनः सार्धः सौरस्तृणां स पर्ययः ॥ ३१॥

अग्निः प्रजापतिः सोमो रुद्रोदितिबृहस्पती ।
सर्पाश्च पितरश्चैव भगश्चैवार्यमापि च ॥ ३२॥

सविता त्वष्टाथ वायुश्चेन्द्राग्नी मित्र एव च ।
इन्द्रो निॠतिरापो वै विश्वेदेवास्तथैव च ॥ ३३॥

विष्णुर्वसवो वरुणूऽजेकपात् तथैव च ।
अहिर्बुध्न्यस्तथा पूषा अश्विनौ यम एव च ॥ ३४॥

नक्षत्रदेवता एता एताभिर्यज्ञकर्मणि ।
यजमानस्य शास्त्रज्ञैर्नाम नक्षत्रजं स्मृतम् ॥ ३५॥

उग्राण्यार्द्रा च चित्रा च विशाखा श्रवणोश्वयुक् ।
क्रूरणि तु मघास्वाती ज्येष्टा मूलं यमस्य च ॥ ३६॥

द्यूनं द्विषष्टिभागेन ज्ञे (हे) यं सौरं सपार्वणम् ।
यत्कृतावुपजायेते मध्येऽन्ते चाधिमासकौ ॥ ३७॥

कला दश सविंशा स्याद् द्वे मुहुर्तस्य नाडिके ।
द्युस्त्रिंशत् तत्कलानां तु षट्शती त्र्यधिका भवेत् ॥ ३८॥

ससप्तमं भयुक् सोमः सूर्यो द्यूनि त्रयोदश ।
नवमानि तु पंचाह्नः काष्ठा पंचाक्षरा भवेत् ॥ ३९॥

यदुत्तरस्यायनतो गतं स्याच् छेषं तथा दक्षिणतोऽयनस्य ।
तदेकषष्ट्याद्विगुणं विभक्तं सद्वादशं स्याद् दिवसप्रमाणम् ॥ ४०॥

यदर्धं दिनभागानां सदा पर्वणि पर्वणि ।
ॠतुशेषं तु तद् विद्यात् संख्याय सह सर्वणाम् ॥ ४१॥

इत्युपायसमुद्देशो भूयोप्यह्नः प्रकल्पयेत् ।
ज्ञेयराशिं गताभ्यस्तं विभजेज्ज्ञानराशिना ॥ ४२॥

इत्येतन्मासवर्षाणां मुहूर्तोदयपर्वणाम् ।
दिनर्त्वयनमासांगं व्याख्यानं लगधोऽब्रवीत् ॥ ००॥

सोमसूर्यस्तृचरितं विद्वान् वेदविदश्नुते ।
सोमसूर्यस्तृचरितं लोकं लोके च सम्मतिम् ॥ ४३॥

॥ इति याजुषज्योतिषं समाप्तम् ॥