शनिवार, 25 अप्रैल 2026

श्वेतवराहकल्प

#श्वेतवराहकल्प-

( *सृष्टि* ) का प्रारम्भ १९७२९४९१२० वर्ष पूर्व हुआ था, इतने बृहत्तम इतिहास को भगवान् व्यास नारायण के अतिरिक्त लिखने में कोई अन्य समर्थ नहीं,उन्हीं भगवान् व्यास नारायण की कृपा से मैं इस *श्वेतवराह कल्प के ७वें मन्वन्तर के २८ कलियुगों* के सार्वभौम जगदगुरुओं का सङ्केत मात्र में वर्णन करने का प्रयास कर रहा हूँ।

 *भगवान नारायण से चली आ रही हिंदुओं की गुरु शिष्य परम्परा:-* 

 *नारायण-->ब्रह्मा-->वशिष्ठ-->शक्ति-->पराशर-->व्यास-->शुकदेव-->गौड़पाद-->गोविंदपाद-->आदि शंकराचार्य ।* 

आदि शंकराचार्य जी ने चार शांकर पीठों की स्थापना करी। जिनमे प्रथम के चार शंकराचार्य नियुक्त किये गए जिनके नाम थे - पद्मपादाचार्य, तोटकाचार्य , हस्तमालकाचार्य , सुरेश्वराचार्य

श्रीमन्महाराज सार्वभौम युधिष्ठिर जी के २६३१ वर्ष व्यतीत होने पर स्वयं जगद्गुरु भगवान् शङ्कर आद्य शङ्कर भगवत्पाद् के रूप में इस धरा धाम पर प्रकट हुए थे । पूज्य भगवत्पाद् ने प्राचीन चतुराम्नाय सम्बद्ध चतुष्पीठों पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को जगद्गुरु शङ्कराचार्य के रूप में ख्यापित किया था, यथा:- 

 # *ऋग्वेद* से सम्बद्ध पूर्वाम्नाय श्री *गोवर्द्धनमठ* *श्रीजगन्नाथ पुरी पीठ* पर पूज्य जगद्गुरु *पद्मपादाचार्य* जी को युधिष्ठिर संवत् २६५५ में (वर्तमान से २५०१ वर्ष पूर्व में ) अभिषिक्त किया।

# *यजुर्वेद* से सम्बद्ध दक्षिणाम्नाय *श्रीशृङ्गेरी-शारदामठ शृङ्गेरी,* पर पूज्य जगदगुरु श्री *हस्तामलकाचर्य* जी को युधिष्ठिर संवत् २६५४ में (वर्तमान से २५०२ वर्ष में ) पूर्व अभिषिक्त किया गया।

# *सामवेद* से सम्बद्ध पश्चिमाम्नाय *द्वारिका-शारदामठ द्वारिका* ,पर पूज्य जगद्गुरु श्री *सुरेश्वराचार्य* जी का युधिष्ठिर संवत् २६४९ में (वर्तमान से २५०८ वर्ष पूर्व में )अभिषेक किया गया।

और # *अथर्ववेद* से सम्बद्ध उत्तराम्नाय *ज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम* पर पूज्य जगद्गुरु श्री *तोटकाचार्यजी* को युधिष्ठिर संवत् २६५४ में (वर्तमान से २५०२ वर्ष पूर्व) अभिषेक किया ।

 *वर्तमान में* चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर पूज्य जगद्गुरु महाभाग पूर्व में *पुरीपीठ में अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती* जी महाभाग अभिषिक्त हैं , गत २६ वर्षों से पीठ पर विराजमान हैं।

दक्षिण में *शृङ्गेरी मठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामि श्री भारती तीर्थ जी* महाभाग अभिषिक्त हैं।

पश्चिम में *शारदामठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्तश्रीविभूषित भगवान् स्वामि श्रीस्वरूपानन्द सरस्वती जी* महाभाग अभिषिक्त हैं, वे गत ३६ वर्षों से पीठ पर विराजमान हैं।

उत्तर में *ज्योतिर्मठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामि श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी* महाभाग अभिषिक्त हैं, वे गत ४५ वर्षों से पीठ पर विराजमान हैं।

यह सार्वभौम जगद्गुरु की परम्परा अतिप्राचीन ही नहीं अपितु सनातन भी हैं।
कृत,त्रेता,द्वापर आदि युगों में मन्त्र दृष्टा ऋषियों से प्रसारित ज्ञान के द्वारा धर्म की व्यवस्था बनी रहती है।
किन्तु कलियुग में अल्पमेधा वाले,तपोबल और शुद्धता-पवित्रता रहित मनुष्यों को भगवत्साक्षात्कार,देवताओं का साक्षात्कार और ऋषियों का साक्षात्कार प्रत्यक्ष नहीं होता है। क्योंकि दिव्य महापुरुषों के दर्शनों की क्षमता नहीं होती है कलियुग के अल्पशक्ति सम्पन्न लोगों में..ऐसे में ऐसे मनुष्यों पर कृपा करने के लिये स्वयं भगवान् प्रत्येक द्वापर के अंतमें व्यास रूप में अवतार लेकर वेदों का विभाजन करके पुराणों के द्वारा वेदों का सरलीकरण करके जन-जन तक ज्ञान के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करते हैं । 

उन्हीं भगवान् व्यास नारायण की सहायताके लिये जगद्गुरु भगवान् साम्ब शिव स्वयं अवतार धारण करते हैं, और व्यास जी के आदेश पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर ख्यापित करके धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

श्री श्वेतवराहकल्प के सप्तम मन्वन्तर वैवस्वत का शुभारम्भ १२०५३३१२० वर्ष पूर्व हुआ था। वैवस्वत मन्वन्तरके *आद्य कलियुग* ११६६४५१२० वर्ष पूर्व में जब भगवान् ब्रह्माजी स्वयं व्यासजी के पद पर प्रतिष्ठित थे, तब भगवान् शिव ने उनकी सहायता के लिये जगद्गुरु श्वेत के रूप में अवतार लिया और चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर अपने चार प्रमुख शिष्यों श्वेतलोहित, श्वेताश्व, श्वेतशिख और श्वेत को अभिषिक्त किया।
(यह चतुराम्नाय पूर्ववत ऋक्० ,यजु: ,साम और अथर्व के क्रम से है।
पाठक गण कृपया निम्न सूची को स्वयं इसी क्रम से चतुराम्नाय चतुष्पीठों से सम्बन्ध ज्ञात कर सकते हैं। )

 *द्वितीय कलियुग* के प्रारम्भ में ११२३२५१२० वर्ष पूर्व जब प्रजापति सत्य व्यासजी थे तब भगवान् शिव जगद्गुरु सुतार के नाम से अवतरित हुए,उनके चार प्रमुख शिष्य जगद्गुरु हुए ,केतुमान् ,हृषीक ,शतरूप व दुन्दुभि ।

 *तीसरे कलियुग* के प्रारम्भ में १०८००५१२० वर्ष पूर्व महर्षि भार्गव व्यासजी थे तब भगवान् शङ्कर जगद

गुरु दमन के रूप में प्रकट हुए और उनके प्रमुख शिष्य थे ,पापनाशन ,विपाप ,विशेष व विशोक।

 *चतुर्थ कलियुग* के प्रारम्भ में १०३६८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् अङ्गिरा व्यासजी थे और उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु सुहोत्र केरूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए दुरतिक्रय ,दुर्दम ,दुर्मुख व सुमुख ।  

 *पञ्चम कलियुग* के प्रारम्भ में ९९३६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् सविता व्यासजी थे (शुक्लयजुर्वेद इन्हीं से प्रकट हुआ ) तब उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु हँस (कङ्क) के रूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य थे ,सनत्कुमार ,सनन्दन ,सनातन व सनक । 

 *षट् कलियुग* के प्रारम्भ में भगवान् मृत्यु (सूर्यपुत्र- बालक नचिकेता के गुरु) व्यासजी के पद पर थे ,तब भगवान् महेश्वर उनकी सहायता के लिये जगद्गुरु लोकाक्षीके रूप में प्रकट हुए,उनके प्रमुख शिष्य हुए,विजय संजय,विरजा व सुधामा।

 *सप्तम कलियुग* के प्रारम्भ में ९०७२५१२० वर्ष पूर्व भगवान् शतक्रतु (इन्द्र) थे,जो कि महर्षि भरद्वाज और विश्वामित्र के गुरु और प्राचीन व्याकरण के रचयिता थे,उनकी सहायतार्थ भगवान् शङ्कर जगद्गुरु जैगीषव्य के रूप में प्रकट हुए ,उनके शिष्य हुए-सुवाहन ,मेघवाहन ,योगीश व सारस्वत । 

 *अष्टम कलियुग* के प्रारम्भ में ८६४०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् वसिष्ठ व्यासजी के पद पर थे (ऋग्वेद सप्तम मण्डल के दृष्टा ऋषि ,वसिष्ठ धर्मसूत्र ,वसिष्ठ शिक्षा व वसिष्ठ स्मृति की रचना इसी समय की ) उनकी सहायतार्थ भगवान् शङ्कर जगद्गुरु दधिवाहन के रूप में प्रकट हुए ,उनके शिष्य थे शाल्वल ,पञ्चशिख ,आसुरि व कपिल । 

 *नवम कलियुग* के प्रारम्भ में ८२०८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् सारस्वत व्यासजी थे ,उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगदगुरु ऋषभ के रूप में हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए गिरीश ,भार्गव ,गर्ग व पराशर । 

 *दशमें कलयुग* के प्रारम्भ में ७७७६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् त्रिधन्वा व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु योगेश्वर हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,केतुशृङ्ग ,नरामित्र ,बलबन्धु व भृङ्ग , चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता इसी चतुर्युगी में हुए । 

 *एकादश कलियुग* के प्रारम्भ में ७३४४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् त्रिवृत व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु तप हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए प्रलम्बक ,केशलम्ब ,लम्बाक्ष व लम्बोदर । 

 *द्वादश कलियुग* के प्रारम्भ में ६९१२५१२० वर्ष पूर्व भगवान् शततेजा व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु अत्रि हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,शर्व ,साध्य ,समबुद्धि व सर्वज्ञ । 

 *त्रयोदश कलियुग* के प्रारम्भ में ६४८०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् नारायण व्यासजी के पद पर थे ,उस समय उनके सहायक भगवान् शिवजगदगुरु बलि के रूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,विरजा ,वसिष्ठ ,काश्यप व सुधामा । 

 *चतुर्दश कलियुग* के आदिमें ६०४८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् ऋक्ष व्यासजी के पद पर थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गौतम थे (गौतमधर्मसूत्रके रचयिता ) ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,श्नविष्टक ,श्रवण ,वशद व अत्रि । 

 *पञ्चदश कलियुगमें* ५६१६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास के पद पर त्रय्यारुणि थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु वेदशिरा थे ,उनके प्रमुख शिष्य हैं ,कुनेत्रक ,कुशरीर ,कुणिबाहु व कुणि । 

 *षोडश कलियुग* में ५१८४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास के पद पर देव आरूढ़ थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गोकर्ण जी थे (जिन्होंने अपने भाई धुंधकारी को पिशाच योनि से मुक्त किया ) ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,बृहस्पति (अर्थशास्त्र के रचयिता ) ,च्यवन (आयुर्वेद के प्रवर्तक ) ,उशना(उशनास्मृति अथवा शुक्रनीति के रचयिता ) व काश्यप ,चक्रवर्ती सम्राट भरत इसी चतुर्युग में हुए ।  

 *सप्तदश कलियुग* में ४७५२५१२० वर्ष पूर्व भगवत् व्यासके पद पर देवकृतञ्जय व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गुहावसी थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,महाबल ,महायोग ,वामदेव व उतथ्य । 

 *अष्टदश कलियुग* के आदि में ४३२०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास ऋतञ्जय थे ,व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु शिखण्डी थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,यतीश्वर ,श्यावास्य,रुचीक व वाचश्रवा । 

 *एकोन्विंशति कलियुग* में ३८८८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् भरद्वाज व्यासजी थे व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु माली थे ,उनके प्रमुख शिष्य प्रधिमि ,लोकाक्षी ,कौसल्य व हिरण्यनामा थे ,इसी चतुर्युग में भगवान् परशुरामजी हुए । 

 *विंशति कलियुग* के आदि में ३४५६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास गोतम ऋषि थे (गोतम न्यायदर्शन के प्रणेता ) ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु अट्टहास हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए कुणिकन्धर ,कबन्ध ,वर्वरि व सुमन्त । 

 *एकविंशति कलियुग* के आदि में ३०२४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास जी वाचाश्रवा थे उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु दारुक थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए गौतम ,केतुमान् ,दर्भामणि व प्लक्ष । 

 *द्वाविंशति कलियुग* के आदि में २५९२५१२० वर्ष पूर्व शुष्ययण व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु लाङ्गुली भीम हुए ,उनके प्रमुखं शिष

्य हुए श्वेतकेतु ,पिङ्ग ,मधु व भल्लवी । 

 *त्रविंशति कलियुग* के आदि में २१६०५१२० वर्ष पूर्व महर्षि तृणबिन्दु वेदव्यास जी थे (इन्हीं के दौहित्र महर्षि विश्रवा थे ) ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु श्वेत थे ,उनके शिष्य हुए कवि ,देवल ,बृहदश्व व उशिक । 

 *चतुर्विंशति कलियुग* के आदि में १७२८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् वेद व्यास थे ऋषि यक्ष ,उनके सहायक हुए शिवावतार जगद्गुरु शूली ,उनके प्रमुख शिष्य हुए शरद्वसु ,युवनाश्व ,अग्निवेश (धनुर्वेद के आचार्य -द्रोणाचार्य के गुरु) व शालिहोत्र ,इसी चतुर्युगी में वेदवेद्य जगदीश्वर श्रीरामभद्रका अवतार हुआ । 

 *पञ्चविंशति कलियुग* के आदि में १२९६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यासके पद पर वसिष्ठ पुत्र शक्ति थे ,उनके सहायक शिवावतार मुण्डीश्वर हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए प्रवाहक ,कुम्भाण्ड ,कुण्डकर्ण व छगल । 

 *षड्विंशति कलियुग* के आदि में ८६४५१२० वर्ष पूर्व शक्ति पुत्र पाराशर भगवान् वेदव्यास के पद पर थे (विष्णुपुराण के संकलनकर्ता) ,उनके सहायक हुए शिवावतार जगद्गुरु सहष्णु ,उनके प्रमुख शिष्य हुए आश्वलायन (शौनक शिष्य आश्वलायन ऋग्वेद की एक सम्पूर्ण शाखा के प्रवर्तक हैं ),शम्बूक ,विद्युत व उलूक । 

 *सप्तविंशति कलियुग* के आदि में ४३२५१२० वर्ष पूर्व महर्षि जातूकर्ण वेदव्यास थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु सोमशर्मा थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए वत्स ,उलूक ,कुमार व अक्षपाद । 

 *अष्टविंशति कलियुग* के आदि में ५१२० वर्ष पूर्व ,जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण इस धराधाम को अनाथ करके गोलोक धाम को गये ,भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासजी ने २८ वे वेदव्यास के पद पर रखकर महाभारत ग्रन्थ सहित १८ पुराणों व ब्रह्मसूत्र की रचना की व वेदोंका विभाजन किया । उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु योगेश्वर लकुलीश हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए पौरुष्य ,मित्र ,गर्ग व कुशिक (इन्ही जगद्गुरु कुशिक की दशवीं शिष्य परम्परा में आर्य उदिताचार्य हुए जिन्होंने परमभट्टारक राजाधिराज समुद्रगुप्त के प्रतापी सत्पुत्र परम भट्टारक राजाधिराज चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के यज्ञ सम्पन्न किये थे ,व दो शिवलिंगों की स्थापना भी की थी-
देखिये गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय का गुप्त शक ६१ का मधुरा स्तम्भ लेख। 

२८वें भगवान् वेदव्यास के आदेश पर ही शिवावतार जगद्गुरु आदि शङ्कराचार्य जी ने अपने चार शिष्यों, श्रीपद्मपाद ,श्रीहस्तामलक,श्रीसुरेश्वर व श्रीतोटक को चतुष्पीठों पर जगद्गुरु कर रूप में ख्यापित किया।

जयति लोक शङ्कर:

मंगलवार, 17 मार्च 2026

जातक_की_कुंडली_और_नक्षत्र_का_आधार

#जातक_की_कुंडली_और_नक्षत्र_का_आधार: किसी जातक के जीवन में कुंडली (#जन्म_कुंडली) का आधार जन्म के ठीक समय पर सूर्य, चंद्र, ग्रहों, लग्न तथा #राहु_केतु की सिद्धांतिक (#निरयण) स्थिति पर निर्भर करता है। यह सूर्य सिद्धांत के खगोलीय गणित से निकाली जाती है, जिसमें पृथ्वी को केंद्र मानकर ग्रहों की गति, उनकी औसत (#मीन) तथा सच्ची (ट्रू) स्थिति, साइन टेबल्स (#त्रिकोणमिति) और युग-चक्रों का उपयोग होता है। 

#नक्षत्र_कुंडली_का_सूक्ष्मतम_स्तर है—यह चंद्रमा की जन्म-स्थिति (जनम नक्षत्र) पर आधारित है। #चंद्रमा मन, भावनाओं और कर्म-फल का कारक है, अतः नक्षत्र जातक के व्यक्तित्व, दशा-चक्र तथा सूक्ष्म कर्म-प्रभाव को नियंत्रित करता है। #कुंडली में नक्षत्र ग्रहों की राशि-स्थिति से आगे जाकर उनके फल को सूक्ष्मता से संशोधित करता है।

#नक्षत्र_का_खगोलीय_विज्ञान (सूर्य सिद्धांत एवं खगोलीय गणित के आधार पर—भौतिक आधार): #सूर्य_सिद्धांत (प्राचीन वैदिक खगोल ग्रंथ, लगभग ४५०-९०० ई.) में नक्षत्रों को २७ (कभी २८) समान भागों में विभाजित किया गया है। पूरे ३६०° राशि-चक्र को २७ भागों में बाँटने पर प्रत्येक नक्षत्र १३°२०′ (अर्थात् १३ अंश २० कला) का होता है। यह #चंद्रमा के सिद्धांतिक (साइडरियल) काल-चक्र (२७.३२२ दिन) पर आधारित है—चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र में गमन करता है। 

#सूर्य_सिद्धांत के अध्याय ८ में “#ताराओं” (नक्षत्रों) की स्थिति दी गई है; प्रत्येक नक्षत्र का “#जंक्शन_स्टार” (मुख्य तारा) निर्धारित है (जैसे अश्विनी में β-γ एरीटिस)। समय-मापन में “नक्षत्र अहोत्र” = एक सिद्धांतिक दिन (६० घटिकाएँ) है।

 गणना विधि: साइन-टेबल (त्रिज्या ३४३८, २४ खंडों में विभाजित) से ग्रहों की लंबाई, सम-गति, #स्फुट_गति, अयनांश तथा नक्षत्र-प्रवेश की गणना की जाती है। यह भौतिक विज्ञान है—नक्षत्र वास्तविक तारामंडलों (#asterisms) के समूह हैं जो क्रांतिवृत्त (#ecliptic) पर स्थित हैं; चंद्रमा इनके बीच से गुजरता है। कोई सैद्धांतिक गलती नहीं—यह दृक्-सिद्धांत से पूर्व का आधार है, जो पंचांग, दशा तथा मुहूर्त की गणना का मूल है।

#नक्षत्र पर आधारित फलादेश का तरीका (कुंडली में): फलादेश की विधि बहुस्तरीय और सटीक है:

जनम नक्षत्र (#Moon_position): चंद्रमा का जन्म-नक्षत्र जातक का मूल स्वभाव, मन और जीवन-दिशा निर्धारित करता है। उदाहरण: #अश्विनी—औषधि/चिकित्सा, पुष्य—आध्यात्मिक पोषण।

#नक्षत्र_स्वामी से दशा-चक्र: विंशोत्तरी दशा (१२० वर्ष) जनम-नक्षत्र स्वामी से शुरू होती है (अश्विनी-केतु, भरणी-शुक्र आदि)। दशा-अंतर्दशा में नक्षत्र स्वामी के फल + कुंडली-स्थिति से फलादेश।

#पाद_विभाजन: प्रत्येक नक्षत्र के ४ पाद (३°२०′ प्रत्येक) नवांश-राशि से जुड़े हैं—यह सूक्ष्म फल देता है (प्रथम पाद मेष नवांश आदि)।

ग्रहों का #नक्षत्र_स्थान: कोई भी ग्रह जिस नक्षत्र में हो, उसका फल नक्षत्र-देवता, गुण, योनी, गण (देव-मनुष्य-राक्षस) से संशोधित होता है। उदाहरण: मंगल अर्द्रा (रुद्र) में—तेज लेकिन विनाशकारी।

अन्य योग: #तारा_बल (जनम नक्षत्र से ग्रहों की तारा), गंड-मूल नक्षत्र शांति, नक्षत्र-देवता पूजा, योनि-मेल (विवाह में), मुहूर्त (नक्षत्र गुण: तीक्ष्ण/मृदु/चर/ध्रुव)। कुंडली में लग्न, भाव, दृष्टि, योग (#पंच_महापुरुष आदि) के साथ नक्षत्र को मिलाकर फलादेश किया जाता है। यह “DNA of chart” है—राशि सामान्य, नक्षत्र सूक्ष्म फल देता है।

दार्शनिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक तीनों आधारों का संरक्षण (गहन शोध-आत्मक विश्लेषण): भौतिक (खगोलीय) आधार: ऊपर वर्णित सूर्य सिद्धांत गणित—तारों के वास्तविक समूह, चंद्र-गति, त्रिकोणमिति। यह “पिंड में ब्रह्मांड” का भौतिक पक्ष है; कोई कल्पना नहीं, शुद्ध गणना।

आध्यात्मिक आधार: नक्षत्र दक्ष प्रजापति की २७ पुत्रियाँ हैं (महाभारत, हरिवंश, अथर्ववेद), जिनका चंद्रमा से विवाह हुआ। प्रत्येक का अधिष्ठात्री देवता (अश्विनी—अश्विनीकुमार, कृत्तिका—अग्नि, पुष्य—बृहस्पति आदि) और शक्ति (Taittiriya Brahmana १.५.२) है। “यो वै नक्षत्रियं प्रजापतिं वेद...” पूजा से स्वर्ग-प्राप्ति होती है—यह “नक्षत्रत्व” है। नक्षत्र आत्मा के कर्म-फल वितरक हैं; वे सूक्ष्म शरीर (सूक्ष्म-शरीर) को प्रभावित करते हैं। पूजा, मंत्र (ॐ सोमाय नमः आदि) तथा देवता-आराधना से नकारात्मक प्रभाव शांत होते हैं। यह मोक्ष-मार्ग का सेतु है।

दार्शनिक आधार: नक्षत्र पुरुष-सूक्त (ऋग्वेद) से जुड़े—सूर्य नेत्र, चंद्र मन से उत्पन्न। तीन गुणों का विभाजन (९ देव-गण, ९ मनुष्य-गण, ९ राक्षस-गण); चार प्रेरणाएँ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष)। वे “नक्ष” (पहुँचना/आराधना) + “त्र” (रक्षा) से बने—कॉस्मिक ऑर्डर के रक्षक। दर्शन में वे आत्मा की उद्भव-स्थिति (स्वर्गीय प्रकाश) दर्शाते हैं; कर्म-फल के अनुसार फल देते हैं। पुरुष-प्रकृति द्वंद्व में नक्षत्र चंद्र (मन) के माध्यम से प्रकृति-शक्ति (शक्ति) का वाहक है।

तीनों का एकीकरण (गहन विश्लेषण): सूर्य सिद्धांत भौतिक गणना देता है, देवता आध्यात्मिक शक्ति, गुण-प्रेरणा दार्शनिक गहराई। कुंडली में नक्षत्र इन्हें जोड़ता है—जन्म-नक्षत्र से जातक का “कॉस्मिक ब्लूप्रिंट” बनता है। उदाहरण: मूल नक्षत्र (निर्ऋति) भौतिक रूप से तारों का समूह, आध्यात्मिक रूप से विनाश-शक्ति, दार्शनिक रूप से कर्म-संस्कार का मूल।

 फलादेश में यदि जनम-नक्षत्र शुभ हो तो भौतिक सुख, आध्यात्मिक उन्नति और दार्शनिक समाधान (मोक्ष) दोनों मिलते हैं। गंडमूल जैसे दोष में शांति-पूजा तीनों स्तरों पर संतुलन लाती है। यह कोई अंधविश्वास नहीं—वैदिक ऋषियों का शोध (वेदांग ज्योतिष से सूर्य सिद्धांत तक) है, जो आधुनिक खगोल (साइडरियल काल) से भी मेल खाता है।

इस प्रकार नक्षत्र ज्योतिष पूर्ण विज्ञान है—भौतिक गणना, आध्यात्मिक देव-शक्ति तथा दार्शनिक कर्म-दर्शन का त्रिवेणी-संगम। सही फलादेश के लिए जन्म-समय की शुद्धता, सूर्य सिद्धांत/दृक् गणना तथा नक्षत्र-देवता-पूजा अनिवार्य है। कोई सैद्धांतिक गलती नहीं—सभी बिंदु प्राचीन ग्रंथों (सूर्य सिद्धांत, तैत्तिरीय ब्राह्मण, बृहत् पाराशर होरा) पर आधारित हैं। जातक के जीवन में नक्षत्र “आत्मा का नक्शा” है, जिसे समझकर कर्म-सुधार और मोक्ष-मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

हरसिंगार का बाँदा - अक्षय लक्ष्मी का अद्भुत आमंत्रण

🌿 हरसिंगार का बाँदा - अक्षय लक्ष्मी का अद्भुत आमंत्रण 🌿
नमस्ते दोस्तों, आज मैं आपको एक बहुत ही दुर्लभ और शक्तिशाली चीज़ के बारे में बताने जा रहा हूँ - हरसिंगार (हरश्रृंगार) का बाँदा। यह कोई साधारण पौधा नहीं है, यह प्रकृति का एक अनमोल उपहार है। इसकी दुर्लभता और शक्ति का अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि यह आसानी से कहीं मिलता नहीं है। अगर कहीं संयोग से मिल जाए, तो समझो मानो लक्ष्मी जी ने खुद आपके घर आने का इशारा कर दिया।

❓ बाँदा क्या होता है? (What is Banda?)

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बाँदा होता क्या है। बहुत लोगों को इसे लेकर कन्फ्यूजन (confusion) रहता है।

बाँदा एक परजीवी पौधा (parasitic plant) होता है। यानी यह किसी दूसरे पेड़ पर उगता है और उसी पेड़ से अपना पोषण (nutrition) लेता है। यह किसी पेड़ की डाल या तने पर एक गोल-सी बॉल या झाड़ी के रूप में उग जाता है। यह उस पेड़ का हिस्सा नहीं होता, बल्कि एक अलग पौधा होता है जो उस पेड़ पर आश्रय लेकर रहता है।

बाँदा कई तरह के पेड़ों पर पाया जाता है - जैसे नीम, आम, बरगद, पीपल, हरसिंगार आदि। हर पेड़ पर उगने वाले बाँदे के अपने अलग-अलग गुण (properties) और महत्व (importance) होते हैं।

आसान भाषा में समझें - जैसे कोई व्यक्ति किसी दूसरे के घर में किराए पर रहता है, वैसे ही बाँदा किसी पेड़ पर रहता है।

🌸 क्या है हरसिंगार का पौधा? (About Harsingar Plant)

हरसिंगार का पौधा बहुत ही खूबसूरत होता है। इसे पारिजात (Parijat) भी कहते हैं। इसके बारे में कुछ खास बातें -

✅ पौधा - मध्यम कद-काठी का होता है, न ज्यादा बड़ा न ज्यादा छोटा।
✅ पत्ते - छोटे-छोटे, कटे हुए किनारों वाले (serrated edges)।
✅ फूल - सबसे खास चीज है इसके फूल। ये सफेद रंग के होते हैं, लेकिन इनका डंठल (stalk) नारंगी (orange) होता है। ये फूल सुबह-सुबह खिलते हैं और पेड़ के चारों ओर गोल घेरे में बिखरे मिलते हैं।

सुगंध (Fragrance)

हरसिंगार के फूलों की सुगंध (fragrance) बहुत ही मीठी और भीनी-भीनी होती है। अगर आसपास कहीं एक भी हरसिंगार का पौधा है, तो सारा वातावरण रजनीगंधा (tuberose) जैसा सुवासित (fragrant) हो जाता है। सुबह-सुबह इसकी खुशबू से पूरा मोहल्ला महक उठता है।

🌿 क्या है हरसिंगार का बाँदा? (What is Harsingar Ka Banda?)

अब बात करते हैं असली चीज़ की - हरसिंगार का बाँदा।

हरसिंगार के पेड़ पर बाँदा होना अति दुर्लभ (extremely rare) है। यह आसानी से कहीं देखने को नहीं मिलता। हजारों पेड़ों में से कभी किसी एक पेड़ पर ही बाँदा उगता है। यह प्रकृति का एक चमत्कार (miracle) है।

अगर कभी संयोग (luck) से कहीं हरसिंगार पर बाँदा दिख जाए, तो समझो आप पर बहुत बड़ी कृपा (blessing) हुई है। ऐसा माना जाता है कि जहां यह बाँदा होता है, वहां लक्ष्मी जी का विशेष वास (special residence) होता है।

🪷 हरसिंगार के बाँदे का महत्व (Importance of Harsingar Banda)

हरसिंगार के बाँदे को अक्षय लक्ष्मी (inexhaustible wealth) का आमंत्रण माना जाता है। मान्यता है कि जिस घर में यह बाँदा होता है, वहां कभी धन की कमी नहीं रहती। लक्ष्मी जी सदा वहां निवास करती हैं।

यह बाँदा आपके जीवन में लाता है -

✅ अक्षय धन - कभी खत्म न होने वाला धन
✅ समृद्धि - हर तरह की सुख-सुविधाएं
✅ सौभाग्य - भाग्य में वृद्धि
✅ सकारात्मक ऊर्जा - घर में पॉजिटिव वाइब्रेशन
✅ व्यापार में वृद्धि - बिज़नेस में तरक्की
✅ कर्ज से मुक्ति - कर्ज से छुटकारा

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📝 कैसे प्राप्त करें हरसिंगार का बाँदा? (How to Get It?)

जैसा कि बताया गया, यह बहुत दुर्लभ है। अगर कहीं आपको हरसिंगार के पेड़ पर बाँदा दिख जाए, तो इसे सही विधि (right method) से लाना चाहिए।

सही नक्षत्र (Right Nakshatra)

इसे लाने के लिए हस्ता नक्षत्र (Hasta Nakshatra) सबसे उत्तम माना जाता है। इस नक्षत्र में लाया गया बाँदा विशेष रूप से फलदायी (fruitful) होता है।

विधि (Method)

बाँदा लाने की विधि बहुत महत्वपूर्ण है -

✅ पहला दिन - सबसे पहले पेड़ के पास जाकर उसे न्योता दें - "मैं कल आपको लेने आऊंगा"
✅ दूसरा दिन - हस्ता नक्षत्र में सुबह-सुबह जाएं
✅ अकेले जाएं - किसी को साथ न ले जाएं
✅ चुपचाप जाएं - किसी से बात न करें
✅ प्रार्थना करें - पेड़ से अनुमति मांगें
✅ बाँदा उखाड़ें - सावधानी से उखाड़ लें
✅ पीछे न देखें - वापस आते समय पीछे मुड़कर न देखें
✅ सीधे घर आएं - बीच में कहीं रुकें नहीं

🏠 घर लाकर क्या करें? (Establishment and Worship)

बाँदा घर लाने के बाद उसकी स्थापना (establishment) और पूजा (worship) करना बहुत जरूरी है।

पूजा विधि (Worship Method)

✅ बाँदे को साफ करें, उसे स्नान कराएं (पानी, दूध, गंगाजल से)
✅ उसे लाल या पीले कपड़े पर रखें
✅ धूप-दीप (incense and lamp) जलाएं
✅ रोली, चंदन, अक्षत (rice) चढ़ाएं
✅ पीले फूल या सफेद फूल चढ़ाएं
✅ मीठा भोग (sweet offering) लगाएं - खीर या मिठाई
✅ माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु का ध्यान करें

स्थापना स्थान (Where to Keep)

इसे किसी बक्से, तिजोरी (locker), आलमीरे (cupboard) या अपने बिज़नेस के गल्ले (cash box) में रखें। यह वह स्थान है जहां आप अपना पैसा रखते हैं। इससे वहां की एनर्जी पॉजिटिव होती है और धन की वृद्धि होती है।

📿 ताबीज के रूप में उपयोग (Use as Talisman)

आप हरसिंगार के बाँदे के छोटे टुकड़े को ताबीज (talisman) में भरकर भी धारण कर सकते हैं -

✅ पुरुष - इसे दाएं भुजा (right arm) में बांधें
✅ स्त्री - इसे बाएं भुजा (left arm) या गले में बांधें

इस ताबीज को धारण करने से व्यक्ति के जीवन में धन और सौभाग्य की वृद्धि होती है।

🎁 जरूरतमंदों को दें आशीर्वाद (Blessings for Needy)

अगर आपके पास हरसिंगार का बाँदा है, तो इसके छोटे-छोटे टुकड़े जरूरतमंद (needy) लोगों को आशीर्वाद स्वरूप (as blessings) दे सकते हैं। इससे उनके जीवन में भी सकारात्मकता आती है। यह बहुत बड़ा पुण्य (virtue) का काम है।

💫 अक्षय लक्ष्मी का आमंत्रण (Invitation to Inexhaustible Wealth)

हरसिंगार का बाँदा सिर्फ एक पौधा नहीं है, यह अक्षय लक्ष्मी (inexhaustible wealth) का आमंत्रण है। यह आपके जीवन में ऐसी समृद्धि लाता है जो कभी खत्म नहीं होती। लेकिन याद रखें, यह कोई जादू नहीं है। यह आपकी मेहनत (hard work) और ईमानदारी (honesty) को बढ़ाने का काम करता है।

🌿 होश और साक्षी भाव (Awareness and Witness Consciousness)

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण है होश और साक्षी भाव। बाँदा लाते समय, उसकी पूजा करते समय पूरे होश में रहें। उसकी शक्ति को महसूस करें। उसके प्रति श्रद्धा (reverence) और सम्मान (respect) का भाव रखें। यही सबसे बड़ी साधना है।

🔥 सिद्धि का रहस्य (Secret of Siddhi)

दोस्तों, हरसिंगार का बाँदा अपने आप में बहुत शक्तिशाली है, लेकिन इसे सिद्ध (empowered) करने से इसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। सिद्ध करने के लिए खास मंत्र और विधि (special mantra and method) होती है।

अगर आपके पास हरसिंगार का बाँदा है और आप उसे सिद्ध करना चाहते हैं, तो मुझे इनबॉक्स (inbox) में मैसेज करें। मैं आपको सिद्ध करने का मंत्र और पूरी विधि बता दूंगा।

यह बहुत ही गुप्त (secret) और पावरफुल (powerful) जानकारी है, इसलिए यहां सार्वजनिक रूप से नहीं बता सकते।

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दोस्तों, अगली पोस्ट में मैं आपको और भी खास बाँदों के बारे में बताऊंगा - नीम का बाँदा, आम का बाँदा, बरगद का बाँदा, और उनके अलग-अलग फायदे।

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ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः 🙏

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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

श्रीविद्या साधना प्रणाली?.

क्या है तांत्रोत्क श्रीविद्या साधना प्रणाली?.
साधना के प्रकार;- 

यह साधना मुख्यतः दो प्रकार से की जाती है :-

प्रथम प्रकार में (दीक्षा लेकर):- 

1-श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा लेकर साधना संपन्न की जाती है, जिसका प्रथम चरण पूर्ण होने के बाद शेष तीन चरणों के लिए साधक स्वतन्त्र हो जाता है, और केवल कर्ता व दृष्टा मात्र होता है, क्योंकि प्रथम पद धर्म में स्थित होने के बाद के तीनों चरणों में पराम्बा द्वारा अपने साधक को स्वयं में लीन कर लेने तक की क्रिया को पराम्बा अपने साधक से स्वयं ही संपन्न कराती है, और इसी मध्य पराम्बा अपने साधक के सभी कर्मों को भी आंशिक रूप में भोगवाकर कर्मों के बंधन से निवृत कर देती है, क्योंकि मोक्ष के लिए कर्म बंधन से निवृत्ति परम अनिवार्य है ! 

2-इस प्रकार से शेष तीन चरण भी सहज ही संपन्न हो जाते हैं, और साधक को नियमों की बाध्यता भी प्रभावित नहीं करती है ! यह विधि सर्वोत्तम है क्योंकि इसमें एक बार प्रथम चरण किसी प्रकार पूर्ण होने के बाद साधक पर पराम्बा का स्वतन्त्र नियन्त्रण हो जाने के कारण पथभ्रष्ट, पतन व त्रुटि होने की सम्भावनाएं पुर्णतः शून्य हो जाती हैं ! 

3-किन्तु इस विधि से साधना करने वाले साधक को गुरुगम्य होना भी अनिवार्य होता है, तभी तो गुरु उस शिष्य की पात्रता व ग्राह्यता के आधार पर उसको गहन रहस्यों को समझाते हुए सफल होने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है !

दुसरे प्रकार में (दीक्षा अनिवार्य नहीं ) :-

1-उपरोक्त महाविद्या शक्तियों की बालरूपा से वृद्धा रूपा तक की चारों महाविद्याओं की एक-एक करके क्रमशः क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करते हुए साधना की जाती है, इसमें प्रत्येक अवस्था के अनुसार पृथक-पृथक नियमों की बाध्यता सहित साधना विधान पूर्ण करना 

पड़ता है ! 

2-यह अनिवार्य नहीं होता है कि चारों महाविद्याओं के पृथक-पृथक साधना विधान एक-एक या दो-दो बार में ही निर्बाध संपन्न हो जायेंगे! 

3-यदि यह क्रम पूर्ण हो जाए तब पराम्बा चतुर्थ चरण में अपने साधक के सभी कर्मों को भी आंशिक रूप में भोगवाकर कर्मों के बंधन से निवृत कर उसका मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है !

4-किन्तु चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले साधकों को अकेले किसी एक महाविद्या की साधना करके चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेने की भावना व आग्रह से सदैव दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि यदि आप केवल धर्म की सूचक बाल स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो धर्म के साथ-साथ आपके पास धन व सत्ता भी हो यह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि बाल स्वरुपा महाविद्या पुर्णतः धर्म ही सिखाती हैं ! 

5-और यदि आप केवल अर्थ की सूचक तरुण स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो थोड़ा सा धन हाथ में आते ही आप धर्म को कैसे भूल जाते हैं यह आपको स्वयं ही ज्ञात है, क्योंकि तरुण स्वरुपा महाविद्या अतिशय धन के मार्ग बनाती हैं ! 

6-इसी प्रकार से यदि आप केवल काम की सूचक प्रौढ़ा स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो थोड़ा सा धन ओर भले ही छोटा सा ग्राम प्रधान के रूप में थोड़ी सत्ता हाथ में आते ही आप धर्म, नीति ओर मानवता को कैसे भूल जाते हैं यह भी आपको स्वयं ही ज्ञात है, क्योंकि प्रौढ़ा स्वरुपा महाविद्या शासन सत्ता प्रदान करती हैं !

7- तो फिर ऐसे में कर्म बंधन से मुक्त हुए बिना चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति केवल दिवास्वपन से अधिक और कुछ नहीं है, किन्तु यदि धर्म की सूचक बाल स्वरुपा महाविद्या की उपासना व उसका अनुसरण करते हैं तो धर्म जनित संस्कार आपको मोक्ष मार्गी होने के लिए प्रेरित अवश्य ही करेंगे !

8-चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले साधकों को श्रीविद्या क्रम के सम्पूर्ण चारों क्रम की साधना को संपन्न करना चाहिए ! और इस प्रकार से किसी भी कुल में श्रीविद्या की चारों क्रम की पूर्ण साधना संपन्न कर चुका साधक धर्म से प्रारम्भ होकर मोक्ष तक निश्चित ही पहुँच जाता है, यह परम सत्य है !

श्रीविद्या साधना क्रम;-‘

`1-दस महा-विद्याओ’ में तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि वास्तव में आदि-शक्ति एक ही हैं, उन्हीं का आदि रुप ‘काली’ है और उसी रुप का विकसित स्वरुप ‘षोडशी’ है, इसी से ‘षोडशी’ को ‘रक्त-काली’ नाम से भी स्मरण किया जाता है । भगवती तारा का रुप ‘काली’ और ‘षोडशी’ के मध्य का विकसित स्वरुप है । प्रधानता दो ही रुपों की मानी जाती है और तदनुसार ‘काली-कुल′ एवं ‘श्री-कुल′ इन दो विभागों में दशों महा-विद्यायें परिगणित होती हैं ।

2-माँ की पूजाप्रधान रूप से चार स्वरूपों में होती है ।भगवती षोडशी के मुख्यतःचार रुप हैं ;–

( 1) श्री बाला त्रिपुर-सुन्दरी या श्री बाला त्रिपुरा,

( 2) श्री षोडशी या महा-त्रिपुर सुन्दरी तथा

( 3) श्री राज-राजेश्वरी

( 4)ललिता त्रिपुर-सुन्दरी या श्री श्रीविद्या

 3-माँ की दीक्षा और साधना भी इसी क्रम में करनी चाहिए। 

 3-1- श्री बाल सुंदरी >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म,

 3-2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ

 3-3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम

 3-4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष

4-श्री विद्या की प्रधान देवि ललिता त्रिपुर सुन्दरी है । यह धन, ऐश्वर्य भोग एवं मोक्ष की अधिष्ठातृ देवी है । अन्य विद्यायें को मोक्ष की विशेष फलदा है, तो कोई भोग की विशेष फलदा है परन्तु श्रीविद्या की उपासना से दोनों ही करतल-गत हैं ।

5-इसकी उपासना तंत्रों में अति रहस्यमय व गुप्त है तथा पूर्व जन्म के विशेष संस्कारों के बलवान होने पर ही इस विद्या की दीक्षा का योग माना है । साधक को क्रम-पूर्वक दीक्षा लेनी चाहिए तभी उत्तम रहता है । कहीं-कहीं ऐसा देखा गया है कि जिन्होंने क्रम-दीक्षा के बिना ललिता त्रिपुर सुन्दरी की उपासना सीधे की है, उन्हें पहले आर्थिक कठिनाईयाँ प्राप्त हुई है एवं बाद में उसका विकास हुआ ।

1-श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी साधना क्रम;-

1-‘श्री बाला’ का मुख्य मन्त्र तीन अक्षरों का है और उनका पूजा-यन्त्र ‘नव-योन्यात्मक’ है । अतः उन्हें ‘त्रिपुरा’ या ‘त्र्यक्षरी’ नामों से भी अभिहित करते हैं ।

2-श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:- 

ॐ - ऐं - क्लीं – सौः

रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। 

51 माला मंत्र 21 दिन तक लगातार जप अवश्य करें ।

3-मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर 

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2-षोडशी त्रिपुर सुंदरी साधना क्रम;-

1-ध्यान मंत्र;-

बालार्कायुंत तेजसं त्रिनयना रक्ताम्ब रोल्लासिनों। 

नानालंक ति राजमानवपुशं बोलडुराट शेखराम्।। 

हस्तैरिक्षुधनु: सृणिं सुमशरं पाशं मुदा विभृती। 

श्रीचक्र स्थित सुंदरीं त्रिजगता माधारभूता स्मरेत्।।

2-आवाहन मंत्र;-

ऊं त्रिपुर सुंदरी पार्वती देवी मम गृहे आगच्छ आवहयामि स्थापयामि।

रुद्राक्ष/कमल गट्टे की माला लेकर करीब नीचे लिखे मंत्र का जप करें 

3-पंचदशी मंत्र:-

ॐ क ए इ ल ह्रीं ।

ह स क ह ल ह्रीं। 

स क ल ह्रीं ॥

श्रावण मास में आराधना;-

1-श्रावण मास में शिव कृपा पाने के लिए भक्त कई तरह की पूजा करते हैं। इस दौरान यदि माता त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जाए, तो भक्त कई परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। मां त्रिपुर सुंदरी पार्वती का ही रूप हैं और इन्हें प्रसन्न करने का अर्थ है, शिव कृपा की प्राप्ति। यह मास पूजा-पाठ एवं शिव आराधना का महीना है। इस दौरान शिव जी की स्तुति करने से भक्तों के जीवन में खुशहाली आती है और उनके राह की बाधाएं भी दूर होती हैं। इस मास में शिव आराधना का काफी अधिक महत्व है।

2-दरअसल हमार जीवन एवं शरीर नौ ग्रहों से प्रेरित होता है। इन ग्रहों में चंद्रमा पृथ्वी के निकटस्थ होने की वजह से हमारे शरीर पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। चंद्रमा के स्वामी हैं, शिव। श्रावण ऐसा मास है, जिसमें वातावरण में अत्यधिक नमी होती है। यह सब चंद्रमा के प्रभाव की वजह से होता है। इसलिए इस मास में शिव को प्रसन्न करने का उपाय किया जाता है, ताकि उनकी कृपा से शिव कृपा से भी भक्त लाभान्वित हो जाएं।

3- अगर चंद्रमा की कृपा भक्तों पर हो जाए, तो हमें राजसी सुख मिल सकते हैं और यश भी मिलता है। अगर व्यापारिक क्षेत्रों में तरक्की चाहते हों, तो वे इस मास में किसी भी सप्ताह यह साधना कर सकते हैं। दस महाविधाओं में से एक महाविद्या त्रिपुर सुंदरी, राज राजेश्वरी, षोड्षी, पार्वती जी की सूक्ष्म साधना भी लाभप्रद साबित हो सकती है।

4-इस मास के लिए किसी भी सोमवार से अगले सोमवार तक साधना की जा सकती है। प्रात: से लेकर रात्रि तक जो भी समय सुविधापूर्ण लगे, उसमें साधना की जा सकती है। साधना काल के सप्ताह में मांस, मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। साथ ही अनैतिक कृत्यों से भी बचना चाहिए।

5-साधना आरंभ करने से पहले स्नान आदि कर शुद्ध होकर सफेद वस्त्र धारण करें। इसके बाद रेशमी या सफेद रंग के वस्त्र का आसन लें। एक सुपारी को कलावे से अच्छी तरह लपेटकर उसे एक थाली में सफेद वस्त्र के ऊपर रखें। अब देवी पार्वती का ध्यान करते हुए उनसे प्रार्थना करते हुए उनसे उस सुपारी में अपना अंश प्रदान करने की प्रार्थना करें। यह क्रिया ग्यारह बार करें। अब देवी का ध्यान, आवाहन मंत्र जपे।

6-इसके बाद देवी को सुपारी में प्रतिष्ठित कर दें। इसे तिलक करें और धूप-दीप आदि पूजन सामग्रियों के साथ पंचोपचार विधि से पूजन पूर्ण करें अब कमल गट्टे की माला लेकर उपरोक्त लिखे मंत्र का जप करें

7-जब मंत्र जप पूर्ण हो जाए, तो देवी जी से आज्ञा लेकर अपने द्वारा की गई गलतियों की क्षमा मांगकर पूजन कार्य समाप्त करें। यह प्रक्रिया लगातार सात दिनों तक करें। आठवें दिन खील, सफेद तिल, बताशे, चीनी और गुलाब के फूल, बेल पत्र को एक साथ मिलाकर 108 आहूतियों से हवन करें। हवन के लिए मंत्र के आगे ऊं नम: स्वाहा: जोड़कर मंत्रोच्चार करें।

8-साधना आरंभ करने से पहले यह संकल्प जरूर लें कि साधना का उद्देश्य क्या है और यथाशक्ति दान क्या होगा? इस साधना से आपकी कामना पूरी होगी और शिव कृपा भी मिलेगी। पूजा के बाद पूजन सामग्री को एक जगह इकट्ठा कीजिए और देवी से प्रार्थना करें कि वे अब अपने स्थान पर वापस जा सकती हैं। उन्हें धन्यवाद देते हुए साधना का विसर्जन करें। इसके बाद सारी पूजन सामग्री की माला ,प्रतिष्ठित सुपारी को आदरपूर्वक नदी में विसर्जित करें।

9-मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है ।

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3-श्रीराज-राजेश्वरी साधना क्रम;-

श्री राजराजेश्वरी महाविद्या का मूल स्वरूप और साधना विधान ;-

1-भगवती राजराजेश्वरी मूलप्रकृति शक्ति की सुन्दर प्रौढ़ावस्था स्वरूप श्री विग्रह वाली देवी हैं । उदय कालीन सूर्य के समान जिनकी कान्ति है, चतुर्भुजी, त्रिनेत्री, पाश, अंकुश, इक्षु (गन्ना) व पद्म की मुद्रा को धारण किये हुए हैं ।

2- ये भगवती सहज व शांत मुद्रा में सृष्टि संचालक ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र व इन्द्र रूपी चार स्तम्भों के ऊपर स्थित पंचमहाभूतों के संयुक्त स्वरूप शिव रूपी आधारपृष्ठ पर माया "ह"कार की मुद्रा में विराजमान होती हैं । जो जीव इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और कुबेर में कोई भेद नहीं रह जाता है । ललिता, राजराजेश्वरी, षोडशी, बाला, आदि इनकी विभिन्न अवस्थाओं नाम हैं ।

3-भगवती राजराजेश्वरी श्यामा और अरूण वर्ण के भेद से दो कही गयी है प्रथम श्यामा रूप में श्री आनन्दभैरवी, कहलाती हैं तथा द्वितीय अरूण वर्णा श्री राजराजेश्वरी कहलाती हैं ।

4-ये शक्ति तीनों लोकों के समस्त शासन, सत्ता, आदि राजसी सर्वैश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, इसलिए ये राजराजेश्वरी, कमला, महाराज्ञी व महासम्राज्ञी कहलाती हैं ।

5-भगवती राजराजेश्वरी इस सृष्टि के सर्वोच्च आध्यात्म साधना विधान "श्रीविद्या" समूह के अधीन तृतीय पुरुषार्थ "काम" की कुल भेद के अनुसार चार अधिष्ठात्रियों में से एक देवी हैं, व अखिल ब्रह्माण्ड के द्योतक श्रीचक्र में इनका निवास माना जाता है, जिस कारण इनको श्रीविद्या की देवी व श्रीचक्रराज निलया के रूप में भी जाना जाता है।

6-इनकी साधना (अर्थात जप, तप, आत्मसंधान, यज्ञ आदि के द्वारा परा या अपरा अवस्था में स्वयं को इनकी शक्ति में अथवा इनकी शक्ति को स्वयं में विलय करने की प्रक्रिया) प्रमुख रूप में निम्नलिखित दो प्रकार से की जाती है :-

1- महाविद्या साधना विधान :-

1-1-राजराजेश्वरी महाविद्या के रूप में पंचदशाक्षरी मन्त्रों से इनकी साधना की जाती है, महाविद्या रूप में इनकी साधना को संपन्न करने से इस साधना के परिणाम स्वरूप भगवती राजराजेश्वरी अपने महाविद्या साधक के जीवन को समस्त प्रकार के केवल भौतिक शासन, सत्ता, राज सुख, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, धन, धान्य, समृद्धि रत्न, पुत्र आदि सर्वैश्वर्यों से सम्पन्न कर देती हैं !

1-2-महाविद्या के रूप में इनकी साधना करने से केवल भौतिक सम्पन्नता की ही प्राप्ति होती है, जिस सम्पन्नता के मद में स्वार्थवश जीव अपनी मानवीय, धार्मिक, नैतिक व न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने से तनिक भी नहीं चूकता है ! अतः इस प्रकार से की जाने वाली साधना पुर्णतः भौतिक साधना होती है, जिसमें धर्म व आध्यात्म की उपस्थिति व लाभ अनिवार्य नहीं होता है, साधक स्वयं के प्रयास से स्वयं को मानवीय, धार्मिक, नैतिक व न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने से रोक कर आध्यात्मिक बना रह सकता है !

यह साधना मन्त्र भेद के अनुसार 11, 21 या 41 दिन में विधिवत् सम्पन्न कर ली जाती है !

2- श्रीविद्या साधना विधान :-

2-1-श्रीकुल की रीती से "श्रीविद्या पूर्णाभिषेक" में दीक्षित हुआ साधक अपनी श्रीविद्या साधना के अन्तर्गत श्रीविद्या के नियमानुसार "षोडशाक्षरी विद्या" द्वारा सबसे पहले प्रथम पुरुषार्थ "धर्म" की अधिष्ठात्री के रूप में बालस्वरुप व द्वितीय पुरुषार्थ "अर्थ" की अधिष्ठात्री की अधिष्ठात्री तरुण स्वरूपा की साधना सम्पन्न करने के उपरान्त तृतीय पुरुषार्थ "काम" की अधिष्ठात्री के प्रौढ़ स्वरूप में भगवती राजराजेश्वरी का ध्यान करते हुए इनकी साधना को सम्पन्न करता है !

2-2-साधक की यह साधना विधिवत् संपन्न हो जाने पर भगवती राजराजेश्वरी अपने श्रीविद्या साधक के निष्पाप "धर्म व अर्थमय" जीवन को "धर्म व अर्थ से परिपूर्ण काम" पुरुषार्थ प्रदान कर समस्त प्रकार के शासन, सत्ता, राज सुख, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, धन, धान्य, समृद्धि रत्न, पुत्र आदि सर्वैश्वर्यों से सम्पन्न कर उसके लिए शेष अन्तिम पुरुषार्थ "मोक्ष" पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर उसको अग्रिम साधना की ओर अग्रसारित करने के साथ ही उसकी साधना में "मोक्ष" पुरुषार्थ प्राप्त होने तक आध्यात्म मार्ग में स्वयं उसका पूर्ण मार्गदर्शन व सहयोग करती हैं ।

2-3-इस प्रकार से की गई साधना पूर्ण रूप से आध्यात्मिक साधना होती है, क्योंकि इस साधनाकाल में भगवती षोडशी द्वारा पहले ही श्रीविद्या साधक को "धर्म" में स्थित कर दिए जाने पर भगवती त्रिपुरसुन्दरी द्वारा "धर्म से परिपूर्ण अर्थ" पुरुषार्थ प्रदान किया जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप वाह्यान्तर से निष्पाप हो चुका व "धर्म से परिपूर्ण अर्थ व काम" से समृद्ध हुआ साधक नीति, धर्म, मानवता व न्याय के विपरीत कोई कर्म ही नहीं करता है !

2-4-श्रीविद्या साधना विधान "षोडशाक्षरी विद्या" के अन्तर्गत होने के कारण पृथक से किसी महाविद्या की दीक्षा नहीं लेनी होती है, केवल श्रीविद्या साधना विधान के अनुसार साधक के प्रथम व द्वितीय पुरुषार्थ "धर्म व अर्थ" में स्थित हो जाने पर यह साधना भगवती राजराजेश्वरी द्वारा स्वयं ही सम्पन्न करा ली जाती है !

2-5-इनकी उपासना (अर्थात विभिन्न प्रकार से पूजा, पाठ, अर्चना, यज्ञ, स्तोत्र, भक्ति, आदि के द्वारा इनको परा अवस्था में प्रसन्न (सिद्ध) कर मनोरथ सिद्ध करना, अथवा परा या अपरा अवस्था में स्वयं को इनकी शक्ति में अथवा इनकी शक्ति को स्वयं में विलय करने की प्रक्रिया) "महाविद्या" व "श्रीविद्या" दोनों ही विधान में दीक्षित हुए साधकों द्वारा श्रीचक्र (श्री यन्त्र) या नव योनी चक्र के केंद्र में प्रौढ़स्वरुप में की जाती है ।

2-6-भगवती राजराजेश्वरी अपने स्वभाव के अनुसार ही "महाविद्या" व "श्रीविद्या" दोनों ही विधान में दीक्षित होकर साधना पूर्ण कर चुके साधकों को शासन, सत्ता व राजसुख अवश्य ही प्रदान करती हैं !

2-7-जिस प्रकार जंगल की सूखी हुयी घास और पत्तियों को प्रचंड

अग्नि एक क्षण में जला देती है ठीक उसी प्रकार ये साधना पूर्व

जीवन और इस जीवन के सभी पापों को एक ही क्षण में समाप्त

कर भस्मीभूत कर देती है lये साधना तंत्र का आधारहै ,और इसके

बाद कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता हैl

2-8-इस साधना के प्रभाव से साधक सहस्रार से टपकते अमृत को

धारण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है ,और वही अमृत

उसके बिंदु के साथ मिलकर ओजस में परिवर्तित हो जाता है

तथा निर्जरा देह और पूर्ण ऐश्वर्य की प्राप्ति कराता है l

2-9-किसी भी शुक्ल पक्ष की पंचमी को इस साधना का प्रारंभ

किया जाता है , साधना के लिए , श्री यन्त्र की आवशयकता

होती है, श्वेत वस्त्र पहनकर मध्य रात्रि में इस साधना

का प्रारम्भ करे,पूर्ण भगवती राजराजेश्वरी की साधना

में सफलता हेतु श्वेत वस्त्र, आसन, श्वेत पुष्प और खीर

से भगवती और श्री यन्त्र का पूजन करे l ये शास्त्रोक्त पद्धति से पंचोपचार पूजन करने के बाद स्फटिक माला से राजराजेश्वरी मन्त्र की

१०८ माला जप करे,

2-10-दीपक शुद्ध घी का होना चाहिए और इस साधना क्रम को

७ दिनों तक संपन्न करना हैlइस साधना के प्रभाव से स्फटिक

माला विजय माला में परिवर्तित हो जाती हैlइस माला को पूरे

जीवन भर धारण करना हैlराज राजेश्वरी मंत्र में ग की ध्वनि आयेगीl

ये एक अद्विय्तीय साधना है ,जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन को

जगमगाहट से भरा जा सकता हैl

दिव्य भगवती राजराजेश्वरी मंत्र;-

1-''ॐ ऐं ह्रीं श्रीं''

AUM AING HREENG SHREENG

2-षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:-

''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥

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4-माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी आराधना;-

1-ललिता त्रिपुर सुंदरी या त्रिपुर सुंदरी को श्री विद्या भी कहा जाता है ,जो दस महाविद्या में से एक प्रमुख महाविद्या हैं और श्री कुल की अधिष्ठात्री |इन्हें ५१ शक्तिपीठों में भी स्थान प्राप्त है और कामाख्या को भी इनका स्वरुप कहा जाता है [यद्यपि कामाख्या को काली से भी जोड़ा जाता है ]|देवी ललिता आदि शक्ति का वर्णन देवी पुराण में प्राप्त होता है. भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिष में लिंगधारिणीनाम से विख्यात हुईं इन्हें ललिता देवी के नाम से पुकारा जाने लगा.
2-एक अन्य कथा अनुसार ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा जी द्वारा छोडे गये चक्र से पाताल समाप्त होने लगा. इस स्थिति से विचलित होकर ऋषि-मुनि भी घबरा जाते हैं, और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगती है. तब सभी ऋषि माता ललिता देवी की उपासना करने लगते हैं. उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी जी प्रकट होती हैं तथा इस विनाशकारी चक्र को थाम लेती हैं. सृष्टि पुन: नवजीवन को पाती है.
3-श्री ललिता जयंती पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है. पौराणिक मान्यतानुसार इस दिन देवी ललिता भांडा नामक राक्षस को मारने के लिए अवतार लेती हैं. राक्षस भांडा कामदेव के शरीर के राख से उत्पन्न होता है. इस दिन भक्तगण षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते है. इस दिन मां ललिता के साथ साथ स्कंदमाता और शिव शंकर की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है.

4-माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी रक्त काली स्वरूपा हैं।बृहन्नीला तंत्र के अनुसार काली के दो भेद कहे गए हैं कृष्ण वर्ण और रक्त वर्ण।महा विद्याओं में

कोई स्वरुप भोग देने में प्रधान है तो कोई स्वरूप मोक्ष देने में परंतु त्रिपुरसुंदरी अपने साधक को दोनों ही देती है। 

2-शुक्ल पक्ष के समय प्रात:काल माता की पूजा उपासना करनी चाहिए. कालिकापुराण के अनुसार देवी की दो भुजाएं हैं, यह गौर वर्ण की, रक्तिम कमल पर विराजित हैं. प्रतिदिन अथवा पंचमी के दिन ललिता माता के निम्न मंत्र का जाप करने का कुछ विशेष ही महत्व होता है।

माता ललिता का ध्यान धरकर उनकी प्रार्थना एवं निम्न 

मंत्र का जाप करने से मनुष्य सभी कष्टों से मुक्ति पा जाता है।

3-पंचमी के दिन इस ध्यान मंत्र से मां को लाल रंग के पुष्प, लाल वस्त्र आदि भेंट कर इस मंत्र का अधिकाधिक जाप करने से जीवन की आर्थिक समस्याएं दूर होकर धन की प्राप्ति के सुगम मार्ग मिलता है।

4-देवी ललिता जी का ध्यान रुप बहुत ही उज्जवल व प्रकाश मान है. ललिता देवी की पूजा से समृद्धि की प्राप्त होती है. दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को चण्डी का स्थान प्राप्त है. इनकी पूजा पद्धति देवी चण्डी के समान ही है।

5-ललिता माता का पवित्र मंत्र :-

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'

ध्यान मन्त्र से माँ को रक्त पुष्प , वस्त्र आदि चढ़ाकर अधिकाधिक जप करें।

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है। 

 IN NUTSHELL;-

श्रीविद्या साधना संसार की सर्वश्रेष्ठ साधनाओ मे से एक हैं।ध्यान के बिना केवल मन्त्र का जाप करना श्री विद्या साधना नही है।बिना ध्यान के केवल दस प्रतिशत का ही लाभ मिल सकता है।श्रीविद्या साधना में ध्यान का विशेष महत्व हैं। इसलिए पहले ध्यान का अभ्यास करे व साथ-साथ जप करे,अन्त मे केवल ध्यान करें।

साधना क्रम;-

1- श्री बाल सुंदरी >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म,

श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:-

ॐ - ऐं - क्लीं – सौः

मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर

2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ

 षोडशी त्रिपुर सुंदरी(पंचदशी) मंत्र:-

ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं ॥

मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है ।

3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम

षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:-

''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है।

 4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष

 ललिता माता का पवित्र मंत्र :-

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।' 

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

जानिए आपका कौनसा चक्र बिगडा है एवं उसको ठीक कैसे करें-

जानिए आपका कौनसा चक्र बिगडा है एवं उसको ठीक कैसे करें- 

(1) मूलाधार चक्र - गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन ,समृधि ,आत्मबल ,शारीरिक बल ,रोजगार ,कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग ,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार ,डिप्रेशन ,केंसर अदि होता है।
(2) स्वाधिष्ठान चक्र - इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुरियाँ हैं । इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता ,बाँझपन ,मंद्बुधिता ,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।
(3) मणिपूर चक्र - नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता ,गुस्सा ,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया ,दवावो का काम न करना ,अज्ञात भय ,चहरे का तेज गायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता ,हिंशा,दुश्मनी ,अपयश ,अपमान ,आलोचना ,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिरएवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।
(4) अनाहत चक्र - हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है । इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी , जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचनी,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत ,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी अदि ।
(5) विशुद्धख्य चक्र - कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष ,अभिब्यक्ति में कमी ,गले ,नाक,कान,दात, थाई रायेड,आत्मजागरण में बाधा आती है।
(6) आज्ञाचक्र - भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ '?' उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता ,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।
(7) सहस्रार चक्र - सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव ,भाग्य का साथ न देना आदि ।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

सूर्यदेव

#सूर्यदेव साधना।। रवि सप्तमी 8/2/2026 पर अवश्य करें 
       सुख सौभाग्य की वृद्धि के लिए, दुःख दारिद्र्‌य को दूर करने के लिए, रोग व दोष के शमन के लिए इस प्रभावकारी मंत्र की साधना रविवार के दिन करनी चाहिए।
         ॐ सूर्यदेवं नमस्तेस्तु गृहाणं करूणा करं। 
      अर्घ्यं च फलं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम्।। 
       ॐ सर्वतीर्थं समूदभूतं पाद्य गन्धदिभिर्युतम्। 
      प्रचंण्ड ज्योति गृहाणेदं दिवाकर भक्त वत्सलां।। 
                   दिव्यं गन्धाढ़्य सुमनोहरम् । 
          बिलेपनं रश्मिदाता चन्दनं प्रतिगृह यन्ताम्।

इस साधना में रविवार का व्रत अनिवार्य है। व्रत के दिन नमक का उपयोग न करें। रविवार के दिन खुले आकाश के नीचे पूर्व की ओर मुँह करके शुद्ध ऊन के आसन या कुशासन पर बैठकर काले तिल, जौ, गूगल, कपूर और घी मिला हुआ शाकल्य तैयार करके आम की लकड़ियों से अग्नि को प्रदीप्त कर उक्त मंत्र से एक 108आहुतियाँ दें।

मंत्र:-ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः श्रीम्। 
Om hreem ghrani sury aditya shreem. 
सुख सौभाग्य की वृद्धि के लिए, दुःख दारिद्र्‌य को दूर करने के लिए, रोग व दोष के शमन के लिए इस प्रभावकारी मंत्र की साधना रविवार के दिन करनी चाहिए।

तत्पश्चात सिद्धासन लगाकर इसी मंत्र का सौ बार जप करें। जप करते समय दोनों भौंहों के मध्य भाग में भगवान सूर्य का ध्यान करते रहें। इस तरह 11 दिन तक करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। इस साधना में रविवार का व्रत अनिवार्य है।

व्रत के दिन नमक का उपयोग न करें। इसके बाद प्रतिदिन स्नान के बाद ताम्र-पात्र में जल भरकर इसी मंत्र से सूर्य को अर्घ्य दें। जमीन पर जल न गिरे इसलिए नीचे दूसरा ताम्रपात्र रखें। तत्पश्चात इस मंत्र का एक 108बार जप करें।

भगवान सूर्य को नवग्रहों का राजा कहा गया है। जो मनुष्य सूर्य को12 नाम लेते हुए जल अर्पण करते हैं पाप मुक्त होते हुए आरोग्य प्राप्त करते हैं। 
 
                ।।सूर्य अष्टकम।। 
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। 
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥१॥

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥२॥

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥३ ॥

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥४ ॥

बृंहितं तेजसां पुञ्जं वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥५॥

बन्धूकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम् । 
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥६ ॥

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥७ ॥

तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम्। 
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥८॥

मात्र इतना स्तोत्र, मंत्र जप करने से आयुष्य, आरोग्य, ऐश्वर्य और कीर्ति की उत्तरोत्तर वृद्धि होती है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

अश्लेषा नक्षत्र शास्त्रीय, गणितीय एवं दार्शनिक विवेचन सहित"

"अश्लेषा नक्षत्र शास्त्रीय, गणितीय एवं दार्शनिक विवेचन सहित" 

✓•१. प्रस्तावना: वैदिक नक्षत्र–पद्धति भारतीय खगोल–ज्योतिष की अत्यन्त सूक्ष्म एवं गणितीय संरचना पर आधारित है। नक्षत्र केवल तारामण्डलीय खण्ड नहीं, बल्कि काल–चेतना, कर्म–विधान तथा मानसिक प्रवृत्तियों के गूढ़ संकेतक हैं। इन्हीं नक्षत्रों में अश्लेषा को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि यह बंधन, आवेष्टन, विष, रहस्य, गूढ़ बुद्धि तथा मानसिक ग्रन्थियों का प्रतिनिधि है।

अश्लेषा नक्षत्र को सामान्यतः “नाग–नक्षत्र” कहा गया है। यह नक्षत्र चेतना को बाँधने और मुक्त करने—दोनों की क्षमता रखता है। इस शोधप्रबंध में अश्लेषा नक्षत्र का वैदिक–शास्त्रीय, गणितीय–खगोलिक, फलित–ज्योतिषीय, नवांश–कर्मिक, तथा दार्शनिक स्तर पर चरणबद्ध विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।

✓•२. नक्षत्र–स्थान एवं गणितीय संरचना:

✓•२.१ राशि–नक्षत्र सम्बन्ध:
•अश्लेषा नक्षत्र कर्क राशि में स्थित है।
•कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा है।
•अतः अश्लेषा का मूल स्वभाव मानसिक, भावनात्मक एवं स्मृति–प्रधान होता है।

✓•२.२ खगोलीय सीमा (Ecliptic Longitude):
•अश्लेषा नक्षत्र की दीर्घांश सीमा:
कर्क १६°४०′ से कर्क ३०°००′ तक

∆इसे दशांश में व्यक्त करें तो—
•प्रारम्भ: १०६°४०′
•समाप्ति: १२०°००′
यह सीमा नक्षत्र–वृत्त के अंतिम भाग को दर्शाती है, जहाँ चन्द्रमा का ग्रन्थि–स्वरूप अत्यधिक सक्रिय हो जाता है।

✓•२.३ नक्षत्र–विस्तार गणना
•प्रत्येक नक्षत्र का विस्तार =
१३°२०′ (तेरह अंश बीस कला)
अश्लेषा भी इसी गणितीय मान पर स्थित है।

✓•३. वैदिक एवं शास्त्रीय प्रमाण:

✓•३.१ वैदिक सन्दर्भ:
अश्लेषा का सम्बन्ध सर्प–तत्त्व से है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में सर्प को गुप्त शक्ति एवं रहस्यमय चेतना का प्रतीक माना गया है।
अथर्ववेद में सर्प–विद्या को भय और रक्षा—दोनों का कारण कहा गया है।

✓•३.२ तैत्तिरीय संहिता का संकेत

"तैत्तिरीय संहिता","यजुर्वेद" में नागों को अन्तःस्थ शक्तियों का अधिष्ठाता कहा गया है—जो बन्धन भी देती हैं और मुक्ति भी।

 “नागा वै प्राणाः”
(नाग ही प्राण–शक्ति हैं)

यह कथन अश्लेषा की मूल दार्शनिक व्याख्या का आधार है।

✓•४. अश्लेषा नक्षत्र के अधिष्ठाता:

✓•४.१ देवता – नाग (सर्प)
•देवता: नाग
•प्रतीक: सर्प का कुण्डलित रूप
•तत्त्व: विष + औषधि
नाग का अर्थ केवल भौतिक सर्प नहीं, बल्कि कुण्डलिनी शक्ति से भी है।

✓•४.२ नक्षत्र–शक्ति (Shakti):
अश्लेषा की शक्ति –
 विष–प्रयोग द्वारा नियंत्रण एवं उपचार

अर्थात जो व्यक्ति को बाँध भी सकती है और उसी बन्धन से मुक्त भी कर सकती है।

✓•५. नक्षत्र–पाद (चरण) एवं नवांश गणना:
प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं, प्रत्येक का विस्तार:
•३°२०′ (तीन अंश बीस कला)

चरण नवांश राशि मानसिक प्रवृत्ति
प्रथम मेष आक्रामक बुद्धि
द्वितीय वृषभ संग्रहात्मक प्रवृत्ति
तृतीय मिथुन छल–युक्त वाणी
चतुर्थ कर्क भावनात्मक बन्धन

•यह गणना स्पष्ट करती है कि अश्लेषा के प्रत्येक चरण में बंधन की प्रकृति अलग–अलग प्रकार से कार्य करती है।

✓•६. फलित–ज्योतिषीय विश्लेषण:

✓•६.१ चन्द्रमा अश्लेषा में:
•तीव्र स्मरण–शक्ति
•मानसिक चातुर्य
•रहस्यप्रियता
भावनात्मक नियंत्रण की प्रवृत्ति

✓•६.२ लग्न या दशा में अश्लेषा:
व्यक्ति मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने में सक्षम
गुप्त रणनीति
तांत्रिक, औषधीय, विष–विज्ञान या गूढ़ विषयों में रुचि

✓•७. अश्लेषा एवं कर्म–बंधन:
अश्लेषा नक्षत्र को कर्म–ग्रन्थि कहा गया है।
यह नक्षत्र—
•पूर्वज–ऋण
•मानसिक संस्कार
•वाणी से उत्पन्न कर्म
को सक्रिय करता है।

यदि अश्लेषा पीड़ित हो, तो व्यक्ति स्वयं के ही जाल में फँसता है।

✓•८. अश्लेषा नक्षत्र एवं आयुर्वेद:
आयुर्वेद में विष को भी औषधि माना गया है—

 “विषमेव अमृतं भवेत्”

अश्लेषा इसी सिद्धान्त का ज्योतिषीय रूप है।
इस नक्षत्र में जन्मा व्यक्ति—
•विष–औषधि
•मनोचिकित्सा
•हर्बल–टॉक्सिन अध्ययन
में दक्ष हो सकता है।

✓•९. तांत्रिक एवं दार्शनिक पक्ष:
अश्लेषा नक्षत्र का सीधा सम्बन्ध—
•कुण्डलिनी
•नाग–साधना
•मन्त्र–गोपनीयता
से है।

∆यह नक्षत्र बताता है कि—
• बंधन ही मुक्ति का द्वार है।

✓•१०. दोष, शान्ति एवं उपाय:

✓•१०.१ अश्लेषा दोष के लक्षण:
•मानसिक भय
•अवसाद
•वाणी–दोष
•गुप्त शत्रु

✓•१०.२ शान्ति उपाय:
•नाग–पूजन
•चन्द्र शान्ति
•दुग्ध–अभिषेक
•मौन–व्रत
विशेषतः कर्क मास एवं श्रावण में उपाय प्रभावी माने गए हैं।

✓•११. गणितीय निष्कर्ष:
यदि चन्द्रमा की औसत दैनिक गति १३°१०′३५″ मानी जाए, तो—
अश्लेषा में चन्द्रमा का औसत प्रवास ≈ एक दिन
यह नक्षत्र क्षणिक लेकिन तीव्र कर्म–फल देता है।

✓•१२. उपसंहार:
अश्लेषा नक्षत्र केवल भय या विष का प्रतीक नहीं, बल्कि गहन चेतना–परिवर्तन का द्वार है।
यह नक्षत्र बताता है कि—
जो बाँधता है, वही मुक्त करता है।
जो विष है, वही औषधि बन सकता है।
अतः अश्लेषा को समझना, स्वयं के मानसिक बन्धनों को समझने के समान है।