गुरुवार, 22 जनवरी 2026

भगवान विष्णु

★★★भगवान विष्णु ★★★

   √● (१) विष्णु का स्वरूप विष्णु क्या हैं ?- विष्णु का अर्थ है- 'वेवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णुः' जो सर्वत्र व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। वह व्यापनशील तत्त्व जो संसार के कण-कण में व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। यह विष्णु सर्वव्यापक, विश्वात्मा और सर्व नियन्ता है। इसके दो रूप हैं- एक सूक्ष्म सत्ता या वामनरूप (Microcosm), इस रूप में यह अणु या परमाणु (Atom) है। इसका दूसरा रूप है- विराट् सत्ता या बृहत् रूप (Macrocosm), इस रूप में यह ब्रह्माण्ड या संसार (Universe) है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि जो विष्णु है, वही वामन है, अर्थात् विष्णु और वामन एक ही तत्व हैं। 

"वामनो ह विष्णुरास।"
  (शत०१.२.५.५)

√● विष्णु के अणुरूप या अणिमा को वामन कहते हैं और विस्तृत या व्याप्तरूप को भूमा (भूमन्) कहते हैं। यह बीजरूप में अणु या परमाणु (Atom) है। यही विराट् रूप में सृष्टि, ब्रह्माण्ड या संसार है। इस सृष्टि का निर्माण जिस आधार पर हुआ है, वह आधार या ईंट रूप तत्त्व परमाणु है। परमाणु के मध्य में एक धन विद्युत् (Positive) का बिन्दु है, इसे केन्द्र या न्यूक्लियस (Nucleus) कहा जाता है। इसका व्यास एक इंच के दस लाखवें भाग का भी दस लाखवां भाग माना जाता है। परमाणु के अस्तित्व का सार इसी केन्द्र या हृदय भाग में माना जाता है। इसी केन्द्र के चारों ओर लाखों अतिसूक्ष्म विद्युत्- कण चक्कर काटते हैं। ये ऋण विद्युत्-प्रधान (Negative) होने के कारण इलेक्ट्रान (Electron) कहे जाते हैं। ये इलेक्ट्रान केन्द्र से अत्यन्त आकृष्ट हैं और केन्द्र से मिलने के लिए आतुर रहते हैं । अतएव ये केन्द्र के चारों ओर चक्कर काटते रहते हैं।

√●● विज्ञान ने सूक्ष्म (वामन अणु) और विराट् (भूमा) के संबन्ध और कार्यविधि पर विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जो नियम और विधि परमाणु में कार्य कर रही है, वही नियम और विधि ब्रह्माण्ड में भी काम करती है। अतएव कहा गया है कि- 

"यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे।"

  √● अर्थात् जो नियम पिण्ड (अणु) में कार्य कर रहे हैं, वे ही ब्रह्माण्ड में भी चल रहे हैं। इन शाश्वत नियमों को वैदिक भाषा में 'ऋत' (Eternal laws) कहते हैं। इस प्रकार विज्ञान की दृष्टि में भी अणु और ब्रह्माण्ड की रचना में कार्यविधि की दृष्टि से एकरूपता है। इसी विचार से भारतीय मनीषियों ने विष्णु को एक ओर 'अणोरणीयान्' (सूक्ष्म से सूक्ष्मतर) कहा और दूसरी ओर 'महतो महीयान्' (बड़े से बड़ा) कहा है।

√● विष्णु के तीन पग- वेदों के अनेक मंत्रों में विष्णु के तीन पगों (पैरों, चरणों) का उल्लेख मिलता है।

"इदं विष्णुर्वि चक्रमे, त्रेधा निदधे पदम् ।
 समूढमस्य पांसु ।।"
  ( ऋग्० १.२२.१७ । यजु० ५.१५ । अथर्व० ७.२६.४ । साम० २२२)

√● मंत्र का अभिप्राय है कि विष्णु ने पराक्रम किया और उसने तीन पद (पैर, पग) रखे । उसके धूलियुक्त पैरों में सारा संसार व्याप्त है। 

√●विष्णु के तीन पगों की अनेक प्रकार से व्यवस्था की गई है। संसार की दृष्टि से विष्णु के तीन पग हैं- द्यु, अन्तरिक्ष और भूलोक । गुणों की दृष्टि से द्युलोक सात्त्विक है, अन्तरिक्ष राजस और भूलोक (पृथ्वी) तामस है। जीवन की दृष्टि से तीन पग है- आदि, मध्य और अन्त । जन्म, विकास और मृत्यु । सूर्य का उदय होना, मध्याह्न और सायंकाल ये विष्णु (सूर्य) के तीन पग हैं। इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु का आदि, मध्य और अन्त है। इन तीन पगों में जीवन की समग्रता आ जाती है। 

√●मंत्र में 'पांसुरे' (धूलियुक्त) शब्द विचारणीय है। पांसु (धूल, रज) शब्द संकेत करता है कि अणु का स्वरूप कण-रूप है। यह तेजोमय कण है, जो तीन तत्त्वों- प्रोटान (Proton, धनात्मक विद्युत्), इलेक्ट्रान (Electron, ऋणात्मक विद्युत् ) और न्यूट्रान (Neutron, उदासीन) का संमिलित रूप है। इनमें प्रोटॉन प्रेरक तत्त्व है। यह गति और प्रेरणा देता है। इलेक्ट्रान प्रेरित होने वाला तत्त्व है। इसमें प्रेरणा होती है, गति होती है और वस्तु का विकास होता है। न्यूट्रान यह उदासीन तत्त्व है। यह आश्रय, आधार या स्थिति- स्थापक है । इसकी सत्ता से ही उक्त दोनों की स्थिति है। गणित की दृष्टि से इन्हें क्रमशः घन (Plus+), ऋण (Minus) और शून्य (Zero, ०) कह सकते हैं। 

√◆◆पृथ्वी के सात धाम- ऋग्वेद का कथन है कि पृथिवी के सात धाम हैं। उनके आधार पर विष्णु अपना पराक्रम करता है। वहाँ से सारे देव हमारी रक्षा करें। 

"अतो देवा अवन्तु नो, यतो विष्णुर्विचक्रमे ।
 पृथिव्याः सप्त धामभिः ।।"
   ( ऋग्० १.२२.१६)

√● पृथिवी के सात धाम कौन से हैं, जहाँ से विष्णु का पराक्रम प्रारम्भ होता है। पृथिवी के सात धाम से अभिप्राय है- पृथिवी के सात परत, तह (Layers, Strata) । पृथ्वी के नीचे सात परत या तह हैं। पृथिवी की सबसे मोटी परत पहली परत है। इसके नीचे पत्थर या चट्टानों की परत है। उससे नीचे जल, अग्नि, गैस, आदि की परत हैं। अन्त में सातवीं परत में नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) है। यह नाभिकीय ऊर्जा ही पृथिवी को निरन्तर घुमा रही है। नाभिकीय ऊर्जा सहित सातों परत विष्णु के स्थान हैं। सर्वत्र विष्णु व्याप्त है। विष्णु का पराक्रम सातों धाम और मुख्य रूप से नाभिकीय ऊर्जा से प्रारम्भ होता है। इसी से पृथ्वी का रक्षण, संरक्षण, पालन-पोषण होता है। पृथिवी की सारी ऊर्जा का श्रेय विष्णु को है। यदि नाभिकीय ऊर्जा का संरक्षण प्राप्त न हो तो पृथिवी मरुस्थल बन जाएगी। 

√●●विष्णु और वरुण सारे लोकों के धारक- यजुर्वेद के एक महत्त्वपूर्ण मंत्र में कहा गया है कि विष्णु और वरुण के प्रताप से ही सारे लोक रुके हुए हैं। ये दोनों देव सबसे अधिक वीर और पराक्रमी हैं। ये सबसे अधिक बली हैं। इनको किसी अन्य के सहयोग की आवश्यकता नहीं है। ये सबके स्वामी हैं, अतएव इनका सबसे पहले आह्वान किया जाता है । 

"ययोरोजसा स्कभिता रजांसि वीर्येभिर्वीरतमा शविष्ठा । 
या पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन् वरुणा पूर्वहूतौ ।।"
     ( यजु० ८.५९ )

√●लोकों की स्थिरता के लिए दो तत्त्वों की अनिवार्य आवश्यकता है। वे हैं- अग्नि और सोम । सारा संसार अग्नि और सोमीय तत्त्वों के मिश्रण से बना है। अतएव बृहत् जाबाल उपनिषद् में कहा गया है कि- 

"अग्नीषोमात्मकं विश्वम् ।"
     ( बृहत्० उप० २.२)

" अग्नीषोमात्मकं जगत् ।"
    ( बृहत्० उप० २.३)

√● विष्णु नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) होने से अग्नि या आग्नेय तत्त्व है और वरुण सोम या सोमीय तत्त्व है, अतः ये दोनों लोकों के निर्माता, रक्षक और स्थिरता के कारण हैं। इन दोनों की महिमा अपार है। इन्हें किसी अन्य की सहायता और सहयोग अपेक्षित नहीं है। अतएव मंत्र में कहा गया है कि इनकी शक्ति से सारे लोक स्थिर हैं। 

√●विष्णु के सहयोगी वरुण और अश्विनी ऋग्वेद का कथन है कि विष्णु के कार्य को वरुण और अश्विनी अपना सहयोग देकर पूरा करते हैं। विष्णु अपने मित्रों के सहयोग से अंधकार को दूर करता है और प्रकाश फैलाता है। 

"तमस्य राजा वरुणस्तमश्विना, 
क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः ।
 दाधार दक्षमुत्तममहर्विदं, 
व्रजं च विष्णुः सखिवाँ अपोर्णुते ।"
     ( ऋग्० १.१५६.४ )

√●शरीर-संरचना की दृष्टि से विष्णु मेरुदण्ड (Spinal Cord) है। यह उदासीन (Neutral) है। इसमें बहने वाला सोमरस या द्रव (Cerebro- spinal fluid ) है। यह वरुण है। मेरुदंड के दोनों ओर विद्यमान Afferent और Efferent herves ही अश्विनीकुमार रूपी गुगल है । मंत्र का कथन है कि वरुण और अश्विनी के सहयोग से ही विष्णु अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करके मस्तिष्क को ज्ञानरूपी प्रकाश देता है।

√●भौतिकविज्ञान की दृष्टि से विष्णु का अर्थ सूर्य है। सूर्य की किरणों को अश्विनी अर्थात् Electro-magnetic waves पृथिवी तक लाते हैं। वरुण अर्थात् Electron का इसमें सहयोग रहता है। इस प्रकार विष्णु (सूर्य) पृथिवी के अंधकार को दूर करके भूमंडल पर प्रकाश फैलाता है।

√● विष्णु का वृत्त - ऋग्वेद का कथन है कि विष्णु संसार में एक वृत्त (Circle, Circumference) या परिधि के रूप में है। इसके ९०° अंश वाले ४ भाग हैं अर्थात् ९०x४= ३६०° अंश की पूरी परिधि है। विष्णु 'युवा कुमार' है अर्थात् नित्य युवा है और 'बृहत्-शरीरः' बड़े शरीर अर्थात् विराट् रूप में इस वृत्त में विद्यमान है और उसी से कालचक्ररूपी यज्ञ को चला रहा है। 

"चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभि श्चक्रं न वृत्तं व्यतींरवीविपत् ।
 बृहच्छरीरो विभिमान ऋक्वभिर्युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम् ।।"
      ( ऋग्० १.१५५.६)

√● इसका अभिप्राय यह है कि विष्णु विराट् रूप में परिधि (घेरे) की तरह इस पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है । सारा संसार उस घेरे में आ जाता है। ऐसी कोई चीज नहीं है जो वृत्त या घेरे से बाहर हो । इस वृत्त (घेरे) के ९०° अंश वाले चारों भाग हैं अर्थात् ९०x४= ३६०° अंश इस वृत्त के हैं। विष्णु नित्य युवा या तरुण है। यह ब्रह्माण्ड उसका विशाल शरीर है। इस परिधि-रूपी वृत्त से यह कालचन्द्ररूपी यज्ञ सदा चल रहा है।

√★★★ (२) विष्णु का जीव वैज्ञानिक स्वरूप प्रो० रेले (V.G. Rele) ने जीव-विज्ञान की दृष्टि से विवेचन करते हुए यह निष्कर्ष दिया है कि विष्णु पृष्ठवंश या मेरुदण्ड (Spinal Cord) है। विष्णु के विषय में त्रिविक्रम या तीन पग चलना आदि जो बातें कही गई हैं, वे मेरुदण्ड मानने पर सरलता से स्पष्ट हो जाती हैं। 

     √★मनुष्य आदि सभी पृष्ठधारी जीवों में मेरुदण्ड गर्भ में सर्वप्रथम पूर्त रूप लेता है। उसके बाद अन्य अवयवों का प्रादुर्भाव होता है। विष्णु को पृथिवी का धारक माना जाता है। मेरुदंड ही शरीर के सभी अंगों और मांसपेशियों आदि को धारण करता है। यह भूतल या शरीर का सबसे नीचे का भाग है, अतएव इसको विष्णु का प्रथम पग माना जाता है। इसका कार्य है- शरीर की सभी संवेदनाओं का आदान-प्रदान। यह ज्ञानतन्तुओं (Afferent Nerves) के द्वारा संवेदनाओं को ग्रहण करता है और क्रियातन्तुओं (Efferent) के द्वारा उसे कार्यान्वित करता है। मेरुदण्ड में ज्ञान और क्रियात तुओं का जाल बिछा हुआ है। ये तन्तु (Nerves) मेरुदण्ड के दोनों ओर फैले हुए हैं। ज्ञानतन्तुओं से सूचना प्राप्त करना और क्रियातन्तुओं से तदनुसार कार्य करने की प्रेरणा देना इनका कार्य है।

√★मेरुदण्ड के विविध केन्द्र परस्पर जुड़े हुए हैं। ये जब तक पूर्ण विकसित नहीं हो जाते हैं, तब तक बच्चे में इन दोनों प्रकार के तन्तुओं से ही बालक में जीवन-प्रणाली काम करती है। इसके बाद जब भ्रूण विकसित अवस्था में आता है तो इसका संबन्ध केन्द्रीय तन्त्री- जाल (Central Nervous System) से होता है। अब केन्द्रीय तन्त्री-जाल दो प्रकार से कार्य करता है। प्रथम है- बाहर से ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा सूचनाएं प्राप्त करना । यह ज्ञानतन्तुओं (Afferent nerves) का काम है। ये जो सूचनाएं प्राप्त करती हैं, उन्हें ऊपर केन्द्रीय नाडी जाल को भेजती हैं और केन्द्रीय नाडीजाल उन पर अपना निर्णय कार्यतन्तुओं (Efferent) के द्वारा नीचे भेजता है। ज्ञानतन्तुओं की गति धीमी है। ये आसपास के विभिन्न केन्द्रों को उत्तेजित करते हैं और उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे क्रियातन्तुओं को प्रेरित करें कि वे तदनुकूल कार्य करें। क्रियातन्तुओं की गति तीव्र है । 

√★अब ज्ञानतन्तुओं और क्रियातन्तुओं का क्षेत्र बढ़कर मेडुला ऑब्लोंगाटा (Medulla Oblongata) तक हो जाता है। मेडुला ऑब्लोंगाटा बृहत् मस्तिष्क का सबसे नीचे का भाग है। यह मस्तिष्क और मेरुदण्ड के बीच मध्यस्थता का काम करता है। इसका ऊपर संबन्ध बृहत् मस्तिष्क से है और नीचे मेरुदण्ड से। यह मानवशरीर का मध्य या अन्तरिक्ष है। यह विष्णु का द्वितीय पग (Step) है। इसके ऊपर बृहत् मस्तिष्क विष्णु का तृतीय पग माना जाता है। इसको ही मानवशरीर में द्युलोक कहा जाता है। भूरे कण (Grey matter) ज्ञानतन्तु का कार्य करते हैं और श्वेत कण (White matter) क्रियातन्तु का काम करते हैं।

√★ मेडुला ऑब्लोंगाटा के बाद ज्ञानतन्तु थेलमस (Thalamus) तक पहुंचते हैं। थेलमस बृहत् मस्तिष्क के मध्य में स्थित है। यह भूरे कणों का केन्द्र है। थेलमस के द्वारा ही ज्ञानतन्तु बृहत् मस्तिष्क के दोनों भागों तक पहुंचते हैं। थेलमस बृहत् मस्तिष्क के निचले भाग में स्थित है। यहाँ तक विष्णु के द्वितीय पग अर्थात् अन्तरिक्ष का क्षेत्र है । इसके ऊपर द्युलोक अर्थात् बृहत् मस्तिष्क है । द्युलोक या बृहत् मस्तिष्क को अदृश्य बताया गया है। इसका अभिप्राय है कि जो ध्यानी या योगी जन हैं, वे ही इसके क्रिया- कलाप का साक्षात् ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं। 

√★इस प्रकार जीवविज्ञान की दृष्टि से विष्णु के तीन पग क्रमशः नीचे भूलोक से अन्तरिक्ष और अन्तरिक्ष से द्युलोक को जाते हैं। यह विष्णु (मेरुदण्ड) का क्रमिक ऊर्ध्वारोहण है । ये तीन पग ज्ञान तन्तुओं के तीन प्रसारण केन्द्र (Relay stations) समझने चाहिएं । 

√★थेलमस को जीव-विज्ञान की दृष्टि से अग्नि देवता कहा जाता है और बृहत् मस्तिष्क को इन्द्र देवता । इस प्रकार विष्णु, अग्नि और इन्द्र देव संबद्ध हैं और इनका परस्पर आदान-प्रदान है।

"आर्द्रा नक्षत्र"

"आर्द्रा नक्षत्र" 

✓•१. भूमिका: वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों की अवधारणा केवल खगोलीय विभाजन नहीं, अपितु काल, कर्म और चेतना के सूक्ष्म गणित का प्रत्यक्ष निरूपण है। प्रत्येक नक्षत्र निश्चित अंशात्मक परिमाण, चरणात्मक संरचना तथा दार्शनिक अर्थ से संयुक्त होता है। आर्द्रा नक्षत्र इस दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह परिवर्तन, विदारण, दुःख-जन्य बोध तथा नवसृष्टि का नक्षत्र है।

पूर्व प्रस्तुति में नक्षत्र-चरण (पाद) तथा गणितीय मानों का अभाव था। अतः इस शोधप्रबंध में आर्द्रा नक्षत्र का पूर्ण खगोलीय–ज्योतिषीय गणित, चरण-विभाजन, नवांश-संबंध, राशि-अंश, तथा शास्त्रीय प्रमाणों सहित क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।

✓•२. आर्द्रा नक्षत्र : नाम-व्युत्पत्ति एवं निरुक्तीय अर्थ
‘आर्द्रा’ शब्द संस्कृत धातु अर्द् से निष्पन्न है।

∆निरुक्त (यास्क) के अनुसार—

 “अर्दनात् द्रवणात् च आर्द्रा।”

•अर्थात् जो द्रवण, पीड़ा या विदारण के कारण आर्द्रता उत्पन्न करे, वही आर्द्रा है।
यह आर्द्रता केवल भौतिक जल नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक द्रवण का प्रतीक है।

✓•३. खगोलीय एवं गणितीय संरचना (Astronomical & Mathematical Framework):

✓•३.१ नक्षत्र का कुल परिमाण:

∆वैदिक सिद्धान्त के अनुसार—
•सम्पूर्ण राशि-चक्र = ३६० अंश
•कुल नक्षत्र = २७
•एक नक्षत्र का मान =
३६० ÷ २७ = १३ अंश २० कला

∆अतः—
•१ नक्षत्र = १३°२०′

✓•३.२ आर्द्रा नक्षत्र के अंशात्मक मान:
आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में स्थित है।
•मिथुन राशि का आरम्भ = ६० अंश
•आर्द्रा का आरम्भ = ६°४०′ मिथुन
•आर्द्रा का अन्त = २०°००′ मिथुन

∆गणितीय रूप से—
•६°४०′ = ६ + (४० ÷ ६०) = ६.६६… अंश
•२०°००′ = २० अंश

∆अतः आर्द्रा का क्षेत्र =
६°४०′ से २०°००′ (मिथुन राशि)

✓•४. आर्द्रा नक्षत्र के चरण (पाद) : पूर्ण गणितीय विवेचन
•प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण (पाद) होते हैं।
•१ चरण = ३°२०′
•३°२०′ = ३ + (२० ÷ ६०) = ३.३३… अंश

✓•४.१ प्रथम चरण (पाद):
•सीमा : ६°४०′ – १०°००′ मिथुन

∆गणित :
६°४०′ + ३°२०′ = १०°००′
•नवांश राशि : मेष
•नवांश स्वामी : मंगल

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण तीव्र, उग्र, साहसी, विद्रोही एवं कर्मप्रधान होता है। जातक में रुद्र का उग्र स्वरूप प्रधान रहता है।

✓•४.२ द्वितीय चरण (पाद):
•सीमा : १०°००′ – १३°२०′ मिथुन
•नवांश राशि : वृषभ
•नवांश स्वामी : शुक्र

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण आर्द्रा की कठोरता में स्थायित्व, भोग, कला एवं आकर्षण जोड़ता है। मानसिक द्वन्द्व अधिक होता है।

✓•४.३ तृतीय चरण (पाद):
•सीमा : १३°२०′ – १६°४०′ मिथुन
•नवांश राशि : मिथुन
•नवांश स्वामी : बुध

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण बौद्धिकता, तर्क, विज्ञान, लेखन, शोध एवं भाषिक क्षमता को प्रबल करता है। आर्द्रा का दार्शनिक रूप यहाँ स्पष्ट होता है।

✓•४.४ चतुर्थ चरण (पाद):
•सीमा : १६°४०′ – २०°००′ मिथुन
•नवांश राशि : कर्क
•नवांश स्वामी : चन्द्र

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण अत्यन्त भावनात्मक, करुणाशील, संवेदनशील तथा अन्तर्मुखी होता है। यहाँ आर्द्रा की ‘आर्द्रता’ पूर्ण रूप से प्रकट होती है।

✓•५. नक्षत्र-स्वामी, देवता एवं तत्त्व:
•नक्षत्र स्वामी : राहु
•अधिदेवता : रुद्र
•तत्त्व : जल
•गुण : तामस-रजस मिश्रित
•गण : मनुष्य

•बृहत्पाराशर होराशास्त्र में राहु को असामान्य कर्मपथ का कारक कहा गया है। अतः आर्द्रा जातक परम्परागत मार्ग से भिन्न दिशा में अग्रसर होते हैं।

✓•६. वैदिक एवं शास्त्रीय प्रमाण:

✓•६.१ ऋग्वेद:

ऋग्वेद (२।३३।११)—

 “मृळा नो रुद्रो मृळयति।”

•रुद्र यहाँ संहारक ही नहीं, बल्कि उपचारक भी हैं। यही द्वैत आर्द्रा नक्षत्र का मूल है।

✓•६.२ तैत्तिरीय संहिता:

 “नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः।”

•यह श्लोक रुद्र की उग्र शक्ति के शमन का संकेत देता है—आर्द्रा में शमन अनुभव के पश्चात् होता है।

✓•७. मनोवैज्ञानिक एवं कर्मफलात्मक विश्लेषण:

∆आर्द्रा नक्षत्र में जन्मा जातक—
•तीव्र मानसिक संघर्ष से गुजरता है
•अचानक परिवर्तन झेलता है
•दुःख के माध्यम से बोध प्राप्त करता है
•वैज्ञानिक, ज्योतिषी, दार्शनिक या शोधकर्ता बनता है
यह नक्षत्र कर्म-शोधन का कार्य करता है।

✓•८. नवांश एवं आर्द्रा का विशेष सम्बन्ध:
•आर्द्रा के चारों चरण चार भिन्न नवांशों में स्थित होकर यह स्पष्ट करते हैं कि—
•आर्द्रा एक बहु-आयामी नक्षत्र है
•केवल राशि से नहीं, नवांश से फल का निर्णय आवश्यक है

∆विशेषतः चतुर्थ चरण (कर्क नवांश) में आर्द्रा जातक आध्यात्मिक पीड़ा के उच्चतम स्तर को स्पर्श करता है।

✓•९. आध्यात्मिक दृष्टि से आर्द्रा:
आर्द्रा नक्षत्र रुद्र-तत्त्व का प्रत्यक्ष क्षेत्र है। यह नक्षत्र—
•महामृत्युंजय जप
•रुद्राभिषेक
•तांत्रिक साधना
के लिए अत्यन्त प्रभावी माना गया है।

∆उपनिषदों का वाक्य—

 “दुःखमेव ज्ञानाय कल्पते।”

आर्द्रा नक्षत्र का दार्शनिक सूत्र है।

✓•१०. निष्कर्ष: गणितीय, खगोलीय, शास्त्रीय एवं दार्शनिक—चारों स्तरों पर विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि आर्द्रा नक्षत्र परिवर्तन का गणितीय सूत्र है। इसके चरण, अंश, नवांश और देवता—सभी मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि—

• विनाश के बिना नवसृजन सम्भव नहीं।

आर्द्रा नक्षत्र मानव चेतना को विदीर्ण कर उसे उच्चतर बोध की ओर ले जाता है। यही इसका वास्तविक ज्योतिषीय एवं आध्यात्मिक महत्त्व है।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

"याजुषज्योतिषम्"

"याजुषज्योतिषम्" 

पंचसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम् ।
दिनर्त्वयनमासांगं प्रणम्य शिरसा शुचिः ॥ १॥

ज्योतिषामयनं पुण्यं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।
विप्राणां सम्मतं लोके यज्ञकालार्थ सिद्धये ॥ २॥

वेद हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः ।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान् ॥ ३॥

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा ।
तद्वद्वेदांगशास्त्राणां ज्यौतिषं मूर्धानि स्थितम् ॥ ४॥

ये बृहस्पतिना भुक्ता मीनात्प्रभृति राशयः ।
ते हृताः पंचभिर्भूता यः शेषः स परिग्रहः ॥ ०॥

माघशुक्लप्रपन्नस्य पौषकृष्णसमापिनः ।
युगस्य पंचवर्षस्य कालज्ञानं प्रचक्षते ॥ ५॥

स्वराक्रमेते सोमार्कौ यदा साकं सवासवौ ।
स्यात्तदादियुगं माघस्तपः शुक्लोऽयनं ह्युदक् ॥ ६॥

प्रपद्यते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक् ।
सार्पार्धे दक्षिणार्कस्तु माघश्रावणयोः सदा ॥ ७॥

धर्मवृद्धिरपां प्रस्थः क्षपाह्रास उदग्गतौ ।
दक्षिणे तौ विपर्यासः षण्मुहूर्त्ययनेन तु ॥ ८॥

प्रथमं सप्तमं चाहुरयनाद्यं त्रयोदशम् ।
चतुर्थं दशमं चैव द्विर्युग्मं बहुलेप्यृतौ ॥ ९॥

वसुस्त्वष्टा भवोऽजश्च मित्रः सर्पोऽश्विनौ जलम् ।
धाता कश्चायनाद्याः स्युरर्धपंचमभस्त्वृतुः ॥ १०॥

एकान्तरेऽह्नि मासे च पूर्वान् कृत्वादिमुत्तरः ।
अर्धयोः पंचवर्षाणामृदु पंचदशाष्टमौ ॥ ११॥

द्युहेयं पर्व चेत्पादे पादस्त्रिंशत्तु सैकिका ।
भागात्मनापवृज्यांशान् निर्दिशेदधिको यदि ॥ १२॥

निरेकं द्वादशाभ्यस्तं द्विगुणं गतसंज्ञिकम् ।
षष्ट्या षष्ट्या युतं द्वाभ्यां पर्वणां राशिरुच्यते ॥ १३॥

स्युः पादोऽर्धंत्रिपाद्याया त्रिद्वयेकऽह्नः कृतस्थितिम् ।
साम्येन्दोस्तृणोऽन्ये तु पर्वकाः पंच सम्मिताः ॥ १४॥

भांशाः स्युरष्टकाः कार्याः पक्षद्वादशकोद्गताः ।
एकादशगुणश्चोनः शुक्लेऽर्धं चैन्दवा यदि ॥ १५॥

नवकैरुद्गतोंशः स्यादूनः सप्तगुणो भवेत् ।
आवापस्त्वयुजेऽर्धं स्यात्पौलस्ये।आस्तंगतेऽपरम् ॥ १६॥

जावाद्यंशैः समं विद्यात् पूर्वार्धे पर्व सूत्तरे ।
भादानं स्याच्चतुर्दश्यां काष्ठानां देविना कलाः ॥ १७॥

जौ द्रा गः खे श्वे ही रो षा श्चिन्मूषक्ण्यः सूमाधाणः ।
रे मृ घाः स्वापोजः कृष्यो ह ज्येष्ठा इत्यृक्षा लिंगैः ॥ १८॥

कार्या भांशाष्टकास्थाने कला एकान्नविंशतिः ।
उनस्थाने त्रिसप्तति मुद्ववपेदूनसम्भवे ॥ १९॥

तिथिमेकादशाभ्यस्तां पर्वभांशसमन्विताम् ।
विभज्य भसमूहेन तिथिनक्षत्रमादिशेत् ॥ २०॥

याः पर्वाभादानकलास्तासु सप्तगुणां तिथिम् ।
युक्त्या तासां विजानीयात् तिथिभादानिकाः कलाः ॥ २१॥

अतीतपर्वभागेभ्यः शोधयेद् द्विगुणां तिथिम् ।
तेषु मण्डलभागेषु तिथिनिष्ठांगतो रविः ॥ २२॥

विषुवन्तं द्विरभ्यस्तं रूपोनं षड्गुणीकृतम् ।
पक्षा यदर्धं पक्षाणां तिथिः स विषुवान् स्मृतः ॥ २३॥

पलानि पंचाशदपां धृतानि तदाढकं द्रोणमतः प्रमेयम् ।
त्रिभिर्विहीनं कुड्वैस्तु कार्यं तन्नाडिकायास्तु भवेत् प्रमाणम् ॥ २४॥

एकादशभिरभ्यस्य पर्वाणि नवभिस्तिथिम् ।
युगलब्धं सपर्व स्याद् वर्तमानार्कभं क्रमात् ॥ २५॥

सूर्यर्क्षभागान् नवभिर्विभज्य शेषान् द्विरभ्यस्य दिनोपभुक्तिः ।
तिथेर्युता भुक्तिदिनेषु कालो योगो दिनैकादशकेन् तद्भम् ॥ २६॥

त्र्यंशो भशेषो दिवसांशभागश्चतुर्दशस्याप्यपनीय भिन्नम् ।
भार्धेऽधिके चाधिगते परोंऽशोद्वावुत्तमे तन्नवकैरवेत्य ॥ २७॥

त्रिंशत्यह्नां सषट्षष्टिरब्दः षट् चर्तवोऽयने ।
मासा द्वादश सौर्याः स्युरेतत् पंचगुणं युगम् ॥ २८॥

उदयावासवस्य स्युर्दिनराशि सपंचकः ।
ऋषेर्द्विषष्टिहीनः स्याद् विंशत्या चैकयास्तृणाम् ॥ २९॥

पंचत्रिंशं शतं पौष्णम् एकोनमयनोन्यृषेः ।
पर्वणां स्याच्चतुष्पादी काष्ठानां चैव ताः कलाः ॥ ३०॥

सावनेन्दुस्तृमासानां षष्टिः सैकद्विसप्तिका ।
द्युस्त्रिंशत् सावनः सार्धः सौरस्तृणां स पर्ययः ॥ ३१॥

अग्निः प्रजापतिः सोमो रुद्रोदितिबृहस्पती ।
सर्पाश्च पितरश्चैव भगश्चैवार्यमापि च ॥ ३२॥

सविता त्वष्टाथ वायुश्चेन्द्राग्नी मित्र एव च ।
इन्द्रो निॠतिरापो वै विश्वेदेवास्तथैव च ॥ ३३॥

विष्णुर्वसवो वरुणूऽजेकपात् तथैव च ।
अहिर्बुध्न्यस्तथा पूषा अश्विनौ यम एव च ॥ ३४॥

नक्षत्रदेवता एता एताभिर्यज्ञकर्मणि ।
यजमानस्य शास्त्रज्ञैर्नाम नक्षत्रजं स्मृतम् ॥ ३५॥

उग्राण्यार्द्रा च चित्रा च विशाखा श्रवणोश्वयुक् ।
क्रूरणि तु मघास्वाती ज्येष्टा मूलं यमस्य च ॥ ३६॥

द्यूनं द्विषष्टिभागेन ज्ञे (हे) यं सौरं सपार्वणम् ।
यत्कृतावुपजायेते मध्येऽन्ते चाधिमासकौ ॥ ३७॥

कला दश सविंशा स्याद् द्वे मुहुर्तस्य नाडिके ।
द्युस्त्रिंशत् तत्कलानां तु षट्शती त्र्यधिका भवेत् ॥ ३८॥

ससप्तमं भयुक् सोमः सूर्यो द्यूनि त्रयोदश ।
नवमानि तु पंचाह्नः काष्ठा पंचाक्षरा भवेत् ॥ ३९॥

यदुत्तरस्यायनतो गतं स्याच् छेषं तथा दक्षिणतोऽयनस्य ।
तदेकषष्ट्याद्विगुणं विभक्तं सद्वादशं स्याद् दिवसप्रमाणम् ॥ ४०॥

यदर्धं दिनभागानां सदा पर्वणि पर्वणि ।
ॠतुशेषं तु तद् विद्यात् संख्याय सह सर्वणाम् ॥ ४१॥

इत्युपायसमुद्देशो भूयोप्यह्नः प्रकल्पयेत् ।
ज्ञेयराशिं गताभ्यस्तं विभजेज्ज्ञानराशिना ॥ ४२॥

इत्येतन्मासवर्षाणां मुहूर्तोदयपर्वणाम् ।
दिनर्त्वयनमासांगं व्याख्यानं लगधोऽब्रवीत् ॥ ००॥

सोमसूर्यस्तृचरितं विद्वान् वेदविदश्नुते ।
सोमसूर्यस्तृचरितं लोकं लोके च सम्मतिम् ॥ ४३॥

॥ इति याजुषज्योतिषं समाप्तम् ॥

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

॥ अथ साम्पुटिक श्रीसूक्त पाठ ॥

॥ अथ साम्पुटिक श्रीसूक्त पाठ ॥

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्ण रजतस्रजाम् | 
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभं ददासि |

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् |
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसीभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद प्रबोधिनीम् | 
श्रियं देवी मुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् |
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहो पह्वये श्रियम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियम लोके देवजुष्टामुदाराम् |
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आदित्यवर्णे तपसोधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोथबिल्वः |
तस्यफलानि तपसानुदन्तु मायान्त रायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह |
प्रादुर्भूतो सुराष्ट्रेस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु में ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् |
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद में गृहात् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करिषिणिम् |
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि |
पशूनां रूप मन्नस्य मयी श्रीः श्रयतां यशः ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ कर्दमेन प्रजा भूता मयी संभव कर्दम |
श्रियं वासय में कुले मातरं पद्ममालिनीम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् में गृहे |
नि च देविं मातरं श्रियं वासय में कुले ||

दरिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्दचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आर्द्रां यः करिणिं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् |
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आर्द्रां पुष्करिणिं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीम् |
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् |
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान विन्देयं पुरुषानहम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहयादाज्यमन्वहम् |
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्री कामः सततं जपेत् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ||

|| श्री महालक्ष्म्यार्पणं अस्तु ||

॥ उच्छिष्ट गणपति साधना ॥

 ॥ उच्छिष्ट गणपति साधना ॥
     उच्छिष्ट गणपति का प्रयोग अत्यंत सरल है तथा इसकी साधना में अशुचि-शुचि आदि बंधन नहीं हैं तथा मंत्र शीघ्रफल प्रद है । कलयुग में उच्छिष्ट गणपति साधना बहुत ही शीघ्र फलदाई होता है।यह अक्षय भण्डार का देवता है ।

 प्राचीन समय में यति जाति के साधक उच्छिष्ट गणपति या उच्छिष्ट चाण्डालिनी (मातङ्गी) की साधना व सिद्धि द्वारा थोड़े से भोजन प्रसाद से नगर व ग्राम का भण्डारा कर देते थे । इसकी साधना करते समय मुँह उच्छिष्ट होना चाहिये । मुँह में गुड़, पताशा, सुपारी, लौंग, इलायची ताम्बूल आदि कोई एक पदार्थ होना चाहिये । 

पृथक-पृथक कामना हेतु पृथक-पृथक पदार्थ है । 
यथा -लौंग, इलायची वशीकरण हेतु । 
सुपारी फल प्राप्ति व वशीकरण हेतु । 
गुडौदक – अन्नधनवृद्धि हेतु तथा 
सर्व सिद्धि हेतु ताम्बूल का प्रयोग करें । 

अगर साधक पर तामसी कृत्या प्रयोग किया हुआ है, तो उच्छिष्ट गणपति शत्रु की गन्दी क्रियाओं को नष्ट कर साधक की रक्षा करते हैं। 
॥ अथ नवाक्षर उच्छिष्टगणपति मंत्रः ॥ 
👉मंत्र – हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । 
 विनियोगः–ॐ अस्य श्रीउच्छिष्ट गणपति मन्त्रस्य कंकोल ऋषिः, विराट् छन्दः, उच्छिष्टगणपति देवता, सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । 

ऋष्यादिन्यासः –
ॐ अस्य श्रीउच्छिष्ट गणपति मंत्रस्य कंकोल ऋषिः नमः शिरसि, 
विराट् छन्दसे नमः मुखे, 
उच्छिष्ट गणपति देवता नमः हृदये, 
सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे । 

करन्यास 
ॐ हस्ति अंगुष्ठाभ्यां नमः । 
ॐ पिशाचि तर्जनीभ्यां नमः । 
ॐ लिखे मध्यमाभ्यां नमः । 
ॐ स्वाहा अनामिकाभ्यां नमः । 
ॐ हस्ति पिशाचिलिखे कनिष्ठिकाभ्यां नमः । 
ॐ हस्ति पिशाचिलिखे स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । 
हृदयादिन्यासः- 
ॐ हस्ति हृदयाय नमः । 
ॐ पिशाचि शिरसे स्वाहा । 
ॐ लिखे शिखायै वषट् । 
ॐ स्वाहा कवचाय हुम् । 
ॐ हस्ति पिशाचिलिखे नेत्रत्रयाय वौषट् । 
ॐ हस्ति पिशाचिलिखे स्वाहा अस्त्राय फट् स्वाहा । 

॥ ध्यानम् ॥ 
चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेत्रं पाशाङ्कुशौ मोदकपात्रदन्तौ। 
करैर्दधानं सरसीरुहस्थमुन्मत्त गणेश मीडे । (क्वचिद् पाशाङ्कुशौ कल्पलतां स्वदन्तं करैवहन्तं कनकाद्रि कान्ति) ॥ 

अथ दशाक्षर उच्छिष्ट गणेश मंत्र ॥
 मन्त्रः – १॰ गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।
 २॰ ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । 

अथ द्वादशाक्षर उच्छिष्ट गणेश मंत्र ॥ 
मन्त्रः – ॐ ह्रीं गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । ॥ 

अथ एकोनविंशत्यक्षर उच्छिष्टगणेश मंत्र ॥ 
मन्त्रः- ॐ नमो उच्छिष्ट गणेशाय हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । 

॥ अथ त्रिंशदक्षर उच्छिष्टगणेश मंत्र ॥
 मन्त्रः- ॐ नमो हस्तिमुखाय लंबोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा । 

विनियोगः- अस्योच्छिष्ट गणपति मंत्रस्य गणक ऋषिः, गायत्री छन्दः , उच्छिष्ट गणपतिर्देवता, ममाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । 

॥ अथ एक-त्रिंशदक्षर उच्छिष्टगणेश मंत्र ॥ 
मन्त्रः- ॐ नमो हस्तिमुखाय लंबोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा । ॥ 

अथ द्वात्रिंशदक्षर उच्छिष्टगणेश मंत्र ॥ 
मन्त्रः- ॐ हस्तिमुखाय लंबोदराय उच्छिष्ट महात्मने आं क्रों ह्रीं क्लीं ह्रीं हुं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा । 

॥ अथ सप्तत्रिंदक्षर उच्छिष्टमहागणपति मंत्रः ॥ 
मन्त्रः- ॐ नमो भगवते एकदंष्ट्राय हस्तिमुखाय लंबोदराय उच्छिष्ट महात्मने आँ क्रों ह्रीं गं घे घे स्वाहा। 
    विनियोग :- ॐ अस्य श्रीउच्छिष्ट महागणपति मंत्रस्य मतंग भगवान ऋषिः, गायत्री छन्दः, उच्छिष्ट महागणपति र्देवता, गं बीजम्, स्वाहा शक्तिः, ह्रीं कीलकं, ममाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । 

॥ ध्यानम् ॥ 
शरान्धनुः पाशसृणी स्वहस्तै र्दधानमारक्त सरोरुहस्थम्। 
विवस्त्र पत्न्यां सुरतप्रवृत्तमुच्छिष्टमम्बासुतमाश्रयेऽहम् ॥ 
बायें हाथों में धनुष एवं पाश दाहिने हाथों में शर एवं अङ्कुश धारण किये हुये लालकमल पर आसीन अपनी विवस्त्र पत्नियों से रति में निरत पार्वती पुत्र उच्छिष्ट महागणपति का मैं आश्रय लेता हुँ । 

॥अथ एकाधिक चत्वारिंशदक्षर उच्छिष्टमहागणपति मंत्रः॥ 
मन्त्रः- ॐ नमो भगवते एकदंष्ट्राय हस्तिमुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने आँ क्रों ह्रीं गं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा । 

॥ अथ उच्छिष्टगणपति यंत्रार्चनम् ॥ 
मंडल मध्य में गणपति की नौ पीठ शक्तियों का पूजन करें । 
पूर्वादिक्रमेण – 
ॐ तीव्रायै नमः। ॐ चालिन्यै नमः । ॐ नन्दायै नमः। 
ॐ भोगदायै नमः। ॐ कामरूपिण्यै नमः। ॐ उग्रायै नमः। 
ॐ तेजोवत्यै नमः। ॐ सत्यायै नमः। मध्ये- ॐ विघ्ननाशिन्यै नमः । 

   गणपति की मूर्ति को घृत से अभ्यजन करके दुग्ध धारा व जलधारा से अग्न्युत्तारण करके शुभ्र वस्त्र से पोंछन करके यंत्र के मध्य में रखें । देव की गंधार्चन से पूजा करके यंत्र के प्रत्येक आवरण की पूजा करें । यंत्रस्थ देवताओं की नामावलि के साथ “नमः श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि” कहते हुये अंगुष्ठ तर्जनी से गंधपुष्पाक्षत छोड़ें तथा अर्घपात्र के जल से तर्पण करे (स्वयं करे तो वाम हाथ से अनामिका व अंगुष्ठ के सहयोग से तर्पण करे) देव से आज्ञा ग्रहण करें । 

सचिन्मयः परोदेव परामृतरस प्रिय । अनुज्ञां देहि गणेश परिवारार्चनाय मे ॥

 प्रथमावरणम् :- 
षट्कोण मध्ये – 
अग्निकोणे – ॐ गं हस्ति हृदयाय नमः हृदय श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ १ ॥ 
नैर्ऋत्ये – ॐ गीं पिशाचि शिरसि स्वाहा, पिशाचि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ २ ॥ 
वायव्ये – ॐ गूं लिखे शिखायै वषट्, शिखा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ ३ ॥
 ऐशान्ये – ॐ गें स्वाहा कवचाय हुं कवच श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ ४ ॥ 
मध्याग्रे – ॐ गौं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा नेत्रत्रयाय वौषट्, नेत्रत्रयाय श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ ५ ॥ 
दिक्षु – ॐ गः हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । अस्त्राय फट् अस्त्र श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ ६ ॥ 

पुष्पाञ्जलि मादाय :- 
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥ पूजिता: तर्पिताः सन्तु कहकर विशेषार्घ से जल छोड़ें ।
 द्वितीयावरणम् :- अष्टदले पूर्वादि क्रमेण – 
ॐ ब्राह्मयै नमः, ब्राह्मी श्री पा० पू० त० नमः ॥ १ ॥ 
ॐ महेश्वर्यै नमः, माहेश्वरी श्री पा० ॥ २ ॥ 
ॐ कौमार्यै नमः, कौमारी श्री पा० पू० त० ॥ ३ ॥ 
ॐ वैष्णव्यै नमः, वैष्णवी श्री पा० ॥ ४ ॥ 
ॐ वाराह्यै नमः, वाराहीं श्री पा० ॥ ५ ॥ 
ॐ इन्द्राण्यै नमः, इन्द्राणी श्री पा० ॥ ६ ॥ 
ॐ चामुण्डायै नमः, चामुण्डा श्री पा० ॥ ७ ॥ 
ॐ महालक्ष्म्यै नमः, महालक्ष्मी श्री पा० पू० त०॥८॥ 

पुष्पाञ्जलि – 
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । 
भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम् ॥ 
पूजिता तर्पिताः सन्तु से जल छोडें । 

तृतीयावरणम् :- 
अष्टदल के बाहर कर्णिका समीपे – भूपूर मध्ये । दशो दिशाओं में – 
पूर्वे – ॐ वक्रतुण्डाय नमः, वक्रतुण्ड श्री० पा० त० नमः ॥ १ ॥ 
आग्नेये – ॐ एकदंष्ट्राय नमः श्री० पा० ॥ २ ॥ 
दक्षिणे – लंबोदराय नमः श्री० पा० ॥ ३ ॥ 
नैर्ऋत्ये – ॐ विकटाय नमः श्री पा० ॥ ४ ॥ 
पश्चिमे – ॐ धूम्रवर्णाय नमः श्री० पा० ॥ ५ ॥ 
वायव्ये – ॐ विघ्नराजाय नमः श्री० पा० ॥ ६ ॥ 
उत्तरे – ॐ गजाननाय नमः श्री० पा० ॥ ७ ॥ 
ऐशान्ये – ॐ विनायकाय नमः श्री० पा० ॥ ८ ॥ प्राच्येशानयोर्मध्ये–ॐ गणपतये नमः श्री० पा०॥९॥ पश्चिमनिर्ऋतियोर्मध्ये – ॐ हस्तिदंताय नमः, हस्तिदंत श्री० पा० त० नमः ॥ १० ॥ 

पुष्पाञ्जलि – 
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । 
भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥ 
पूजिता: तर्पिताः सन्तु से जल छोड़ें । 

चतुर्थावरणम् :- भुपूरे दशदिक्षु – 
पूर्वे – ॐ इन्द्राय नमः, इन्द्र श्री पा० पू० त० नमः ॥ १ ॥ 
ॐ अग्नये नमः श्री पा० ॥ २ ॥ 
ॐ यमाय नमः श्री पा० ॥ ३ ॥ 
ॐ निर्ऋतये नमः श्री पा० ॥ ४ ॥ 
ॐ वरुणाय नमः श्री पा० ॥ ४ ॥ 
ॐ वायवे नमः श्री पा० ॥ ५ ॥ 
ॐ कुबेराय नमः श्री पा० ॥ ६ ॥ 
ऐशान्ये – ॐ ईशानाय नम० श्री पा० ॥ ७ ॥ इन्द्रेईशानयोर्मध्ये–ॐ ब्रह्मणे नमः ब्रह्मा श्री पा०॥८॥ 
वरुणनैर्ऋतर्योर्मध्ये – ॐ अनंताय नमः अनन्त श्री पा० पू० त० ॥ ९ ॥ 

पुष्पाञ्जलि –
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । 
भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ॥ 
पूजिताः तर्पिताः सन्तु से जल छोड़ें । 

पंचमावरणम् – भुपूरे इन्द्रादि लोकपाल समीपे – 
ॐ वं वज्राय नमः श्री पा० ॥ १ ॥ 
ॐ शं शक्त्यै नमः श्री० पा० ॥ २ ॥ 
ॐ दं दण्डाय नमः श्री पा० ॥ ३ ॥ 
ॐ खं खड्गाय नमः श्री० पा० ॥ ४ ॥ 
ॐ पां पाशाय नमः श्री० पा० ॥ ५ ॥ 
ॐ अं अंकुशाय नमः श्री० पा० ॥ ६ ॥ 
ॐ गं गदायै नमः श्री० पा० ॥ ७ ॥ 
ॐ त्रिं त्रिशूलाय नमः श्री पा० ॥ ८ ॥ 
ॐ पं पद्माय नमः श्री पा० ॥ ९ ॥ 
ॐ चं चक्राय नमः, चक्र श्री पा० पू० त० नमः॥१०॥ 
पुष्पाञ्जलि – 
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । 
भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ॥ 
‘पूजिता: तर्पिता: सन्तु’ से जल छोडें । 

॥ पुरश्चरण विधिः ॥ 
वीरभद्र, उड्डीश तंत्र, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि के अनुसार रक्तचंदन (कपि) अथवा श्वेताद्रर्क (श्वेतआक) की प्रतिमा अपने अंगुष्ठ परिमाण की पुष्य नक्षत्र में बनायें । 

अन्य ग्रन्थों में प्रतिमा को हाथी के ऊपर बैठकर बनाने को कहा है । अभाव में पत्थर या मिट्टी से बने हाथी पर बैठकर बनायें । यह भी नहीं हो सके तो हाथी के चित्रासन पर बैठकर बनाये । 

मूर्ति को गल्ले में रखने से धन वृद्धि होती है । शत्रुनाश के लिये निम्बकाष्ठ की प्रतिमा बनाये अथवा लवण की प्रतिमा बनायें । गुड़ से निर्मित प्रतिमा सौभाग्य को देने वाली तथा बाँबी की मिट्टी से बनी प्रतिमा अभीष्ट की सिद्धि करती है । 
साधक एकलक्ष जप संख्या पूरी करके हवनादि कर्म करें । कृष्णपक्ष की चतुर्दशी से शुक्लपक्ष की चतुर्दशी पर्यन्त गुड़ तथा पायसान्न निवेदित करें । 
कृष्णपक्ष की अष्टमी से चतुर्दशी पर्यन्त नित्य साढ़े आठ हजार जप करे ८५० आहुतियाँ देकर तर्पणादि करें । इससे अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त करें । 

कुबेर ने इस मंत्र के प्रभाव से नौ निधियों को प्राप्त किया तथा सुग्रीव एवं विभीषण ने भी गणपति के वर से राज्य को प्राप्त किया । मधुमिश्रित लाजा होम करने से संसार को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त होवे, कन्या यदि करे तो शीघ्र वर को प्राप्त करें । 

भोजन से पूर्व गणपति के निमित्त ग्रासान्न निकाल देवे तथा भोजन करते समय भी जप करने से मंत्र सिद्ध होता है । 
शय्या पर सोये हुये उच्छिष्टावस्था में जप करने से शत्रु भी वश में हो जाता है । 
कटु-तैल से मिश्रित राजीपुष्पों के हवन से शत्रुओं में विद्वेषण पैदा होवे । वाद विवाद में यह मंत्र विजय प्रदान करता है । 

नदी के जल से २७ बार अभिमंत्रित कर मुँह धोये तो वाक् सिद्धि होवें । 
साधक लाल वस्त्र पहन कर लाल चंदन लगाकर ताम्बूल खाते हुये या नैवेद्य के मोदकादि को खाते हुये रक्तचंदन की माला पर जप करे, 
👉विशेष:--तुलसी की माला ग्रहण नहीं करें । 

पूजित मूर्ति को मद्यपात्र में रखकर एक हाथ नीचे भूमि में गाड़ें और उस पर बैठकर अहर्निश जप करे तो एक सप्ताह के अन्दर सभी उपद्रव शांत होकर धन वैभव की प्राप्ति होवे । यह तामस प्रयोग है अत: नियम व्रत व सावधानी से करना चाहिये । 

बलि विधानम् :– 
बलि मंत्रः- गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्ट गणेशाय महायक्षायायं बलिः।
मधु, मांस माषान्न, पायसान्न अथवा फलादि से बलि प्रदान करें। 

शुक्र_का_छिपा_हुआ_महल" एक अनसुनी रहस्यमयी कथा

#शुक्र_का_छिपा_हुआ_महल" – एक अनसुनी रहस्यमयी कथा 🌟


  हिमालय की सबसे ऊँची चोटी के पीछे एक ऐसा घना वन था, जहाँ सूर्य की किरणें भी झिझककर प्रवेश करती थीं। इस वन के सबसे गहन हिस्से में एक प्राचीन, चमकदार महल खड़ा था – जिसका नाम था "#शुक्र_विलास"। इस महल का द्वार केवल तभी खुलता था, जब आकाश में शुक्र ग्रह पूर्ण शक्ति के साथ उदित होता और पृथ्वी पर किसी योग्य आत्मा की #कुंडली_में_शुक्र_राजयोग जागृत होने वाला होता।

इस महल का रक्षक था एक रहस्यमयी योद्धा – "#विलासिनी" नाम की एक दिव्य स्त्री, जो कभी देवताओं की सेवा में थी, कभी दैत्यों की गुरु बनी। वह कहती थी – "शुक्र राजयोग वह नहीं जो किताबों में लिखा है, बल्कि वह #आंतरिक_प्रकाश है जो व्यक्ति को राजा बना देता है, परंतु यदि इसे गलत समझा जाए तो राजा से रंक भी बना देता है।"

एक रात, एक युवक अमर नाम का, जो जीवन में हर सुख से वंचित था, इस वन में भटक गया। उसकी #कुण्डली_में_शुक्र केंद्र में विराजमान था, परंतु नीच राशि में और पाप ग्रहों से दृष्ट। विलासिनी ने उसे देखते ही कहा – "तुम्हारे भीतर शुक्र राजयोग सो रहा है। पहचानो इसे, जगाओ इसे, अन्यथा यह सोया हुआ राजा तुम्हें कभी राज नहीं देगा।"

★★★ #शुक्र_राजयोग_की_पहचान – विलासिनी का पहला रहस्य ★★★

विलासिनी ने अमर को एक दर्पण दिखाया और कहा – "देखो, कुंडली में #शुक्र जब केंद्र (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण (1, 5, 9) में हो, विशेषकर अपनी उच्च राशि मीन, स्वराशि #वृषभ_तुला में, या बृहस्पति, बुध, चंद्र जैसे शुभ ग्रहों के साथ युति/दृष्टि बनाए, तो वहाँ शुक्र राजयोग जन्म लेता है।"

वह आगे बोली – "सबसे गुप्त संकेत यह है – यदि शुक्र 12वें घर में हो (मोक्ष भाव में) और लग्नेश से संबंध बनाए, तो जातक को #राजसी_वैभव मिलता है, परंतु संसार से दूर। यदि शुक्र 4-7-10 में हो और 9वें से संबंध, तो वह व्यक्ति समाज का राजा बनता है। यदि शुक्र नीच का होकर भी उच्च का फल दे (#नीचभंग_राजयोग), तो वह सबसे बड़ा आश्चर्य होता है – गरीबी से राजपाट तक का सफर।"

लाभ – अमर ने पूछा, "इससे क्या मिलता है?" विलासिनी मुस्कुराई – "अनंत सौंदर्य, आकर्षण, धन-वैभव, वैवाहिक सुख, कला में निपुणता, विलासिता, रत्न-जड़ित जीवन, स्त्री-सुख, ऐश्वर्य, और सबसे बड़ा – आत्मिक शांति के साथ #भौतिक_राज।"

#हानि – फिर गंभीर होकर बोली – "यदि यह योग पाप ग्रहों से दूषित हो, तो अति भोग से रोग, व्यभिचार, धन का नाश, वैवाहिक कलह, त्वचा-रोग, गुप्त रोग, और सबसे बड़ा – आंतरिक खालीपन। यह योग सोने की जंजीर बन जाता है – बाँधता है, आजाद नहीं करता।"

★★★ #शुक्र_राजयोग_कैसे_कार्य_करता_है – दूसरा रहस्य ★★★

"यह योग चुपचाप कार्य करता है," विलासिनी ने कहा। "जैसे चंद्रमा रात में चुपके से खिलता है। #शुक्र की शक्ति 25-28 वर्ष की आयु में जागृत होती है। यह धीरे-धीरे आकर्षण बढ़ाता है, लोग स्वतः तुम्हारे पास आते हैं, धन के नए मार्ग खुलते हैं, कला-संस्कृति में सफलता मिलती है। परंतु यदि इसे जगाया न जाए, तो यह नींद में ही रह जाता है।"

★★★ अब #गुप्त_उपाय – जो आज तक किसी ने नहीं जाना ★★★

विलासिनी ने अमर को एक प्राचीन पांडुलिपि दिखाई और कहा – "ये उपाय मैं तुम्हें इसलिए दे रही हूँ क्योंकि तुम योग्य हो। ये गुप्त हैं, शास्त्रों में भी स्पष्ट नहीं लिखे, परंतु खगोलीय गणना से सिद्ध।"

सरल घरेलू उपाय (प्रारंभिक जागरण) हर शुक्रवार सूर्यास्त के ठीक 48 मिनट बाद (शुक्र उदय का समय) दर्पण के सामने सफेद चावल की खीर बनाकर उसमें 11 इलायची डालो। फिर "ॐ शुं शुक्राय नमः" 21 बार बोलकर खीर किसी कन्या को खिलाओ। यह शुक्र की आंतरिक ऊर्जा को जागृत करता है।

वैदिक ज्योतिषीय + रत्न उपाय (मजबूत आधार) शुक्र के नक्षत्र (भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा) में हीरा (कम से कम 0.5 कैरेट, 6 धातुओं में) धारण करो। परंतु गुप्त विधि – धारण से पहले हीरे को 108 बार "ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः" से अभिमंत्रित करो, और शुक्र की होरा में।

वनस्पति का गुप्त उपाय (प्रकृति का रहस्य) गूलर (Ficus racemosa) की जड़ को शुक्रवार को खोदकर निकालो (शुक्र की दशा में), उसे चांदी के ताबीज में बंद करो। गूलर शुक्र की ऊर्जा को स्थिर करता है, क्योंकि इसकी जड़ें भूमि के गर्भ में गहराई तक जाती हैं – ठीक वैसे ही जैसे शुक्र जीवन के गहरे सुख देता है। इसे गले में धारण करने से 43 दिनों में आकर्षण दोगुना हो जाता है।

तांत्रिक गुप्त विधि (सबसे शक्तिशाली) एक सफेद कपड़े पर शुक्र यंत्र बनाओ। बीच में "ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः" लिखो। फिर शुक्र की रात्रि (शुक्रवार की रात) में 1008 बार इस मंत्र का जाप करो, बीच-बीच में सफेद पुष्प चढ़ाओ। यह यंत्र को जीवन भर घर के पूजा स्थल में रखो। यह उपाय 1000 वर्ष पुरानी गुप्त परंपरा से लिया गया है।

हवन का अनोखा तरीका शुक्र की 20° डिग्री पर जब कोई शुभ ग्रह हो (जैसे बृहस्पति), तब 11 किलो घी, सफेद चंदन, कपूर, इलायची, केसर से हवन करो। आहुति के साथ "ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं..." (वैदिक मंत्र) बोलो। यह हवन केवल एक बार, परंतु जीवन भर शुक्र को राजसी बनाए रखता है।

★★★ वैज्ञानिक विश्लेषण – कैसे ये कार्य करते हैं ★★★

ये उपाय केवल अंधविश्वास नहीं। शुक्र ग्रह पृथ्वी का सबसे निकटतम ग्रह है, और इसका प्रकाश (सबसे चमकीला) मानव मस्तिष्क की तरंगों पर प्रभाव डालता है – विशेषकर सौंदर्य और आकर्षण केंद्रों पर। सफेद वस्तुओं का दान और इलायची का उपयोग सेरोटोनिन बढ़ाता है, जो खुशी और आकर्षण का हार्मोन है।

हीरा (कार्बन का क्रिस्टल) उच्च कंपन वाली ऊर्जा रखता है – यह शरीर की विद्युत तरंगों को संतुलित करता है, जिससे आकर्षण बढ़ता है। गूलर की जड़ में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो त्वचा और प्रजनन स्वास्थ्य को मजबूत करते हैं – शुक्र के कारक क्षेत्र।

मंत्र जाप (108 बार) मस्तिष्क की थेटा तरंगों को सक्रिय करता है – वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि यह तनाव कम करता है और आकर्षण बढ़ाता है। हवन से निकलने वाला धुआँ (घी+चंदन) नकारात्मक आयनों को हटाता है, वातावरण को शुद्ध करता है – जिससे शुक्र की ऊर्जा बिना बाधा के कार्य करती है।

अमर ने ये उपाय किए। कुछ वर्षों बाद वह वन से लौटा – अब एक राजा की तरह जी रहा था, न कि धन से, बल्कि आंतरिक वैभव से।

याद रखो – शुक्र राजयोग को जगाना तुम्हारे हाथ में है। इसे जगाओ, परंतु संयम से – अन्यथा महल का द्वार हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
ॐ शुं शुक्राय नमः 🌙✨

बुधवार, 14 जनवरी 2026

रावण की बेटी सुवर्णमत्स्या

रावण की बेटी सुवर्णमत्स्या
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 रावण की बेटी का उल्‍लेख थाईलैंड की रामकियेन रामायण और कंबोडिया की रामकेर रामायण में किया गया है, जबकि वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास के रामचरित मानस में इसका उल्लेख नहीं किया गया है।

रामकियेन और रामकेर रामायण के मुताबिक, रावण के तीन पत्नियों से 7 बेटे थे। इनमें पहली पत्‍नी मंदोदरी से दो बेटे मेघनाद और अक्षय कुमार थे। वहीं, दूसरी पत्‍नी धन्यमालिनी से अतिकाय और त्रिशिरा नाम के दो बेटे थे। तीसरी पत्‍नी से प्रहस्थ, नरांतक और देवांतक नाम के तीन बेटे थे। दोनों रामायण में बताया गया है कि सात बेटों के अलावा रावण की एक बेटी भी थी, जिसका नाम सुवर्णमछा या सुवर्णमत्‍स्‍य था। कहा जाता है कि सुवर्णमत्‍स्‍य देखने में बहुत सुंदर थी। उसे स्‍वर्ण जलपरी भी कहा जाता है। एक अन्‍य रामायण ‘अद्भुत रामायण’ में राम जी की पत्‍नी सीता जी को भी रावण की बेटी बताया गया है। 
       दशानन रावण की बेटी सुवर्णमत्‍स्‍य का शरीर सोने की तरह दमकता था। इसीलिए उसको सुवर्णमछा भी कहा जाता था। इसका शाब्दिक अर्थ होता है, सोने की मछली। इसीलिए थाईलैंड और कंबोडिया में सुनहरी मछली को ठीक उसी तरह से पूजा जाता है, जैसे चीन में ड्रैगन की पूजा होती है
     राम जी ने लंका पर विजय अभियान के दौरान समुद्र पार करने के लिए नल और नील को सेतु बनाने का काम सौंपा। राम जी के आदेश पर जब नल और नील लंका तक समुद्र पर सेतु बना रहे थे, तब रावण ने अपनी बेटी सुवर्णमत्‍स्‍य को ही ये योजना नाकाम करने का काम सौंपा था। पिता की आज्ञा पाकर सुवर्णमछा ने वानरसेना की ओर से समुद्र में फेंके जाने वाले पत्‍थरों और चट्टानों को गायब करना शुरू कर दिया। उसने इस काम के लिए समुद्र में रहने वाले अपने पूरे दल की मदद ली।

रामकियेन और रामकेर रामायण में लिखा गया है कि जब वानरसेना की ओर से डाले जाने वाले पत्‍थर गायब होने लगे तो हनुमानजी ने समुद्र में उतरकर देखा कि आखिर ये चट्टानें जा कहां रही हैं? उन्‍होंने देखा कि पानी के अंदर रहने वाले लोग पत्‍थर और चट्टानें उठाकर कहीं ले जा रहे हैं। उन्‍होंने उनका पीछा किया तो देखा कि एक मत्‍स्‍य कन्‍या उनको इस कार्य के लिए निर्देश दे रही है। कथा में कहा गया है कि सुवर्णमछा ने जैसे ही हनुमानजी को देखा, उनसे प्रेम हो गया। हनुमानजी उसके मन की स्थिति भांप लेते हैं और समुद्रतल पर ले जाकर पूछते हैं कि आप कौन हैं देवी ? वह बताती हैं कि मैं रावण की बेटी हूं। फिर हनुमान जी उसे समझाते हैं कि रावण क्‍या गलत कार्य कर रहा है। हनुमानजी के समझाने पर सुवर्णमछा सभी चट्टानें लौटा देती हैं, तब रामसेतु के निर्माण का कार्य पूरा हो पाता है। थाई रामायण रामकियेन के अनुसार महाबली हनुमान जी के आशीर्वाद से स्वर्णमछा को एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई थी जिसका नाम मैकचनू (मछानु) था। 

धन्यवाद।🙏