गुरुवार, 22 जनवरी 2026

भगवान विष्णु

★★★भगवान विष्णु ★★★

   √● (१) विष्णु का स्वरूप विष्णु क्या हैं ?- विष्णु का अर्थ है- 'वेवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णुः' जो सर्वत्र व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। वह व्यापनशील तत्त्व जो संसार के कण-कण में व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। यह विष्णु सर्वव्यापक, विश्वात्मा और सर्व नियन्ता है। इसके दो रूप हैं- एक सूक्ष्म सत्ता या वामनरूप (Microcosm), इस रूप में यह अणु या परमाणु (Atom) है। इसका दूसरा रूप है- विराट् सत्ता या बृहत् रूप (Macrocosm), इस रूप में यह ब्रह्माण्ड या संसार (Universe) है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि जो विष्णु है, वही वामन है, अर्थात् विष्णु और वामन एक ही तत्व हैं। 

"वामनो ह विष्णुरास।"
  (शत०१.२.५.५)

√● विष्णु के अणुरूप या अणिमा को वामन कहते हैं और विस्तृत या व्याप्तरूप को भूमा (भूमन्) कहते हैं। यह बीजरूप में अणु या परमाणु (Atom) है। यही विराट् रूप में सृष्टि, ब्रह्माण्ड या संसार है। इस सृष्टि का निर्माण जिस आधार पर हुआ है, वह आधार या ईंट रूप तत्त्व परमाणु है। परमाणु के मध्य में एक धन विद्युत् (Positive) का बिन्दु है, इसे केन्द्र या न्यूक्लियस (Nucleus) कहा जाता है। इसका व्यास एक इंच के दस लाखवें भाग का भी दस लाखवां भाग माना जाता है। परमाणु के अस्तित्व का सार इसी केन्द्र या हृदय भाग में माना जाता है। इसी केन्द्र के चारों ओर लाखों अतिसूक्ष्म विद्युत्- कण चक्कर काटते हैं। ये ऋण विद्युत्-प्रधान (Negative) होने के कारण इलेक्ट्रान (Electron) कहे जाते हैं। ये इलेक्ट्रान केन्द्र से अत्यन्त आकृष्ट हैं और केन्द्र से मिलने के लिए आतुर रहते हैं । अतएव ये केन्द्र के चारों ओर चक्कर काटते रहते हैं।

√●● विज्ञान ने सूक्ष्म (वामन अणु) और विराट् (भूमा) के संबन्ध और कार्यविधि पर विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जो नियम और विधि परमाणु में कार्य कर रही है, वही नियम और विधि ब्रह्माण्ड में भी काम करती है। अतएव कहा गया है कि- 

"यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे।"

  √● अर्थात् जो नियम पिण्ड (अणु) में कार्य कर रहे हैं, वे ही ब्रह्माण्ड में भी चल रहे हैं। इन शाश्वत नियमों को वैदिक भाषा में 'ऋत' (Eternal laws) कहते हैं। इस प्रकार विज्ञान की दृष्टि में भी अणु और ब्रह्माण्ड की रचना में कार्यविधि की दृष्टि से एकरूपता है। इसी विचार से भारतीय मनीषियों ने विष्णु को एक ओर 'अणोरणीयान्' (सूक्ष्म से सूक्ष्मतर) कहा और दूसरी ओर 'महतो महीयान्' (बड़े से बड़ा) कहा है।

√● विष्णु के तीन पग- वेदों के अनेक मंत्रों में विष्णु के तीन पगों (पैरों, चरणों) का उल्लेख मिलता है।

"इदं विष्णुर्वि चक्रमे, त्रेधा निदधे पदम् ।
 समूढमस्य पांसु ।।"
  ( ऋग्० १.२२.१७ । यजु० ५.१५ । अथर्व० ७.२६.४ । साम० २२२)

√● मंत्र का अभिप्राय है कि विष्णु ने पराक्रम किया और उसने तीन पद (पैर, पग) रखे । उसके धूलियुक्त पैरों में सारा संसार व्याप्त है। 

√●विष्णु के तीन पगों की अनेक प्रकार से व्यवस्था की गई है। संसार की दृष्टि से विष्णु के तीन पग हैं- द्यु, अन्तरिक्ष और भूलोक । गुणों की दृष्टि से द्युलोक सात्त्विक है, अन्तरिक्ष राजस और भूलोक (पृथ्वी) तामस है। जीवन की दृष्टि से तीन पग है- आदि, मध्य और अन्त । जन्म, विकास और मृत्यु । सूर्य का उदय होना, मध्याह्न और सायंकाल ये विष्णु (सूर्य) के तीन पग हैं। इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु का आदि, मध्य और अन्त है। इन तीन पगों में जीवन की समग्रता आ जाती है। 

√●मंत्र में 'पांसुरे' (धूलियुक्त) शब्द विचारणीय है। पांसु (धूल, रज) शब्द संकेत करता है कि अणु का स्वरूप कण-रूप है। यह तेजोमय कण है, जो तीन तत्त्वों- प्रोटान (Proton, धनात्मक विद्युत्), इलेक्ट्रान (Electron, ऋणात्मक विद्युत् ) और न्यूट्रान (Neutron, उदासीन) का संमिलित रूप है। इनमें प्रोटॉन प्रेरक तत्त्व है। यह गति और प्रेरणा देता है। इलेक्ट्रान प्रेरित होने वाला तत्त्व है। इसमें प्रेरणा होती है, गति होती है और वस्तु का विकास होता है। न्यूट्रान यह उदासीन तत्त्व है। यह आश्रय, आधार या स्थिति- स्थापक है । इसकी सत्ता से ही उक्त दोनों की स्थिति है। गणित की दृष्टि से इन्हें क्रमशः घन (Plus+), ऋण (Minus) और शून्य (Zero, ०) कह सकते हैं। 

√◆◆पृथ्वी के सात धाम- ऋग्वेद का कथन है कि पृथिवी के सात धाम हैं। उनके आधार पर विष्णु अपना पराक्रम करता है। वहाँ से सारे देव हमारी रक्षा करें। 

"अतो देवा अवन्तु नो, यतो विष्णुर्विचक्रमे ।
 पृथिव्याः सप्त धामभिः ।।"
   ( ऋग्० १.२२.१६)

√● पृथिवी के सात धाम कौन से हैं, जहाँ से विष्णु का पराक्रम प्रारम्भ होता है। पृथिवी के सात धाम से अभिप्राय है- पृथिवी के सात परत, तह (Layers, Strata) । पृथ्वी के नीचे सात परत या तह हैं। पृथिवी की सबसे मोटी परत पहली परत है। इसके नीचे पत्थर या चट्टानों की परत है। उससे नीचे जल, अग्नि, गैस, आदि की परत हैं। अन्त में सातवीं परत में नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) है। यह नाभिकीय ऊर्जा ही पृथिवी को निरन्तर घुमा रही है। नाभिकीय ऊर्जा सहित सातों परत विष्णु के स्थान हैं। सर्वत्र विष्णु व्याप्त है। विष्णु का पराक्रम सातों धाम और मुख्य रूप से नाभिकीय ऊर्जा से प्रारम्भ होता है। इसी से पृथ्वी का रक्षण, संरक्षण, पालन-पोषण होता है। पृथिवी की सारी ऊर्जा का श्रेय विष्णु को है। यदि नाभिकीय ऊर्जा का संरक्षण प्राप्त न हो तो पृथिवी मरुस्थल बन जाएगी। 

√●●विष्णु और वरुण सारे लोकों के धारक- यजुर्वेद के एक महत्त्वपूर्ण मंत्र में कहा गया है कि विष्णु और वरुण के प्रताप से ही सारे लोक रुके हुए हैं। ये दोनों देव सबसे अधिक वीर और पराक्रमी हैं। ये सबसे अधिक बली हैं। इनको किसी अन्य के सहयोग की आवश्यकता नहीं है। ये सबके स्वामी हैं, अतएव इनका सबसे पहले आह्वान किया जाता है । 

"ययोरोजसा स्कभिता रजांसि वीर्येभिर्वीरतमा शविष्ठा । 
या पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन् वरुणा पूर्वहूतौ ।।"
     ( यजु० ८.५९ )

√●लोकों की स्थिरता के लिए दो तत्त्वों की अनिवार्य आवश्यकता है। वे हैं- अग्नि और सोम । सारा संसार अग्नि और सोमीय तत्त्वों के मिश्रण से बना है। अतएव बृहत् जाबाल उपनिषद् में कहा गया है कि- 

"अग्नीषोमात्मकं विश्वम् ।"
     ( बृहत्० उप० २.२)

" अग्नीषोमात्मकं जगत् ।"
    ( बृहत्० उप० २.३)

√● विष्णु नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) होने से अग्नि या आग्नेय तत्त्व है और वरुण सोम या सोमीय तत्त्व है, अतः ये दोनों लोकों के निर्माता, रक्षक और स्थिरता के कारण हैं। इन दोनों की महिमा अपार है। इन्हें किसी अन्य की सहायता और सहयोग अपेक्षित नहीं है। अतएव मंत्र में कहा गया है कि इनकी शक्ति से सारे लोक स्थिर हैं। 

√●विष्णु के सहयोगी वरुण और अश्विनी ऋग्वेद का कथन है कि विष्णु के कार्य को वरुण और अश्विनी अपना सहयोग देकर पूरा करते हैं। विष्णु अपने मित्रों के सहयोग से अंधकार को दूर करता है और प्रकाश फैलाता है। 

"तमस्य राजा वरुणस्तमश्विना, 
क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः ।
 दाधार दक्षमुत्तममहर्विदं, 
व्रजं च विष्णुः सखिवाँ अपोर्णुते ।"
     ( ऋग्० १.१५६.४ )

√●शरीर-संरचना की दृष्टि से विष्णु मेरुदण्ड (Spinal Cord) है। यह उदासीन (Neutral) है। इसमें बहने वाला सोमरस या द्रव (Cerebro- spinal fluid ) है। यह वरुण है। मेरुदंड के दोनों ओर विद्यमान Afferent और Efferent herves ही अश्विनीकुमार रूपी गुगल है । मंत्र का कथन है कि वरुण और अश्विनी के सहयोग से ही विष्णु अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करके मस्तिष्क को ज्ञानरूपी प्रकाश देता है।

√●भौतिकविज्ञान की दृष्टि से विष्णु का अर्थ सूर्य है। सूर्य की किरणों को अश्विनी अर्थात् Electro-magnetic waves पृथिवी तक लाते हैं। वरुण अर्थात् Electron का इसमें सहयोग रहता है। इस प्रकार विष्णु (सूर्य) पृथिवी के अंधकार को दूर करके भूमंडल पर प्रकाश फैलाता है।

√● विष्णु का वृत्त - ऋग्वेद का कथन है कि विष्णु संसार में एक वृत्त (Circle, Circumference) या परिधि के रूप में है। इसके ९०° अंश वाले ४ भाग हैं अर्थात् ९०x४= ३६०° अंश की पूरी परिधि है। विष्णु 'युवा कुमार' है अर्थात् नित्य युवा है और 'बृहत्-शरीरः' बड़े शरीर अर्थात् विराट् रूप में इस वृत्त में विद्यमान है और उसी से कालचक्ररूपी यज्ञ को चला रहा है। 

"चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभि श्चक्रं न वृत्तं व्यतींरवीविपत् ।
 बृहच्छरीरो विभिमान ऋक्वभिर्युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम् ।।"
      ( ऋग्० १.१५५.६)

√● इसका अभिप्राय यह है कि विष्णु विराट् रूप में परिधि (घेरे) की तरह इस पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है । सारा संसार उस घेरे में आ जाता है। ऐसी कोई चीज नहीं है जो वृत्त या घेरे से बाहर हो । इस वृत्त (घेरे) के ९०° अंश वाले चारों भाग हैं अर्थात् ९०x४= ३६०° अंश इस वृत्त के हैं। विष्णु नित्य युवा या तरुण है। यह ब्रह्माण्ड उसका विशाल शरीर है। इस परिधि-रूपी वृत्त से यह कालचन्द्ररूपी यज्ञ सदा चल रहा है।

√★★★ (२) विष्णु का जीव वैज्ञानिक स्वरूप प्रो० रेले (V.G. Rele) ने जीव-विज्ञान की दृष्टि से विवेचन करते हुए यह निष्कर्ष दिया है कि विष्णु पृष्ठवंश या मेरुदण्ड (Spinal Cord) है। विष्णु के विषय में त्रिविक्रम या तीन पग चलना आदि जो बातें कही गई हैं, वे मेरुदण्ड मानने पर सरलता से स्पष्ट हो जाती हैं। 

     √★मनुष्य आदि सभी पृष्ठधारी जीवों में मेरुदण्ड गर्भ में सर्वप्रथम पूर्त रूप लेता है। उसके बाद अन्य अवयवों का प्रादुर्भाव होता है। विष्णु को पृथिवी का धारक माना जाता है। मेरुदंड ही शरीर के सभी अंगों और मांसपेशियों आदि को धारण करता है। यह भूतल या शरीर का सबसे नीचे का भाग है, अतएव इसको विष्णु का प्रथम पग माना जाता है। इसका कार्य है- शरीर की सभी संवेदनाओं का आदान-प्रदान। यह ज्ञानतन्तुओं (Afferent Nerves) के द्वारा संवेदनाओं को ग्रहण करता है और क्रियातन्तुओं (Efferent) के द्वारा उसे कार्यान्वित करता है। मेरुदण्ड में ज्ञान और क्रियात तुओं का जाल बिछा हुआ है। ये तन्तु (Nerves) मेरुदण्ड के दोनों ओर फैले हुए हैं। ज्ञानतन्तुओं से सूचना प्राप्त करना और क्रियातन्तुओं से तदनुसार कार्य करने की प्रेरणा देना इनका कार्य है।

√★मेरुदण्ड के विविध केन्द्र परस्पर जुड़े हुए हैं। ये जब तक पूर्ण विकसित नहीं हो जाते हैं, तब तक बच्चे में इन दोनों प्रकार के तन्तुओं से ही बालक में जीवन-प्रणाली काम करती है। इसके बाद जब भ्रूण विकसित अवस्था में आता है तो इसका संबन्ध केन्द्रीय तन्त्री- जाल (Central Nervous System) से होता है। अब केन्द्रीय तन्त्री-जाल दो प्रकार से कार्य करता है। प्रथम है- बाहर से ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा सूचनाएं प्राप्त करना । यह ज्ञानतन्तुओं (Afferent nerves) का काम है। ये जो सूचनाएं प्राप्त करती हैं, उन्हें ऊपर केन्द्रीय नाडी जाल को भेजती हैं और केन्द्रीय नाडीजाल उन पर अपना निर्णय कार्यतन्तुओं (Efferent) के द्वारा नीचे भेजता है। ज्ञानतन्तुओं की गति धीमी है। ये आसपास के विभिन्न केन्द्रों को उत्तेजित करते हैं और उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे क्रियातन्तुओं को प्रेरित करें कि वे तदनुकूल कार्य करें। क्रियातन्तुओं की गति तीव्र है । 

√★अब ज्ञानतन्तुओं और क्रियातन्तुओं का क्षेत्र बढ़कर मेडुला ऑब्लोंगाटा (Medulla Oblongata) तक हो जाता है। मेडुला ऑब्लोंगाटा बृहत् मस्तिष्क का सबसे नीचे का भाग है। यह मस्तिष्क और मेरुदण्ड के बीच मध्यस्थता का काम करता है। इसका ऊपर संबन्ध बृहत् मस्तिष्क से है और नीचे मेरुदण्ड से। यह मानवशरीर का मध्य या अन्तरिक्ष है। यह विष्णु का द्वितीय पग (Step) है। इसके ऊपर बृहत् मस्तिष्क विष्णु का तृतीय पग माना जाता है। इसको ही मानवशरीर में द्युलोक कहा जाता है। भूरे कण (Grey matter) ज्ञानतन्तु का कार्य करते हैं और श्वेत कण (White matter) क्रियातन्तु का काम करते हैं।

√★ मेडुला ऑब्लोंगाटा के बाद ज्ञानतन्तु थेलमस (Thalamus) तक पहुंचते हैं। थेलमस बृहत् मस्तिष्क के मध्य में स्थित है। यह भूरे कणों का केन्द्र है। थेलमस के द्वारा ही ज्ञानतन्तु बृहत् मस्तिष्क के दोनों भागों तक पहुंचते हैं। थेलमस बृहत् मस्तिष्क के निचले भाग में स्थित है। यहाँ तक विष्णु के द्वितीय पग अर्थात् अन्तरिक्ष का क्षेत्र है । इसके ऊपर द्युलोक अर्थात् बृहत् मस्तिष्क है । द्युलोक या बृहत् मस्तिष्क को अदृश्य बताया गया है। इसका अभिप्राय है कि जो ध्यानी या योगी जन हैं, वे ही इसके क्रिया- कलाप का साक्षात् ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं। 

√★इस प्रकार जीवविज्ञान की दृष्टि से विष्णु के तीन पग क्रमशः नीचे भूलोक से अन्तरिक्ष और अन्तरिक्ष से द्युलोक को जाते हैं। यह विष्णु (मेरुदण्ड) का क्रमिक ऊर्ध्वारोहण है । ये तीन पग ज्ञान तन्तुओं के तीन प्रसारण केन्द्र (Relay stations) समझने चाहिएं । 

√★थेलमस को जीव-विज्ञान की दृष्टि से अग्नि देवता कहा जाता है और बृहत् मस्तिष्क को इन्द्र देवता । इस प्रकार विष्णु, अग्नि और इन्द्र देव संबद्ध हैं और इनका परस्पर आदान-प्रदान है।

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