गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

श्रीविद्या साधना प्रणाली?.

क्या है तांत्रोत्क श्रीविद्या साधना प्रणाली?.
साधना के प्रकार;- 

यह साधना मुख्यतः दो प्रकार से की जाती है :-

प्रथम प्रकार में (दीक्षा लेकर):- 

1-श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा लेकर साधना संपन्न की जाती है, जिसका प्रथम चरण पूर्ण होने के बाद शेष तीन चरणों के लिए साधक स्वतन्त्र हो जाता है, और केवल कर्ता व दृष्टा मात्र होता है, क्योंकि प्रथम पद धर्म में स्थित होने के बाद के तीनों चरणों में पराम्बा द्वारा अपने साधक को स्वयं में लीन कर लेने तक की क्रिया को पराम्बा अपने साधक से स्वयं ही संपन्न कराती है, और इसी मध्य पराम्बा अपने साधक के सभी कर्मों को भी आंशिक रूप में भोगवाकर कर्मों के बंधन से निवृत कर देती है, क्योंकि मोक्ष के लिए कर्म बंधन से निवृत्ति परम अनिवार्य है ! 

2-इस प्रकार से शेष तीन चरण भी सहज ही संपन्न हो जाते हैं, और साधक को नियमों की बाध्यता भी प्रभावित नहीं करती है ! यह विधि सर्वोत्तम है क्योंकि इसमें एक बार प्रथम चरण किसी प्रकार पूर्ण होने के बाद साधक पर पराम्बा का स्वतन्त्र नियन्त्रण हो जाने के कारण पथभ्रष्ट, पतन व त्रुटि होने की सम्भावनाएं पुर्णतः शून्य हो जाती हैं ! 

3-किन्तु इस विधि से साधना करने वाले साधक को गुरुगम्य होना भी अनिवार्य होता है, तभी तो गुरु उस शिष्य की पात्रता व ग्राह्यता के आधार पर उसको गहन रहस्यों को समझाते हुए सफल होने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है !

दुसरे प्रकार में (दीक्षा अनिवार्य नहीं ) :-

1-उपरोक्त महाविद्या शक्तियों की बालरूपा से वृद्धा रूपा तक की चारों महाविद्याओं की एक-एक करके क्रमशः क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करते हुए साधना की जाती है, इसमें प्रत्येक अवस्था के अनुसार पृथक-पृथक नियमों की बाध्यता सहित साधना विधान पूर्ण करना 

पड़ता है ! 

2-यह अनिवार्य नहीं होता है कि चारों महाविद्याओं के पृथक-पृथक साधना विधान एक-एक या दो-दो बार में ही निर्बाध संपन्न हो जायेंगे! 

3-यदि यह क्रम पूर्ण हो जाए तब पराम्बा चतुर्थ चरण में अपने साधक के सभी कर्मों को भी आंशिक रूप में भोगवाकर कर्मों के बंधन से निवृत कर उसका मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है !

4-किन्तु चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले साधकों को अकेले किसी एक महाविद्या की साधना करके चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेने की भावना व आग्रह से सदैव दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि यदि आप केवल धर्म की सूचक बाल स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो धर्म के साथ-साथ आपके पास धन व सत्ता भी हो यह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि बाल स्वरुपा महाविद्या पुर्णतः धर्म ही सिखाती हैं ! 

5-और यदि आप केवल अर्थ की सूचक तरुण स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो थोड़ा सा धन हाथ में आते ही आप धर्म को कैसे भूल जाते हैं यह आपको स्वयं ही ज्ञात है, क्योंकि तरुण स्वरुपा महाविद्या अतिशय धन के मार्ग बनाती हैं ! 

6-इसी प्रकार से यदि आप केवल काम की सूचक प्रौढ़ा स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो थोड़ा सा धन ओर भले ही छोटा सा ग्राम प्रधान के रूप में थोड़ी सत्ता हाथ में आते ही आप धर्म, नीति ओर मानवता को कैसे भूल जाते हैं यह भी आपको स्वयं ही ज्ञात है, क्योंकि प्रौढ़ा स्वरुपा महाविद्या शासन सत्ता प्रदान करती हैं !

7- तो फिर ऐसे में कर्म बंधन से मुक्त हुए बिना चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति केवल दिवास्वपन से अधिक और कुछ नहीं है, किन्तु यदि धर्म की सूचक बाल स्वरुपा महाविद्या की उपासना व उसका अनुसरण करते हैं तो धर्म जनित संस्कार आपको मोक्ष मार्गी होने के लिए प्रेरित अवश्य ही करेंगे !

8-चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले साधकों को श्रीविद्या क्रम के सम्पूर्ण चारों क्रम की साधना को संपन्न करना चाहिए ! और इस प्रकार से किसी भी कुल में श्रीविद्या की चारों क्रम की पूर्ण साधना संपन्न कर चुका साधक धर्म से प्रारम्भ होकर मोक्ष तक निश्चित ही पहुँच जाता है, यह परम सत्य है !

श्रीविद्या साधना क्रम;-‘

`1-दस महा-विद्याओ’ में तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि वास्तव में आदि-शक्ति एक ही हैं, उन्हीं का आदि रुप ‘काली’ है और उसी रुप का विकसित स्वरुप ‘षोडशी’ है, इसी से ‘षोडशी’ को ‘रक्त-काली’ नाम से भी स्मरण किया जाता है । भगवती तारा का रुप ‘काली’ और ‘षोडशी’ के मध्य का विकसित स्वरुप है । प्रधानता दो ही रुपों की मानी जाती है और तदनुसार ‘काली-कुल′ एवं ‘श्री-कुल′ इन दो विभागों में दशों महा-विद्यायें परिगणित होती हैं ।

2-माँ की पूजाप्रधान रूप से चार स्वरूपों में होती है ।भगवती षोडशी के मुख्यतःचार रुप हैं ;–

( 1) श्री बाला त्रिपुर-सुन्दरी या श्री बाला त्रिपुरा,

( 2) श्री षोडशी या महा-त्रिपुर सुन्दरी तथा

( 3) श्री राज-राजेश्वरी

( 4)ललिता त्रिपुर-सुन्दरी या श्री श्रीविद्या

 3-माँ की दीक्षा और साधना भी इसी क्रम में करनी चाहिए। 

 3-1- श्री बाल सुंदरी >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म,

 3-2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ

 3-3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम

 3-4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष

4-श्री विद्या की प्रधान देवि ललिता त्रिपुर सुन्दरी है । यह धन, ऐश्वर्य भोग एवं मोक्ष की अधिष्ठातृ देवी है । अन्य विद्यायें को मोक्ष की विशेष फलदा है, तो कोई भोग की विशेष फलदा है परन्तु श्रीविद्या की उपासना से दोनों ही करतल-गत हैं ।

5-इसकी उपासना तंत्रों में अति रहस्यमय व गुप्त है तथा पूर्व जन्म के विशेष संस्कारों के बलवान होने पर ही इस विद्या की दीक्षा का योग माना है । साधक को क्रम-पूर्वक दीक्षा लेनी चाहिए तभी उत्तम रहता है । कहीं-कहीं ऐसा देखा गया है कि जिन्होंने क्रम-दीक्षा के बिना ललिता त्रिपुर सुन्दरी की उपासना सीधे की है, उन्हें पहले आर्थिक कठिनाईयाँ प्राप्त हुई है एवं बाद में उसका विकास हुआ ।

1-श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी साधना क्रम;-

1-‘श्री बाला’ का मुख्य मन्त्र तीन अक्षरों का है और उनका पूजा-यन्त्र ‘नव-योन्यात्मक’ है । अतः उन्हें ‘त्रिपुरा’ या ‘त्र्यक्षरी’ नामों से भी अभिहित करते हैं ।

2-श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:- 

ॐ - ऐं - क्लीं – सौः

रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। 

51 माला मंत्र 21 दिन तक लगातार जप अवश्य करें ।

3-मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर 

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2-षोडशी त्रिपुर सुंदरी साधना क्रम;-

1-ध्यान मंत्र;-

बालार्कायुंत तेजसं त्रिनयना रक्ताम्ब रोल्लासिनों। 

नानालंक ति राजमानवपुशं बोलडुराट शेखराम्।। 

हस्तैरिक्षुधनु: सृणिं सुमशरं पाशं मुदा विभृती। 

श्रीचक्र स्थित सुंदरीं त्रिजगता माधारभूता स्मरेत्।।

2-आवाहन मंत्र;-

ऊं त्रिपुर सुंदरी पार्वती देवी मम गृहे आगच्छ आवहयामि स्थापयामि।

रुद्राक्ष/कमल गट्टे की माला लेकर करीब नीचे लिखे मंत्र का जप करें 

3-पंचदशी मंत्र:-

ॐ क ए इ ल ह्रीं ।

ह स क ह ल ह्रीं। 

स क ल ह्रीं ॥

श्रावण मास में आराधना;-

1-श्रावण मास में शिव कृपा पाने के लिए भक्त कई तरह की पूजा करते हैं। इस दौरान यदि माता त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जाए, तो भक्त कई परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। मां त्रिपुर सुंदरी पार्वती का ही रूप हैं और इन्हें प्रसन्न करने का अर्थ है, शिव कृपा की प्राप्ति। यह मास पूजा-पाठ एवं शिव आराधना का महीना है। इस दौरान शिव जी की स्तुति करने से भक्तों के जीवन में खुशहाली आती है और उनके राह की बाधाएं भी दूर होती हैं। इस मास में शिव आराधना का काफी अधिक महत्व है।

2-दरअसल हमार जीवन एवं शरीर नौ ग्रहों से प्रेरित होता है। इन ग्रहों में चंद्रमा पृथ्वी के निकटस्थ होने की वजह से हमारे शरीर पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। चंद्रमा के स्वामी हैं, शिव। श्रावण ऐसा मास है, जिसमें वातावरण में अत्यधिक नमी होती है। यह सब चंद्रमा के प्रभाव की वजह से होता है। इसलिए इस मास में शिव को प्रसन्न करने का उपाय किया जाता है, ताकि उनकी कृपा से शिव कृपा से भी भक्त लाभान्वित हो जाएं।

3- अगर चंद्रमा की कृपा भक्तों पर हो जाए, तो हमें राजसी सुख मिल सकते हैं और यश भी मिलता है। अगर व्यापारिक क्षेत्रों में तरक्की चाहते हों, तो वे इस मास में किसी भी सप्ताह यह साधना कर सकते हैं। दस महाविधाओं में से एक महाविद्या त्रिपुर सुंदरी, राज राजेश्वरी, षोड्षी, पार्वती जी की सूक्ष्म साधना भी लाभप्रद साबित हो सकती है।

4-इस मास के लिए किसी भी सोमवार से अगले सोमवार तक साधना की जा सकती है। प्रात: से लेकर रात्रि तक जो भी समय सुविधापूर्ण लगे, उसमें साधना की जा सकती है। साधना काल के सप्ताह में मांस, मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। साथ ही अनैतिक कृत्यों से भी बचना चाहिए।

5-साधना आरंभ करने से पहले स्नान आदि कर शुद्ध होकर सफेद वस्त्र धारण करें। इसके बाद रेशमी या सफेद रंग के वस्त्र का आसन लें। एक सुपारी को कलावे से अच्छी तरह लपेटकर उसे एक थाली में सफेद वस्त्र के ऊपर रखें। अब देवी पार्वती का ध्यान करते हुए उनसे प्रार्थना करते हुए उनसे उस सुपारी में अपना अंश प्रदान करने की प्रार्थना करें। यह क्रिया ग्यारह बार करें। अब देवी का ध्यान, आवाहन मंत्र जपे।

6-इसके बाद देवी को सुपारी में प्रतिष्ठित कर दें। इसे तिलक करें और धूप-दीप आदि पूजन सामग्रियों के साथ पंचोपचार विधि से पूजन पूर्ण करें अब कमल गट्टे की माला लेकर उपरोक्त लिखे मंत्र का जप करें

7-जब मंत्र जप पूर्ण हो जाए, तो देवी जी से आज्ञा लेकर अपने द्वारा की गई गलतियों की क्षमा मांगकर पूजन कार्य समाप्त करें। यह प्रक्रिया लगातार सात दिनों तक करें। आठवें दिन खील, सफेद तिल, बताशे, चीनी और गुलाब के फूल, बेल पत्र को एक साथ मिलाकर 108 आहूतियों से हवन करें। हवन के लिए मंत्र के आगे ऊं नम: स्वाहा: जोड़कर मंत्रोच्चार करें।

8-साधना आरंभ करने से पहले यह संकल्प जरूर लें कि साधना का उद्देश्य क्या है और यथाशक्ति दान क्या होगा? इस साधना से आपकी कामना पूरी होगी और शिव कृपा भी मिलेगी। पूजा के बाद पूजन सामग्री को एक जगह इकट्ठा कीजिए और देवी से प्रार्थना करें कि वे अब अपने स्थान पर वापस जा सकती हैं। उन्हें धन्यवाद देते हुए साधना का विसर्जन करें। इसके बाद सारी पूजन सामग्री की माला ,प्रतिष्ठित सुपारी को आदरपूर्वक नदी में विसर्जित करें।

9-मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है ।

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3-श्रीराज-राजेश्वरी साधना क्रम;-

श्री राजराजेश्वरी महाविद्या का मूल स्वरूप और साधना विधान ;-

1-भगवती राजराजेश्वरी मूलप्रकृति शक्ति की सुन्दर प्रौढ़ावस्था स्वरूप श्री विग्रह वाली देवी हैं । उदय कालीन सूर्य के समान जिनकी कान्ति है, चतुर्भुजी, त्रिनेत्री, पाश, अंकुश, इक्षु (गन्ना) व पद्म की मुद्रा को धारण किये हुए हैं ।

2- ये भगवती सहज व शांत मुद्रा में सृष्टि संचालक ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र व इन्द्र रूपी चार स्तम्भों के ऊपर स्थित पंचमहाभूतों के संयुक्त स्वरूप शिव रूपी आधारपृष्ठ पर माया "ह"कार की मुद्रा में विराजमान होती हैं । जो जीव इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और कुबेर में कोई भेद नहीं रह जाता है । ललिता, राजराजेश्वरी, षोडशी, बाला, आदि इनकी विभिन्न अवस्थाओं नाम हैं ।

3-भगवती राजराजेश्वरी श्यामा और अरूण वर्ण के भेद से दो कही गयी है प्रथम श्यामा रूप में श्री आनन्दभैरवी, कहलाती हैं तथा द्वितीय अरूण वर्णा श्री राजराजेश्वरी कहलाती हैं ।

4-ये शक्ति तीनों लोकों के समस्त शासन, सत्ता, आदि राजसी सर्वैश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, इसलिए ये राजराजेश्वरी, कमला, महाराज्ञी व महासम्राज्ञी कहलाती हैं ।

5-भगवती राजराजेश्वरी इस सृष्टि के सर्वोच्च आध्यात्म साधना विधान "श्रीविद्या" समूह के अधीन तृतीय पुरुषार्थ "काम" की कुल भेद के अनुसार चार अधिष्ठात्रियों में से एक देवी हैं, व अखिल ब्रह्माण्ड के द्योतक श्रीचक्र में इनका निवास माना जाता है, जिस कारण इनको श्रीविद्या की देवी व श्रीचक्रराज निलया के रूप में भी जाना जाता है।

6-इनकी साधना (अर्थात जप, तप, आत्मसंधान, यज्ञ आदि के द्वारा परा या अपरा अवस्था में स्वयं को इनकी शक्ति में अथवा इनकी शक्ति को स्वयं में विलय करने की प्रक्रिया) प्रमुख रूप में निम्नलिखित दो प्रकार से की जाती है :-

1- महाविद्या साधना विधान :-

1-1-राजराजेश्वरी महाविद्या के रूप में पंचदशाक्षरी मन्त्रों से इनकी साधना की जाती है, महाविद्या रूप में इनकी साधना को संपन्न करने से इस साधना के परिणाम स्वरूप भगवती राजराजेश्वरी अपने महाविद्या साधक के जीवन को समस्त प्रकार के केवल भौतिक शासन, सत्ता, राज सुख, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, धन, धान्य, समृद्धि रत्न, पुत्र आदि सर्वैश्वर्यों से सम्पन्न कर देती हैं !

1-2-महाविद्या के रूप में इनकी साधना करने से केवल भौतिक सम्पन्नता की ही प्राप्ति होती है, जिस सम्पन्नता के मद में स्वार्थवश जीव अपनी मानवीय, धार्मिक, नैतिक व न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने से तनिक भी नहीं चूकता है ! अतः इस प्रकार से की जाने वाली साधना पुर्णतः भौतिक साधना होती है, जिसमें धर्म व आध्यात्म की उपस्थिति व लाभ अनिवार्य नहीं होता है, साधक स्वयं के प्रयास से स्वयं को मानवीय, धार्मिक, नैतिक व न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने से रोक कर आध्यात्मिक बना रह सकता है !

यह साधना मन्त्र भेद के अनुसार 11, 21 या 41 दिन में विधिवत् सम्पन्न कर ली जाती है !

2- श्रीविद्या साधना विधान :-

2-1-श्रीकुल की रीती से "श्रीविद्या पूर्णाभिषेक" में दीक्षित हुआ साधक अपनी श्रीविद्या साधना के अन्तर्गत श्रीविद्या के नियमानुसार "षोडशाक्षरी विद्या" द्वारा सबसे पहले प्रथम पुरुषार्थ "धर्म" की अधिष्ठात्री के रूप में बालस्वरुप व द्वितीय पुरुषार्थ "अर्थ" की अधिष्ठात्री की अधिष्ठात्री तरुण स्वरूपा की साधना सम्पन्न करने के उपरान्त तृतीय पुरुषार्थ "काम" की अधिष्ठात्री के प्रौढ़ स्वरूप में भगवती राजराजेश्वरी का ध्यान करते हुए इनकी साधना को सम्पन्न करता है !

2-2-साधक की यह साधना विधिवत् संपन्न हो जाने पर भगवती राजराजेश्वरी अपने श्रीविद्या साधक के निष्पाप "धर्म व अर्थमय" जीवन को "धर्म व अर्थ से परिपूर्ण काम" पुरुषार्थ प्रदान कर समस्त प्रकार के शासन, सत्ता, राज सुख, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, धन, धान्य, समृद्धि रत्न, पुत्र आदि सर्वैश्वर्यों से सम्पन्न कर उसके लिए शेष अन्तिम पुरुषार्थ "मोक्ष" पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर उसको अग्रिम साधना की ओर अग्रसारित करने के साथ ही उसकी साधना में "मोक्ष" पुरुषार्थ प्राप्त होने तक आध्यात्म मार्ग में स्वयं उसका पूर्ण मार्गदर्शन व सहयोग करती हैं ।

2-3-इस प्रकार से की गई साधना पूर्ण रूप से आध्यात्मिक साधना होती है, क्योंकि इस साधनाकाल में भगवती षोडशी द्वारा पहले ही श्रीविद्या साधक को "धर्म" में स्थित कर दिए जाने पर भगवती त्रिपुरसुन्दरी द्वारा "धर्म से परिपूर्ण अर्थ" पुरुषार्थ प्रदान किया जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप वाह्यान्तर से निष्पाप हो चुका व "धर्म से परिपूर्ण अर्थ व काम" से समृद्ध हुआ साधक नीति, धर्म, मानवता व न्याय के विपरीत कोई कर्म ही नहीं करता है !

2-4-श्रीविद्या साधना विधान "षोडशाक्षरी विद्या" के अन्तर्गत होने के कारण पृथक से किसी महाविद्या की दीक्षा नहीं लेनी होती है, केवल श्रीविद्या साधना विधान के अनुसार साधक के प्रथम व द्वितीय पुरुषार्थ "धर्म व अर्थ" में स्थित हो जाने पर यह साधना भगवती राजराजेश्वरी द्वारा स्वयं ही सम्पन्न करा ली जाती है !

2-5-इनकी उपासना (अर्थात विभिन्न प्रकार से पूजा, पाठ, अर्चना, यज्ञ, स्तोत्र, भक्ति, आदि के द्वारा इनको परा अवस्था में प्रसन्न (सिद्ध) कर मनोरथ सिद्ध करना, अथवा परा या अपरा अवस्था में स्वयं को इनकी शक्ति में अथवा इनकी शक्ति को स्वयं में विलय करने की प्रक्रिया) "महाविद्या" व "श्रीविद्या" दोनों ही विधान में दीक्षित हुए साधकों द्वारा श्रीचक्र (श्री यन्त्र) या नव योनी चक्र के केंद्र में प्रौढ़स्वरुप में की जाती है ।

2-6-भगवती राजराजेश्वरी अपने स्वभाव के अनुसार ही "महाविद्या" व "श्रीविद्या" दोनों ही विधान में दीक्षित होकर साधना पूर्ण कर चुके साधकों को शासन, सत्ता व राजसुख अवश्य ही प्रदान करती हैं !

2-7-जिस प्रकार जंगल की सूखी हुयी घास और पत्तियों को प्रचंड

अग्नि एक क्षण में जला देती है ठीक उसी प्रकार ये साधना पूर्व

जीवन और इस जीवन के सभी पापों को एक ही क्षण में समाप्त

कर भस्मीभूत कर देती है lये साधना तंत्र का आधारहै ,और इसके

बाद कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता हैl

2-8-इस साधना के प्रभाव से साधक सहस्रार से टपकते अमृत को

धारण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है ,और वही अमृत

उसके बिंदु के साथ मिलकर ओजस में परिवर्तित हो जाता है

तथा निर्जरा देह और पूर्ण ऐश्वर्य की प्राप्ति कराता है l

2-9-किसी भी शुक्ल पक्ष की पंचमी को इस साधना का प्रारंभ

किया जाता है , साधना के लिए , श्री यन्त्र की आवशयकता

होती है, श्वेत वस्त्र पहनकर मध्य रात्रि में इस साधना

का प्रारम्भ करे,पूर्ण भगवती राजराजेश्वरी की साधना

में सफलता हेतु श्वेत वस्त्र, आसन, श्वेत पुष्प और खीर

से भगवती और श्री यन्त्र का पूजन करे l ये शास्त्रोक्त पद्धति से पंचोपचार पूजन करने के बाद स्फटिक माला से राजराजेश्वरी मन्त्र की

१०८ माला जप करे,

2-10-दीपक शुद्ध घी का होना चाहिए और इस साधना क्रम को

७ दिनों तक संपन्न करना हैlइस साधना के प्रभाव से स्फटिक

माला विजय माला में परिवर्तित हो जाती हैlइस माला को पूरे

जीवन भर धारण करना हैlराज राजेश्वरी मंत्र में ग की ध्वनि आयेगीl

ये एक अद्विय्तीय साधना है ,जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन को

जगमगाहट से भरा जा सकता हैl

दिव्य भगवती राजराजेश्वरी मंत्र;-

1-''ॐ ऐं ह्रीं श्रीं''

AUM AING HREENG SHREENG

2-षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:-

''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥

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4-माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी आराधना;-

1-ललिता त्रिपुर सुंदरी या त्रिपुर सुंदरी को श्री विद्या भी कहा जाता है ,जो दस महाविद्या में से एक प्रमुख महाविद्या हैं और श्री कुल की अधिष्ठात्री |इन्हें ५१ शक्तिपीठों में भी स्थान प्राप्त है और कामाख्या को भी इनका स्वरुप कहा जाता है [यद्यपि कामाख्या को काली से भी जोड़ा जाता है ]|देवी ललिता आदि शक्ति का वर्णन देवी पुराण में प्राप्त होता है. भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिष में लिंगधारिणीनाम से विख्यात हुईं इन्हें ललिता देवी के नाम से पुकारा जाने लगा.
2-एक अन्य कथा अनुसार ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा जी द्वारा छोडे गये चक्र से पाताल समाप्त होने लगा. इस स्थिति से विचलित होकर ऋषि-मुनि भी घबरा जाते हैं, और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगती है. तब सभी ऋषि माता ललिता देवी की उपासना करने लगते हैं. उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी जी प्रकट होती हैं तथा इस विनाशकारी चक्र को थाम लेती हैं. सृष्टि पुन: नवजीवन को पाती है.
3-श्री ललिता जयंती पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है. पौराणिक मान्यतानुसार इस दिन देवी ललिता भांडा नामक राक्षस को मारने के लिए अवतार लेती हैं. राक्षस भांडा कामदेव के शरीर के राख से उत्पन्न होता है. इस दिन भक्तगण षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते है. इस दिन मां ललिता के साथ साथ स्कंदमाता और शिव शंकर की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है.

4-माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी रक्त काली स्वरूपा हैं।बृहन्नीला तंत्र के अनुसार काली के दो भेद कहे गए हैं कृष्ण वर्ण और रक्त वर्ण।महा विद्याओं में

कोई स्वरुप भोग देने में प्रधान है तो कोई स्वरूप मोक्ष देने में परंतु त्रिपुरसुंदरी अपने साधक को दोनों ही देती है। 

2-शुक्ल पक्ष के समय प्रात:काल माता की पूजा उपासना करनी चाहिए. कालिकापुराण के अनुसार देवी की दो भुजाएं हैं, यह गौर वर्ण की, रक्तिम कमल पर विराजित हैं. प्रतिदिन अथवा पंचमी के दिन ललिता माता के निम्न मंत्र का जाप करने का कुछ विशेष ही महत्व होता है।

माता ललिता का ध्यान धरकर उनकी प्रार्थना एवं निम्न 

मंत्र का जाप करने से मनुष्य सभी कष्टों से मुक्ति पा जाता है।

3-पंचमी के दिन इस ध्यान मंत्र से मां को लाल रंग के पुष्प, लाल वस्त्र आदि भेंट कर इस मंत्र का अधिकाधिक जाप करने से जीवन की आर्थिक समस्याएं दूर होकर धन की प्राप्ति के सुगम मार्ग मिलता है।

4-देवी ललिता जी का ध्यान रुप बहुत ही उज्जवल व प्रकाश मान है. ललिता देवी की पूजा से समृद्धि की प्राप्त होती है. दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को चण्डी का स्थान प्राप्त है. इनकी पूजा पद्धति देवी चण्डी के समान ही है।

5-ललिता माता का पवित्र मंत्र :-

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'

ध्यान मन्त्र से माँ को रक्त पुष्प , वस्त्र आदि चढ़ाकर अधिकाधिक जप करें।

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है। 

 IN NUTSHELL;-

श्रीविद्या साधना संसार की सर्वश्रेष्ठ साधनाओ मे से एक हैं।ध्यान के बिना केवल मन्त्र का जाप करना श्री विद्या साधना नही है।बिना ध्यान के केवल दस प्रतिशत का ही लाभ मिल सकता है।श्रीविद्या साधना में ध्यान का विशेष महत्व हैं। इसलिए पहले ध्यान का अभ्यास करे व साथ-साथ जप करे,अन्त मे केवल ध्यान करें।

साधना क्रम;-

1- श्री बाल सुंदरी >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म,

श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:-

ॐ - ऐं - क्लीं – सौः

मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर

2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ

 षोडशी त्रिपुर सुंदरी(पंचदशी) मंत्र:-

ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं ॥

मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है ।

3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम

षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:-

''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है।

 4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष

 ललिता माता का पवित्र मंत्र :-

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।' 

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

जानिए आपका कौनसा चक्र बिगडा है एवं उसको ठीक कैसे करें-

जानिए आपका कौनसा चक्र बिगडा है एवं उसको ठीक कैसे करें- 

(1) मूलाधार चक्र - गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन ,समृधि ,आत्मबल ,शारीरिक बल ,रोजगार ,कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग ,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार ,डिप्रेशन ,केंसर अदि होता है।
(2) स्वाधिष्ठान चक्र - इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुरियाँ हैं । इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता ,बाँझपन ,मंद्बुधिता ,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।
(3) मणिपूर चक्र - नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता ,गुस्सा ,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया ,दवावो का काम न करना ,अज्ञात भय ,चहरे का तेज गायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता ,हिंशा,दुश्मनी ,अपयश ,अपमान ,आलोचना ,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिरएवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।
(4) अनाहत चक्र - हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है । इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी , जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचनी,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत ,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी अदि ।
(5) विशुद्धख्य चक्र - कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष ,अभिब्यक्ति में कमी ,गले ,नाक,कान,दात, थाई रायेड,आत्मजागरण में बाधा आती है।
(6) आज्ञाचक्र - भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ '?' उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता ,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।
(7) सहस्रार चक्र - सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव ,भाग्य का साथ न देना आदि ।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

सूर्यदेव

#सूर्यदेव साधना।। रवि सप्तमी 8/2/2026 पर अवश्य करें 
       सुख सौभाग्य की वृद्धि के लिए, दुःख दारिद्र्‌य को दूर करने के लिए, रोग व दोष के शमन के लिए इस प्रभावकारी मंत्र की साधना रविवार के दिन करनी चाहिए।
         ॐ सूर्यदेवं नमस्तेस्तु गृहाणं करूणा करं। 
      अर्घ्यं च फलं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम्।। 
       ॐ सर्वतीर्थं समूदभूतं पाद्य गन्धदिभिर्युतम्। 
      प्रचंण्ड ज्योति गृहाणेदं दिवाकर भक्त वत्सलां।। 
                   दिव्यं गन्धाढ़्य सुमनोहरम् । 
          बिलेपनं रश्मिदाता चन्दनं प्रतिगृह यन्ताम्।

इस साधना में रविवार का व्रत अनिवार्य है। व्रत के दिन नमक का उपयोग न करें। रविवार के दिन खुले आकाश के नीचे पूर्व की ओर मुँह करके शुद्ध ऊन के आसन या कुशासन पर बैठकर काले तिल, जौ, गूगल, कपूर और घी मिला हुआ शाकल्य तैयार करके आम की लकड़ियों से अग्नि को प्रदीप्त कर उक्त मंत्र से एक 108आहुतियाँ दें।

मंत्र:-ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः श्रीम्। 
Om hreem ghrani sury aditya shreem. 
सुख सौभाग्य की वृद्धि के लिए, दुःख दारिद्र्‌य को दूर करने के लिए, रोग व दोष के शमन के लिए इस प्रभावकारी मंत्र की साधना रविवार के दिन करनी चाहिए।

तत्पश्चात सिद्धासन लगाकर इसी मंत्र का सौ बार जप करें। जप करते समय दोनों भौंहों के मध्य भाग में भगवान सूर्य का ध्यान करते रहें। इस तरह 11 दिन तक करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। इस साधना में रविवार का व्रत अनिवार्य है।

व्रत के दिन नमक का उपयोग न करें। इसके बाद प्रतिदिन स्नान के बाद ताम्र-पात्र में जल भरकर इसी मंत्र से सूर्य को अर्घ्य दें। जमीन पर जल न गिरे इसलिए नीचे दूसरा ताम्रपात्र रखें। तत्पश्चात इस मंत्र का एक 108बार जप करें।

भगवान सूर्य को नवग्रहों का राजा कहा गया है। जो मनुष्य सूर्य को12 नाम लेते हुए जल अर्पण करते हैं पाप मुक्त होते हुए आरोग्य प्राप्त करते हैं। 
 
                ।।सूर्य अष्टकम।। 
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। 
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥१॥

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥२॥

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥३ ॥

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥४ ॥

बृंहितं तेजसां पुञ्जं वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥५॥

बन्धूकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम् । 
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥६ ॥

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥७ ॥

तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम्। 
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥८॥

मात्र इतना स्तोत्र, मंत्र जप करने से आयुष्य, आरोग्य, ऐश्वर्य और कीर्ति की उत्तरोत्तर वृद्धि होती है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

अश्लेषा नक्षत्र शास्त्रीय, गणितीय एवं दार्शनिक विवेचन सहित"

"अश्लेषा नक्षत्र शास्त्रीय, गणितीय एवं दार्शनिक विवेचन सहित" 

✓•१. प्रस्तावना: वैदिक नक्षत्र–पद्धति भारतीय खगोल–ज्योतिष की अत्यन्त सूक्ष्म एवं गणितीय संरचना पर आधारित है। नक्षत्र केवल तारामण्डलीय खण्ड नहीं, बल्कि काल–चेतना, कर्म–विधान तथा मानसिक प्रवृत्तियों के गूढ़ संकेतक हैं। इन्हीं नक्षत्रों में अश्लेषा को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि यह बंधन, आवेष्टन, विष, रहस्य, गूढ़ बुद्धि तथा मानसिक ग्रन्थियों का प्रतिनिधि है।

अश्लेषा नक्षत्र को सामान्यतः “नाग–नक्षत्र” कहा गया है। यह नक्षत्र चेतना को बाँधने और मुक्त करने—दोनों की क्षमता रखता है। इस शोधप्रबंध में अश्लेषा नक्षत्र का वैदिक–शास्त्रीय, गणितीय–खगोलिक, फलित–ज्योतिषीय, नवांश–कर्मिक, तथा दार्शनिक स्तर पर चरणबद्ध विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।

✓•२. नक्षत्र–स्थान एवं गणितीय संरचना:

✓•२.१ राशि–नक्षत्र सम्बन्ध:
•अश्लेषा नक्षत्र कर्क राशि में स्थित है।
•कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा है।
•अतः अश्लेषा का मूल स्वभाव मानसिक, भावनात्मक एवं स्मृति–प्रधान होता है।

✓•२.२ खगोलीय सीमा (Ecliptic Longitude):
•अश्लेषा नक्षत्र की दीर्घांश सीमा:
कर्क १६°४०′ से कर्क ३०°००′ तक

∆इसे दशांश में व्यक्त करें तो—
•प्रारम्भ: १०६°४०′
•समाप्ति: १२०°००′
यह सीमा नक्षत्र–वृत्त के अंतिम भाग को दर्शाती है, जहाँ चन्द्रमा का ग्रन्थि–स्वरूप अत्यधिक सक्रिय हो जाता है।

✓•२.३ नक्षत्र–विस्तार गणना
•प्रत्येक नक्षत्र का विस्तार =
१३°२०′ (तेरह अंश बीस कला)
अश्लेषा भी इसी गणितीय मान पर स्थित है।

✓•३. वैदिक एवं शास्त्रीय प्रमाण:

✓•३.१ वैदिक सन्दर्भ:
अश्लेषा का सम्बन्ध सर्प–तत्त्व से है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में सर्प को गुप्त शक्ति एवं रहस्यमय चेतना का प्रतीक माना गया है।
अथर्ववेद में सर्प–विद्या को भय और रक्षा—दोनों का कारण कहा गया है।

✓•३.२ तैत्तिरीय संहिता का संकेत

"तैत्तिरीय संहिता","यजुर्वेद" में नागों को अन्तःस्थ शक्तियों का अधिष्ठाता कहा गया है—जो बन्धन भी देती हैं और मुक्ति भी।

 “नागा वै प्राणाः”
(नाग ही प्राण–शक्ति हैं)

यह कथन अश्लेषा की मूल दार्शनिक व्याख्या का आधार है।

✓•४. अश्लेषा नक्षत्र के अधिष्ठाता:

✓•४.१ देवता – नाग (सर्प)
•देवता: नाग
•प्रतीक: सर्प का कुण्डलित रूप
•तत्त्व: विष + औषधि
नाग का अर्थ केवल भौतिक सर्प नहीं, बल्कि कुण्डलिनी शक्ति से भी है।

✓•४.२ नक्षत्र–शक्ति (Shakti):
अश्लेषा की शक्ति –
 विष–प्रयोग द्वारा नियंत्रण एवं उपचार

अर्थात जो व्यक्ति को बाँध भी सकती है और उसी बन्धन से मुक्त भी कर सकती है।

✓•५. नक्षत्र–पाद (चरण) एवं नवांश गणना:
प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं, प्रत्येक का विस्तार:
•३°२०′ (तीन अंश बीस कला)

चरण नवांश राशि मानसिक प्रवृत्ति
प्रथम मेष आक्रामक बुद्धि
द्वितीय वृषभ संग्रहात्मक प्रवृत्ति
तृतीय मिथुन छल–युक्त वाणी
चतुर्थ कर्क भावनात्मक बन्धन

•यह गणना स्पष्ट करती है कि अश्लेषा के प्रत्येक चरण में बंधन की प्रकृति अलग–अलग प्रकार से कार्य करती है।

✓•६. फलित–ज्योतिषीय विश्लेषण:

✓•६.१ चन्द्रमा अश्लेषा में:
•तीव्र स्मरण–शक्ति
•मानसिक चातुर्य
•रहस्यप्रियता
भावनात्मक नियंत्रण की प्रवृत्ति

✓•६.२ लग्न या दशा में अश्लेषा:
व्यक्ति मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने में सक्षम
गुप्त रणनीति
तांत्रिक, औषधीय, विष–विज्ञान या गूढ़ विषयों में रुचि

✓•७. अश्लेषा एवं कर्म–बंधन:
अश्लेषा नक्षत्र को कर्म–ग्रन्थि कहा गया है।
यह नक्षत्र—
•पूर्वज–ऋण
•मानसिक संस्कार
•वाणी से उत्पन्न कर्म
को सक्रिय करता है।

यदि अश्लेषा पीड़ित हो, तो व्यक्ति स्वयं के ही जाल में फँसता है।

✓•८. अश्लेषा नक्षत्र एवं आयुर्वेद:
आयुर्वेद में विष को भी औषधि माना गया है—

 “विषमेव अमृतं भवेत्”

अश्लेषा इसी सिद्धान्त का ज्योतिषीय रूप है।
इस नक्षत्र में जन्मा व्यक्ति—
•विष–औषधि
•मनोचिकित्सा
•हर्बल–टॉक्सिन अध्ययन
में दक्ष हो सकता है।

✓•९. तांत्रिक एवं दार्शनिक पक्ष:
अश्लेषा नक्षत्र का सीधा सम्बन्ध—
•कुण्डलिनी
•नाग–साधना
•मन्त्र–गोपनीयता
से है।

∆यह नक्षत्र बताता है कि—
• बंधन ही मुक्ति का द्वार है।

✓•१०. दोष, शान्ति एवं उपाय:

✓•१०.१ अश्लेषा दोष के लक्षण:
•मानसिक भय
•अवसाद
•वाणी–दोष
•गुप्त शत्रु

✓•१०.२ शान्ति उपाय:
•नाग–पूजन
•चन्द्र शान्ति
•दुग्ध–अभिषेक
•मौन–व्रत
विशेषतः कर्क मास एवं श्रावण में उपाय प्रभावी माने गए हैं।

✓•११. गणितीय निष्कर्ष:
यदि चन्द्रमा की औसत दैनिक गति १३°१०′३५″ मानी जाए, तो—
अश्लेषा में चन्द्रमा का औसत प्रवास ≈ एक दिन
यह नक्षत्र क्षणिक लेकिन तीव्र कर्म–फल देता है।

✓•१२. उपसंहार:
अश्लेषा नक्षत्र केवल भय या विष का प्रतीक नहीं, बल्कि गहन चेतना–परिवर्तन का द्वार है।
यह नक्षत्र बताता है कि—
जो बाँधता है, वही मुक्त करता है।
जो विष है, वही औषधि बन सकता है।
अतः अश्लेषा को समझना, स्वयं के मानसिक बन्धनों को समझने के समान है।