गुरुवार, 22 जनवरी 2026

भगवान विष्णु

★★★भगवान विष्णु ★★★

   √● (१) विष्णु का स्वरूप विष्णु क्या हैं ?- विष्णु का अर्थ है- 'वेवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णुः' जो सर्वत्र व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। वह व्यापनशील तत्त्व जो संसार के कण-कण में व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं। यह विष्णु सर्वव्यापक, विश्वात्मा और सर्व नियन्ता है। इसके दो रूप हैं- एक सूक्ष्म सत्ता या वामनरूप (Microcosm), इस रूप में यह अणु या परमाणु (Atom) है। इसका दूसरा रूप है- विराट् सत्ता या बृहत् रूप (Macrocosm), इस रूप में यह ब्रह्माण्ड या संसार (Universe) है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि जो विष्णु है, वही वामन है, अर्थात् विष्णु और वामन एक ही तत्व हैं। 

"वामनो ह विष्णुरास।"
  (शत०१.२.५.५)

√● विष्णु के अणुरूप या अणिमा को वामन कहते हैं और विस्तृत या व्याप्तरूप को भूमा (भूमन्) कहते हैं। यह बीजरूप में अणु या परमाणु (Atom) है। यही विराट् रूप में सृष्टि, ब्रह्माण्ड या संसार है। इस सृष्टि का निर्माण जिस आधार पर हुआ है, वह आधार या ईंट रूप तत्त्व परमाणु है। परमाणु के मध्य में एक धन विद्युत् (Positive) का बिन्दु है, इसे केन्द्र या न्यूक्लियस (Nucleus) कहा जाता है। इसका व्यास एक इंच के दस लाखवें भाग का भी दस लाखवां भाग माना जाता है। परमाणु के अस्तित्व का सार इसी केन्द्र या हृदय भाग में माना जाता है। इसी केन्द्र के चारों ओर लाखों अतिसूक्ष्म विद्युत्- कण चक्कर काटते हैं। ये ऋण विद्युत्-प्रधान (Negative) होने के कारण इलेक्ट्रान (Electron) कहे जाते हैं। ये इलेक्ट्रान केन्द्र से अत्यन्त आकृष्ट हैं और केन्द्र से मिलने के लिए आतुर रहते हैं । अतएव ये केन्द्र के चारों ओर चक्कर काटते रहते हैं।

√●● विज्ञान ने सूक्ष्म (वामन अणु) और विराट् (भूमा) के संबन्ध और कार्यविधि पर विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जो नियम और विधि परमाणु में कार्य कर रही है, वही नियम और विधि ब्रह्माण्ड में भी काम करती है। अतएव कहा गया है कि- 

"यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे।"

  √● अर्थात् जो नियम पिण्ड (अणु) में कार्य कर रहे हैं, वे ही ब्रह्माण्ड में भी चल रहे हैं। इन शाश्वत नियमों को वैदिक भाषा में 'ऋत' (Eternal laws) कहते हैं। इस प्रकार विज्ञान की दृष्टि में भी अणु और ब्रह्माण्ड की रचना में कार्यविधि की दृष्टि से एकरूपता है। इसी विचार से भारतीय मनीषियों ने विष्णु को एक ओर 'अणोरणीयान्' (सूक्ष्म से सूक्ष्मतर) कहा और दूसरी ओर 'महतो महीयान्' (बड़े से बड़ा) कहा है।

√● विष्णु के तीन पग- वेदों के अनेक मंत्रों में विष्णु के तीन पगों (पैरों, चरणों) का उल्लेख मिलता है।

"इदं विष्णुर्वि चक्रमे, त्रेधा निदधे पदम् ।
 समूढमस्य पांसु ।।"
  ( ऋग्० १.२२.१७ । यजु० ५.१५ । अथर्व० ७.२६.४ । साम० २२२)

√● मंत्र का अभिप्राय है कि विष्णु ने पराक्रम किया और उसने तीन पद (पैर, पग) रखे । उसके धूलियुक्त पैरों में सारा संसार व्याप्त है। 

√●विष्णु के तीन पगों की अनेक प्रकार से व्यवस्था की गई है। संसार की दृष्टि से विष्णु के तीन पग हैं- द्यु, अन्तरिक्ष और भूलोक । गुणों की दृष्टि से द्युलोक सात्त्विक है, अन्तरिक्ष राजस और भूलोक (पृथ्वी) तामस है। जीवन की दृष्टि से तीन पग है- आदि, मध्य और अन्त । जन्म, विकास और मृत्यु । सूर्य का उदय होना, मध्याह्न और सायंकाल ये विष्णु (सूर्य) के तीन पग हैं। इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु का आदि, मध्य और अन्त है। इन तीन पगों में जीवन की समग्रता आ जाती है। 

√●मंत्र में 'पांसुरे' (धूलियुक्त) शब्द विचारणीय है। पांसु (धूल, रज) शब्द संकेत करता है कि अणु का स्वरूप कण-रूप है। यह तेजोमय कण है, जो तीन तत्त्वों- प्रोटान (Proton, धनात्मक विद्युत्), इलेक्ट्रान (Electron, ऋणात्मक विद्युत् ) और न्यूट्रान (Neutron, उदासीन) का संमिलित रूप है। इनमें प्रोटॉन प्रेरक तत्त्व है। यह गति और प्रेरणा देता है। इलेक्ट्रान प्रेरित होने वाला तत्त्व है। इसमें प्रेरणा होती है, गति होती है और वस्तु का विकास होता है। न्यूट्रान यह उदासीन तत्त्व है। यह आश्रय, आधार या स्थिति- स्थापक है । इसकी सत्ता से ही उक्त दोनों की स्थिति है। गणित की दृष्टि से इन्हें क्रमशः घन (Plus+), ऋण (Minus) और शून्य (Zero, ०) कह सकते हैं। 

√◆◆पृथ्वी के सात धाम- ऋग्वेद का कथन है कि पृथिवी के सात धाम हैं। उनके आधार पर विष्णु अपना पराक्रम करता है। वहाँ से सारे देव हमारी रक्षा करें। 

"अतो देवा अवन्तु नो, यतो विष्णुर्विचक्रमे ।
 पृथिव्याः सप्त धामभिः ।।"
   ( ऋग्० १.२२.१६)

√● पृथिवी के सात धाम कौन से हैं, जहाँ से विष्णु का पराक्रम प्रारम्भ होता है। पृथिवी के सात धाम से अभिप्राय है- पृथिवी के सात परत, तह (Layers, Strata) । पृथ्वी के नीचे सात परत या तह हैं। पृथिवी की सबसे मोटी परत पहली परत है। इसके नीचे पत्थर या चट्टानों की परत है। उससे नीचे जल, अग्नि, गैस, आदि की परत हैं। अन्त में सातवीं परत में नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) है। यह नाभिकीय ऊर्जा ही पृथिवी को निरन्तर घुमा रही है। नाभिकीय ऊर्जा सहित सातों परत विष्णु के स्थान हैं। सर्वत्र विष्णु व्याप्त है। विष्णु का पराक्रम सातों धाम और मुख्य रूप से नाभिकीय ऊर्जा से प्रारम्भ होता है। इसी से पृथ्वी का रक्षण, संरक्षण, पालन-पोषण होता है। पृथिवी की सारी ऊर्जा का श्रेय विष्णु को है। यदि नाभिकीय ऊर्जा का संरक्षण प्राप्त न हो तो पृथिवी मरुस्थल बन जाएगी। 

√●●विष्णु और वरुण सारे लोकों के धारक- यजुर्वेद के एक महत्त्वपूर्ण मंत्र में कहा गया है कि विष्णु और वरुण के प्रताप से ही सारे लोक रुके हुए हैं। ये दोनों देव सबसे अधिक वीर और पराक्रमी हैं। ये सबसे अधिक बली हैं। इनको किसी अन्य के सहयोग की आवश्यकता नहीं है। ये सबके स्वामी हैं, अतएव इनका सबसे पहले आह्वान किया जाता है । 

"ययोरोजसा स्कभिता रजांसि वीर्येभिर्वीरतमा शविष्ठा । 
या पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन् वरुणा पूर्वहूतौ ।।"
     ( यजु० ८.५९ )

√●लोकों की स्थिरता के लिए दो तत्त्वों की अनिवार्य आवश्यकता है। वे हैं- अग्नि और सोम । सारा संसार अग्नि और सोमीय तत्त्वों के मिश्रण से बना है। अतएव बृहत् जाबाल उपनिषद् में कहा गया है कि- 

"अग्नीषोमात्मकं विश्वम् ।"
     ( बृहत्० उप० २.२)

" अग्नीषोमात्मकं जगत् ।"
    ( बृहत्० उप० २.३)

√● विष्णु नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) होने से अग्नि या आग्नेय तत्त्व है और वरुण सोम या सोमीय तत्त्व है, अतः ये दोनों लोकों के निर्माता, रक्षक और स्थिरता के कारण हैं। इन दोनों की महिमा अपार है। इन्हें किसी अन्य की सहायता और सहयोग अपेक्षित नहीं है। अतएव मंत्र में कहा गया है कि इनकी शक्ति से सारे लोक स्थिर हैं। 

√●विष्णु के सहयोगी वरुण और अश्विनी ऋग्वेद का कथन है कि विष्णु के कार्य को वरुण और अश्विनी अपना सहयोग देकर पूरा करते हैं। विष्णु अपने मित्रों के सहयोग से अंधकार को दूर करता है और प्रकाश फैलाता है। 

"तमस्य राजा वरुणस्तमश्विना, 
क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः ।
 दाधार दक्षमुत्तममहर्विदं, 
व्रजं च विष्णुः सखिवाँ अपोर्णुते ।"
     ( ऋग्० १.१५६.४ )

√●शरीर-संरचना की दृष्टि से विष्णु मेरुदण्ड (Spinal Cord) है। यह उदासीन (Neutral) है। इसमें बहने वाला सोमरस या द्रव (Cerebro- spinal fluid ) है। यह वरुण है। मेरुदंड के दोनों ओर विद्यमान Afferent और Efferent herves ही अश्विनीकुमार रूपी गुगल है । मंत्र का कथन है कि वरुण और अश्विनी के सहयोग से ही विष्णु अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करके मस्तिष्क को ज्ञानरूपी प्रकाश देता है।

√●भौतिकविज्ञान की दृष्टि से विष्णु का अर्थ सूर्य है। सूर्य की किरणों को अश्विनी अर्थात् Electro-magnetic waves पृथिवी तक लाते हैं। वरुण अर्थात् Electron का इसमें सहयोग रहता है। इस प्रकार विष्णु (सूर्य) पृथिवी के अंधकार को दूर करके भूमंडल पर प्रकाश फैलाता है।

√● विष्णु का वृत्त - ऋग्वेद का कथन है कि विष्णु संसार में एक वृत्त (Circle, Circumference) या परिधि के रूप में है। इसके ९०° अंश वाले ४ भाग हैं अर्थात् ९०x४= ३६०° अंश की पूरी परिधि है। विष्णु 'युवा कुमार' है अर्थात् नित्य युवा है और 'बृहत्-शरीरः' बड़े शरीर अर्थात् विराट् रूप में इस वृत्त में विद्यमान है और उसी से कालचक्ररूपी यज्ञ को चला रहा है। 

"चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभि श्चक्रं न वृत्तं व्यतींरवीविपत् ।
 बृहच्छरीरो विभिमान ऋक्वभिर्युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम् ।।"
      ( ऋग्० १.१५५.६)

√● इसका अभिप्राय यह है कि विष्णु विराट् रूप में परिधि (घेरे) की तरह इस पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है । सारा संसार उस घेरे में आ जाता है। ऐसी कोई चीज नहीं है जो वृत्त या घेरे से बाहर हो । इस वृत्त (घेरे) के ९०° अंश वाले चारों भाग हैं अर्थात् ९०x४= ३६०° अंश इस वृत्त के हैं। विष्णु नित्य युवा या तरुण है। यह ब्रह्माण्ड उसका विशाल शरीर है। इस परिधि-रूपी वृत्त से यह कालचन्द्ररूपी यज्ञ सदा चल रहा है।

√★★★ (२) विष्णु का जीव वैज्ञानिक स्वरूप प्रो० रेले (V.G. Rele) ने जीव-विज्ञान की दृष्टि से विवेचन करते हुए यह निष्कर्ष दिया है कि विष्णु पृष्ठवंश या मेरुदण्ड (Spinal Cord) है। विष्णु के विषय में त्रिविक्रम या तीन पग चलना आदि जो बातें कही गई हैं, वे मेरुदण्ड मानने पर सरलता से स्पष्ट हो जाती हैं। 

     √★मनुष्य आदि सभी पृष्ठधारी जीवों में मेरुदण्ड गर्भ में सर्वप्रथम पूर्त रूप लेता है। उसके बाद अन्य अवयवों का प्रादुर्भाव होता है। विष्णु को पृथिवी का धारक माना जाता है। मेरुदंड ही शरीर के सभी अंगों और मांसपेशियों आदि को धारण करता है। यह भूतल या शरीर का सबसे नीचे का भाग है, अतएव इसको विष्णु का प्रथम पग माना जाता है। इसका कार्य है- शरीर की सभी संवेदनाओं का आदान-प्रदान। यह ज्ञानतन्तुओं (Afferent Nerves) के द्वारा संवेदनाओं को ग्रहण करता है और क्रियातन्तुओं (Efferent) के द्वारा उसे कार्यान्वित करता है। मेरुदण्ड में ज्ञान और क्रियात तुओं का जाल बिछा हुआ है। ये तन्तु (Nerves) मेरुदण्ड के दोनों ओर फैले हुए हैं। ज्ञानतन्तुओं से सूचना प्राप्त करना और क्रियातन्तुओं से तदनुसार कार्य करने की प्रेरणा देना इनका कार्य है।

√★मेरुदण्ड के विविध केन्द्र परस्पर जुड़े हुए हैं। ये जब तक पूर्ण विकसित नहीं हो जाते हैं, तब तक बच्चे में इन दोनों प्रकार के तन्तुओं से ही बालक में जीवन-प्रणाली काम करती है। इसके बाद जब भ्रूण विकसित अवस्था में आता है तो इसका संबन्ध केन्द्रीय तन्त्री- जाल (Central Nervous System) से होता है। अब केन्द्रीय तन्त्री-जाल दो प्रकार से कार्य करता है। प्रथम है- बाहर से ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा सूचनाएं प्राप्त करना । यह ज्ञानतन्तुओं (Afferent nerves) का काम है। ये जो सूचनाएं प्राप्त करती हैं, उन्हें ऊपर केन्द्रीय नाडी जाल को भेजती हैं और केन्द्रीय नाडीजाल उन पर अपना निर्णय कार्यतन्तुओं (Efferent) के द्वारा नीचे भेजता है। ज्ञानतन्तुओं की गति धीमी है। ये आसपास के विभिन्न केन्द्रों को उत्तेजित करते हैं और उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे क्रियातन्तुओं को प्रेरित करें कि वे तदनुकूल कार्य करें। क्रियातन्तुओं की गति तीव्र है । 

√★अब ज्ञानतन्तुओं और क्रियातन्तुओं का क्षेत्र बढ़कर मेडुला ऑब्लोंगाटा (Medulla Oblongata) तक हो जाता है। मेडुला ऑब्लोंगाटा बृहत् मस्तिष्क का सबसे नीचे का भाग है। यह मस्तिष्क और मेरुदण्ड के बीच मध्यस्थता का काम करता है। इसका ऊपर संबन्ध बृहत् मस्तिष्क से है और नीचे मेरुदण्ड से। यह मानवशरीर का मध्य या अन्तरिक्ष है। यह विष्णु का द्वितीय पग (Step) है। इसके ऊपर बृहत् मस्तिष्क विष्णु का तृतीय पग माना जाता है। इसको ही मानवशरीर में द्युलोक कहा जाता है। भूरे कण (Grey matter) ज्ञानतन्तु का कार्य करते हैं और श्वेत कण (White matter) क्रियातन्तु का काम करते हैं।

√★ मेडुला ऑब्लोंगाटा के बाद ज्ञानतन्तु थेलमस (Thalamus) तक पहुंचते हैं। थेलमस बृहत् मस्तिष्क के मध्य में स्थित है। यह भूरे कणों का केन्द्र है। थेलमस के द्वारा ही ज्ञानतन्तु बृहत् मस्तिष्क के दोनों भागों तक पहुंचते हैं। थेलमस बृहत् मस्तिष्क के निचले भाग में स्थित है। यहाँ तक विष्णु के द्वितीय पग अर्थात् अन्तरिक्ष का क्षेत्र है । इसके ऊपर द्युलोक अर्थात् बृहत् मस्तिष्क है । द्युलोक या बृहत् मस्तिष्क को अदृश्य बताया गया है। इसका अभिप्राय है कि जो ध्यानी या योगी जन हैं, वे ही इसके क्रिया- कलाप का साक्षात् ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं। 

√★इस प्रकार जीवविज्ञान की दृष्टि से विष्णु के तीन पग क्रमशः नीचे भूलोक से अन्तरिक्ष और अन्तरिक्ष से द्युलोक को जाते हैं। यह विष्णु (मेरुदण्ड) का क्रमिक ऊर्ध्वारोहण है । ये तीन पग ज्ञान तन्तुओं के तीन प्रसारण केन्द्र (Relay stations) समझने चाहिएं । 

√★थेलमस को जीव-विज्ञान की दृष्टि से अग्नि देवता कहा जाता है और बृहत् मस्तिष्क को इन्द्र देवता । इस प्रकार विष्णु, अग्नि और इन्द्र देव संबद्ध हैं और इनका परस्पर आदान-प्रदान है।

"आर्द्रा नक्षत्र"

"आर्द्रा नक्षत्र" 

✓•१. भूमिका: वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों की अवधारणा केवल खगोलीय विभाजन नहीं, अपितु काल, कर्म और चेतना के सूक्ष्म गणित का प्रत्यक्ष निरूपण है। प्रत्येक नक्षत्र निश्चित अंशात्मक परिमाण, चरणात्मक संरचना तथा दार्शनिक अर्थ से संयुक्त होता है। आर्द्रा नक्षत्र इस दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह परिवर्तन, विदारण, दुःख-जन्य बोध तथा नवसृष्टि का नक्षत्र है।

पूर्व प्रस्तुति में नक्षत्र-चरण (पाद) तथा गणितीय मानों का अभाव था। अतः इस शोधप्रबंध में आर्द्रा नक्षत्र का पूर्ण खगोलीय–ज्योतिषीय गणित, चरण-विभाजन, नवांश-संबंध, राशि-अंश, तथा शास्त्रीय प्रमाणों सहित क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।

✓•२. आर्द्रा नक्षत्र : नाम-व्युत्पत्ति एवं निरुक्तीय अर्थ
‘आर्द्रा’ शब्द संस्कृत धातु अर्द् से निष्पन्न है।

∆निरुक्त (यास्क) के अनुसार—

 “अर्दनात् द्रवणात् च आर्द्रा।”

•अर्थात् जो द्रवण, पीड़ा या विदारण के कारण आर्द्रता उत्पन्न करे, वही आर्द्रा है।
यह आर्द्रता केवल भौतिक जल नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक द्रवण का प्रतीक है।

✓•३. खगोलीय एवं गणितीय संरचना (Astronomical & Mathematical Framework):

✓•३.१ नक्षत्र का कुल परिमाण:

∆वैदिक सिद्धान्त के अनुसार—
•सम्पूर्ण राशि-चक्र = ३६० अंश
•कुल नक्षत्र = २७
•एक नक्षत्र का मान =
३६० ÷ २७ = १३ अंश २० कला

∆अतः—
•१ नक्षत्र = १३°२०′

✓•३.२ आर्द्रा नक्षत्र के अंशात्मक मान:
आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में स्थित है।
•मिथुन राशि का आरम्भ = ६० अंश
•आर्द्रा का आरम्भ = ६°४०′ मिथुन
•आर्द्रा का अन्त = २०°००′ मिथुन

∆गणितीय रूप से—
•६°४०′ = ६ + (४० ÷ ६०) = ६.६६… अंश
•२०°००′ = २० अंश

∆अतः आर्द्रा का क्षेत्र =
६°४०′ से २०°००′ (मिथुन राशि)

✓•४. आर्द्रा नक्षत्र के चरण (पाद) : पूर्ण गणितीय विवेचन
•प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण (पाद) होते हैं।
•१ चरण = ३°२०′
•३°२०′ = ३ + (२० ÷ ६०) = ३.३३… अंश

✓•४.१ प्रथम चरण (पाद):
•सीमा : ६°४०′ – १०°००′ मिथुन

∆गणित :
६°४०′ + ३°२०′ = १०°००′
•नवांश राशि : मेष
•नवांश स्वामी : मंगल

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण तीव्र, उग्र, साहसी, विद्रोही एवं कर्मप्रधान होता है। जातक में रुद्र का उग्र स्वरूप प्रधान रहता है।

✓•४.२ द्वितीय चरण (पाद):
•सीमा : १०°००′ – १३°२०′ मिथुन
•नवांश राशि : वृषभ
•नवांश स्वामी : शुक्र

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण आर्द्रा की कठोरता में स्थायित्व, भोग, कला एवं आकर्षण जोड़ता है। मानसिक द्वन्द्व अधिक होता है।

✓•४.३ तृतीय चरण (पाद):
•सीमा : १३°२०′ – १६°४०′ मिथुन
•नवांश राशि : मिथुन
•नवांश स्वामी : बुध

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण बौद्धिकता, तर्क, विज्ञान, लेखन, शोध एवं भाषिक क्षमता को प्रबल करता है। आर्द्रा का दार्शनिक रूप यहाँ स्पष्ट होता है।

✓•४.४ चतुर्थ चरण (पाद):
•सीमा : १६°४०′ – २०°००′ मिथुन
•नवांश राशि : कर्क
•नवांश स्वामी : चन्द्र

∆फलात्मक संकेत:
यह चरण अत्यन्त भावनात्मक, करुणाशील, संवेदनशील तथा अन्तर्मुखी होता है। यहाँ आर्द्रा की ‘आर्द्रता’ पूर्ण रूप से प्रकट होती है।

✓•५. नक्षत्र-स्वामी, देवता एवं तत्त्व:
•नक्षत्र स्वामी : राहु
•अधिदेवता : रुद्र
•तत्त्व : जल
•गुण : तामस-रजस मिश्रित
•गण : मनुष्य

•बृहत्पाराशर होराशास्त्र में राहु को असामान्य कर्मपथ का कारक कहा गया है। अतः आर्द्रा जातक परम्परागत मार्ग से भिन्न दिशा में अग्रसर होते हैं।

✓•६. वैदिक एवं शास्त्रीय प्रमाण:

✓•६.१ ऋग्वेद:

ऋग्वेद (२।३३।११)—

 “मृळा नो रुद्रो मृळयति।”

•रुद्र यहाँ संहारक ही नहीं, बल्कि उपचारक भी हैं। यही द्वैत आर्द्रा नक्षत्र का मूल है।

✓•६.२ तैत्तिरीय संहिता:

 “नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः।”

•यह श्लोक रुद्र की उग्र शक्ति के शमन का संकेत देता है—आर्द्रा में शमन अनुभव के पश्चात् होता है।

✓•७. मनोवैज्ञानिक एवं कर्मफलात्मक विश्लेषण:

∆आर्द्रा नक्षत्र में जन्मा जातक—
•तीव्र मानसिक संघर्ष से गुजरता है
•अचानक परिवर्तन झेलता है
•दुःख के माध्यम से बोध प्राप्त करता है
•वैज्ञानिक, ज्योतिषी, दार्शनिक या शोधकर्ता बनता है
यह नक्षत्र कर्म-शोधन का कार्य करता है।

✓•८. नवांश एवं आर्द्रा का विशेष सम्बन्ध:
•आर्द्रा के चारों चरण चार भिन्न नवांशों में स्थित होकर यह स्पष्ट करते हैं कि—
•आर्द्रा एक बहु-आयामी नक्षत्र है
•केवल राशि से नहीं, नवांश से फल का निर्णय आवश्यक है

∆विशेषतः चतुर्थ चरण (कर्क नवांश) में आर्द्रा जातक आध्यात्मिक पीड़ा के उच्चतम स्तर को स्पर्श करता है।

✓•९. आध्यात्मिक दृष्टि से आर्द्रा:
आर्द्रा नक्षत्र रुद्र-तत्त्व का प्रत्यक्ष क्षेत्र है। यह नक्षत्र—
•महामृत्युंजय जप
•रुद्राभिषेक
•तांत्रिक साधना
के लिए अत्यन्त प्रभावी माना गया है।

∆उपनिषदों का वाक्य—

 “दुःखमेव ज्ञानाय कल्पते।”

आर्द्रा नक्षत्र का दार्शनिक सूत्र है।

✓•१०. निष्कर्ष: गणितीय, खगोलीय, शास्त्रीय एवं दार्शनिक—चारों स्तरों पर विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि आर्द्रा नक्षत्र परिवर्तन का गणितीय सूत्र है। इसके चरण, अंश, नवांश और देवता—सभी मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि—

• विनाश के बिना नवसृजन सम्भव नहीं।

आर्द्रा नक्षत्र मानव चेतना को विदीर्ण कर उसे उच्चतर बोध की ओर ले जाता है। यही इसका वास्तविक ज्योतिषीय एवं आध्यात्मिक महत्त्व है।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

"याजुषज्योतिषम्"

"याजुषज्योतिषम्" 

पंचसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम् ।
दिनर्त्वयनमासांगं प्रणम्य शिरसा शुचिः ॥ १॥

ज्योतिषामयनं पुण्यं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।
विप्राणां सम्मतं लोके यज्ञकालार्थ सिद्धये ॥ २॥

वेद हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः ।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान् ॥ ३॥

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा ।
तद्वद्वेदांगशास्त्राणां ज्यौतिषं मूर्धानि स्थितम् ॥ ४॥

ये बृहस्पतिना भुक्ता मीनात्प्रभृति राशयः ।
ते हृताः पंचभिर्भूता यः शेषः स परिग्रहः ॥ ०॥

माघशुक्लप्रपन्नस्य पौषकृष्णसमापिनः ।
युगस्य पंचवर्षस्य कालज्ञानं प्रचक्षते ॥ ५॥

स्वराक्रमेते सोमार्कौ यदा साकं सवासवौ ।
स्यात्तदादियुगं माघस्तपः शुक्लोऽयनं ह्युदक् ॥ ६॥

प्रपद्यते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक् ।
सार्पार्धे दक्षिणार्कस्तु माघश्रावणयोः सदा ॥ ७॥

धर्मवृद्धिरपां प्रस्थः क्षपाह्रास उदग्गतौ ।
दक्षिणे तौ विपर्यासः षण्मुहूर्त्ययनेन तु ॥ ८॥

प्रथमं सप्तमं चाहुरयनाद्यं त्रयोदशम् ।
चतुर्थं दशमं चैव द्विर्युग्मं बहुलेप्यृतौ ॥ ९॥

वसुस्त्वष्टा भवोऽजश्च मित्रः सर्पोऽश्विनौ जलम् ।
धाता कश्चायनाद्याः स्युरर्धपंचमभस्त्वृतुः ॥ १०॥

एकान्तरेऽह्नि मासे च पूर्वान् कृत्वादिमुत्तरः ।
अर्धयोः पंचवर्षाणामृदु पंचदशाष्टमौ ॥ ११॥

द्युहेयं पर्व चेत्पादे पादस्त्रिंशत्तु सैकिका ।
भागात्मनापवृज्यांशान् निर्दिशेदधिको यदि ॥ १२॥

निरेकं द्वादशाभ्यस्तं द्विगुणं गतसंज्ञिकम् ।
षष्ट्या षष्ट्या युतं द्वाभ्यां पर्वणां राशिरुच्यते ॥ १३॥

स्युः पादोऽर्धंत्रिपाद्याया त्रिद्वयेकऽह्नः कृतस्थितिम् ।
साम्येन्दोस्तृणोऽन्ये तु पर्वकाः पंच सम्मिताः ॥ १४॥

भांशाः स्युरष्टकाः कार्याः पक्षद्वादशकोद्गताः ।
एकादशगुणश्चोनः शुक्लेऽर्धं चैन्दवा यदि ॥ १५॥

नवकैरुद्गतोंशः स्यादूनः सप्तगुणो भवेत् ।
आवापस्त्वयुजेऽर्धं स्यात्पौलस्ये।आस्तंगतेऽपरम् ॥ १६॥

जावाद्यंशैः समं विद्यात् पूर्वार्धे पर्व सूत्तरे ।
भादानं स्याच्चतुर्दश्यां काष्ठानां देविना कलाः ॥ १७॥

जौ द्रा गः खे श्वे ही रो षा श्चिन्मूषक्ण्यः सूमाधाणः ।
रे मृ घाः स्वापोजः कृष्यो ह ज्येष्ठा इत्यृक्षा लिंगैः ॥ १८॥

कार्या भांशाष्टकास्थाने कला एकान्नविंशतिः ।
उनस्थाने त्रिसप्तति मुद्ववपेदूनसम्भवे ॥ १९॥

तिथिमेकादशाभ्यस्तां पर्वभांशसमन्विताम् ।
विभज्य भसमूहेन तिथिनक्षत्रमादिशेत् ॥ २०॥

याः पर्वाभादानकलास्तासु सप्तगुणां तिथिम् ।
युक्त्या तासां विजानीयात् तिथिभादानिकाः कलाः ॥ २१॥

अतीतपर्वभागेभ्यः शोधयेद् द्विगुणां तिथिम् ।
तेषु मण्डलभागेषु तिथिनिष्ठांगतो रविः ॥ २२॥

विषुवन्तं द्विरभ्यस्तं रूपोनं षड्गुणीकृतम् ।
पक्षा यदर्धं पक्षाणां तिथिः स विषुवान् स्मृतः ॥ २३॥

पलानि पंचाशदपां धृतानि तदाढकं द्रोणमतः प्रमेयम् ।
त्रिभिर्विहीनं कुड्वैस्तु कार्यं तन्नाडिकायास्तु भवेत् प्रमाणम् ॥ २४॥

एकादशभिरभ्यस्य पर्वाणि नवभिस्तिथिम् ।
युगलब्धं सपर्व स्याद् वर्तमानार्कभं क्रमात् ॥ २५॥

सूर्यर्क्षभागान् नवभिर्विभज्य शेषान् द्विरभ्यस्य दिनोपभुक्तिः ।
तिथेर्युता भुक्तिदिनेषु कालो योगो दिनैकादशकेन् तद्भम् ॥ २६॥

त्र्यंशो भशेषो दिवसांशभागश्चतुर्दशस्याप्यपनीय भिन्नम् ।
भार्धेऽधिके चाधिगते परोंऽशोद्वावुत्तमे तन्नवकैरवेत्य ॥ २७॥

त्रिंशत्यह्नां सषट्षष्टिरब्दः षट् चर्तवोऽयने ।
मासा द्वादश सौर्याः स्युरेतत् पंचगुणं युगम् ॥ २८॥

उदयावासवस्य स्युर्दिनराशि सपंचकः ।
ऋषेर्द्विषष्टिहीनः स्याद् विंशत्या चैकयास्तृणाम् ॥ २९॥

पंचत्रिंशं शतं पौष्णम् एकोनमयनोन्यृषेः ।
पर्वणां स्याच्चतुष्पादी काष्ठानां चैव ताः कलाः ॥ ३०॥

सावनेन्दुस्तृमासानां षष्टिः सैकद्विसप्तिका ।
द्युस्त्रिंशत् सावनः सार्धः सौरस्तृणां स पर्ययः ॥ ३१॥

अग्निः प्रजापतिः सोमो रुद्रोदितिबृहस्पती ।
सर्पाश्च पितरश्चैव भगश्चैवार्यमापि च ॥ ३२॥

सविता त्वष्टाथ वायुश्चेन्द्राग्नी मित्र एव च ।
इन्द्रो निॠतिरापो वै विश्वेदेवास्तथैव च ॥ ३३॥

विष्णुर्वसवो वरुणूऽजेकपात् तथैव च ।
अहिर्बुध्न्यस्तथा पूषा अश्विनौ यम एव च ॥ ३४॥

नक्षत्रदेवता एता एताभिर्यज्ञकर्मणि ।
यजमानस्य शास्त्रज्ञैर्नाम नक्षत्रजं स्मृतम् ॥ ३५॥

उग्राण्यार्द्रा च चित्रा च विशाखा श्रवणोश्वयुक् ।
क्रूरणि तु मघास्वाती ज्येष्टा मूलं यमस्य च ॥ ३६॥

द्यूनं द्विषष्टिभागेन ज्ञे (हे) यं सौरं सपार्वणम् ।
यत्कृतावुपजायेते मध्येऽन्ते चाधिमासकौ ॥ ३७॥

कला दश सविंशा स्याद् द्वे मुहुर्तस्य नाडिके ।
द्युस्त्रिंशत् तत्कलानां तु षट्शती त्र्यधिका भवेत् ॥ ३८॥

ससप्तमं भयुक् सोमः सूर्यो द्यूनि त्रयोदश ।
नवमानि तु पंचाह्नः काष्ठा पंचाक्षरा भवेत् ॥ ३९॥

यदुत्तरस्यायनतो गतं स्याच् छेषं तथा दक्षिणतोऽयनस्य ।
तदेकषष्ट्याद्विगुणं विभक्तं सद्वादशं स्याद् दिवसप्रमाणम् ॥ ४०॥

यदर्धं दिनभागानां सदा पर्वणि पर्वणि ।
ॠतुशेषं तु तद् विद्यात् संख्याय सह सर्वणाम् ॥ ४१॥

इत्युपायसमुद्देशो भूयोप्यह्नः प्रकल्पयेत् ।
ज्ञेयराशिं गताभ्यस्तं विभजेज्ज्ञानराशिना ॥ ४२॥

इत्येतन्मासवर्षाणां मुहूर्तोदयपर्वणाम् ।
दिनर्त्वयनमासांगं व्याख्यानं लगधोऽब्रवीत् ॥ ००॥

सोमसूर्यस्तृचरितं विद्वान् वेदविदश्नुते ।
सोमसूर्यस्तृचरितं लोकं लोके च सम्मतिम् ॥ ४३॥

॥ इति याजुषज्योतिषं समाप्तम् ॥

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

॥ अथ साम्पुटिक श्रीसूक्त पाठ ॥

॥ अथ साम्पुटिक श्रीसूक्त पाठ ॥

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्ण रजतस्रजाम् | 
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभं ददासि |

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् |
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसीभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद प्रबोधिनीम् | 
श्रियं देवी मुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् |
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहो पह्वये श्रियम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियम लोके देवजुष्टामुदाराम् |
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आदित्यवर्णे तपसोधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोथबिल्वः |
तस्यफलानि तपसानुदन्तु मायान्त रायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह |
प्रादुर्भूतो सुराष्ट्रेस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु में ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् |
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद में गृहात् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करिषिणिम् |
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि |
पशूनां रूप मन्नस्य मयी श्रीः श्रयतां यशः ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ कर्दमेन प्रजा भूता मयी संभव कर्दम |
श्रियं वासय में कुले मातरं पद्ममालिनीम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् में गृहे |
नि च देविं मातरं श्रियं वासय में कुले ||

दरिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्दचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आर्द्रां यः करिणिं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् |
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आर्द्रां पुष्करिणिं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीम् |
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् |
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान विन्देयं पुरुषानहम् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहयादाज्यमन्वहम् |
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्री कामः सततं जपेत् ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ||

|| श्री महालक्ष्म्यार्पणं अस्तु ||

॥ उच्छिष्ट गणपति साधना ॥

 ॥ उच्छिष्ट गणपति साधना ॥
     उच्छिष्ट गणपति का प्रयोग अत्यंत सरल है तथा इसकी साधना में अशुचि-शुचि आदि बंधन नहीं हैं तथा मंत्र शीघ्रफल प्रद है । कलयुग में उच्छिष्ट गणपति साधना बहुत ही शीघ्र फलदाई होता है।यह अक्षय भण्डार का देवता है ।

 प्राचीन समय में यति जाति के साधक उच्छिष्ट गणपति या उच्छिष्ट चाण्डालिनी (मातङ्गी) की साधना व सिद्धि द्वारा थोड़े से भोजन प्रसाद से नगर व ग्राम का भण्डारा कर देते थे । इसकी साधना करते समय मुँह उच्छिष्ट होना चाहिये । मुँह में गुड़, पताशा, सुपारी, लौंग, इलायची ताम्बूल आदि कोई एक पदार्थ होना चाहिये । 

पृथक-पृथक कामना हेतु पृथक-पृथक पदार्थ है । 
यथा -लौंग, इलायची वशीकरण हेतु । 
सुपारी फल प्राप्ति व वशीकरण हेतु । 
गुडौदक – अन्नधनवृद्धि हेतु तथा 
सर्व सिद्धि हेतु ताम्बूल का प्रयोग करें । 

अगर साधक पर तामसी कृत्या प्रयोग किया हुआ है, तो उच्छिष्ट गणपति शत्रु की गन्दी क्रियाओं को नष्ट कर साधक की रक्षा करते हैं। 
॥ अथ नवाक्षर उच्छिष्टगणपति मंत्रः ॥ 
👉मंत्र – हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । 
 विनियोगः–ॐ अस्य श्रीउच्छिष्ट गणपति मन्त्रस्य कंकोल ऋषिः, विराट् छन्दः, उच्छिष्टगणपति देवता, सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । 

ऋष्यादिन्यासः –
ॐ अस्य श्रीउच्छिष्ट गणपति मंत्रस्य कंकोल ऋषिः नमः शिरसि, 
विराट् छन्दसे नमः मुखे, 
उच्छिष्ट गणपति देवता नमः हृदये, 
सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे । 

करन्यास 
ॐ हस्ति अंगुष्ठाभ्यां नमः । 
ॐ पिशाचि तर्जनीभ्यां नमः । 
ॐ लिखे मध्यमाभ्यां नमः । 
ॐ स्वाहा अनामिकाभ्यां नमः । 
ॐ हस्ति पिशाचिलिखे कनिष्ठिकाभ्यां नमः । 
ॐ हस्ति पिशाचिलिखे स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । 
हृदयादिन्यासः- 
ॐ हस्ति हृदयाय नमः । 
ॐ पिशाचि शिरसे स्वाहा । 
ॐ लिखे शिखायै वषट् । 
ॐ स्वाहा कवचाय हुम् । 
ॐ हस्ति पिशाचिलिखे नेत्रत्रयाय वौषट् । 
ॐ हस्ति पिशाचिलिखे स्वाहा अस्त्राय फट् स्वाहा । 

॥ ध्यानम् ॥ 
चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेत्रं पाशाङ्कुशौ मोदकपात्रदन्तौ। 
करैर्दधानं सरसीरुहस्थमुन्मत्त गणेश मीडे । (क्वचिद् पाशाङ्कुशौ कल्पलतां स्वदन्तं करैवहन्तं कनकाद्रि कान्ति) ॥ 

अथ दशाक्षर उच्छिष्ट गणेश मंत्र ॥
 मन्त्रः – १॰ गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।
 २॰ ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । 

अथ द्वादशाक्षर उच्छिष्ट गणेश मंत्र ॥ 
मन्त्रः – ॐ ह्रीं गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । ॥ 

अथ एकोनविंशत्यक्षर उच्छिष्टगणेश मंत्र ॥ 
मन्त्रः- ॐ नमो उच्छिष्ट गणेशाय हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । 

॥ अथ त्रिंशदक्षर उच्छिष्टगणेश मंत्र ॥
 मन्त्रः- ॐ नमो हस्तिमुखाय लंबोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा । 

विनियोगः- अस्योच्छिष्ट गणपति मंत्रस्य गणक ऋषिः, गायत्री छन्दः , उच्छिष्ट गणपतिर्देवता, ममाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । 

॥ अथ एक-त्रिंशदक्षर उच्छिष्टगणेश मंत्र ॥ 
मन्त्रः- ॐ नमो हस्तिमुखाय लंबोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा । ॥ 

अथ द्वात्रिंशदक्षर उच्छिष्टगणेश मंत्र ॥ 
मन्त्रः- ॐ हस्तिमुखाय लंबोदराय उच्छिष्ट महात्मने आं क्रों ह्रीं क्लीं ह्रीं हुं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा । 

॥ अथ सप्तत्रिंदक्षर उच्छिष्टमहागणपति मंत्रः ॥ 
मन्त्रः- ॐ नमो भगवते एकदंष्ट्राय हस्तिमुखाय लंबोदराय उच्छिष्ट महात्मने आँ क्रों ह्रीं गं घे घे स्वाहा। 
    विनियोग :- ॐ अस्य श्रीउच्छिष्ट महागणपति मंत्रस्य मतंग भगवान ऋषिः, गायत्री छन्दः, उच्छिष्ट महागणपति र्देवता, गं बीजम्, स्वाहा शक्तिः, ह्रीं कीलकं, ममाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । 

॥ ध्यानम् ॥ 
शरान्धनुः पाशसृणी स्वहस्तै र्दधानमारक्त सरोरुहस्थम्। 
विवस्त्र पत्न्यां सुरतप्रवृत्तमुच्छिष्टमम्बासुतमाश्रयेऽहम् ॥ 
बायें हाथों में धनुष एवं पाश दाहिने हाथों में शर एवं अङ्कुश धारण किये हुये लालकमल पर आसीन अपनी विवस्त्र पत्नियों से रति में निरत पार्वती पुत्र उच्छिष्ट महागणपति का मैं आश्रय लेता हुँ । 

॥अथ एकाधिक चत्वारिंशदक्षर उच्छिष्टमहागणपति मंत्रः॥ 
मन्त्रः- ॐ नमो भगवते एकदंष्ट्राय हस्तिमुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने आँ क्रों ह्रीं गं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा । 

॥ अथ उच्छिष्टगणपति यंत्रार्चनम् ॥ 
मंडल मध्य में गणपति की नौ पीठ शक्तियों का पूजन करें । 
पूर्वादिक्रमेण – 
ॐ तीव्रायै नमः। ॐ चालिन्यै नमः । ॐ नन्दायै नमः। 
ॐ भोगदायै नमः। ॐ कामरूपिण्यै नमः। ॐ उग्रायै नमः। 
ॐ तेजोवत्यै नमः। ॐ सत्यायै नमः। मध्ये- ॐ विघ्ननाशिन्यै नमः । 

   गणपति की मूर्ति को घृत से अभ्यजन करके दुग्ध धारा व जलधारा से अग्न्युत्तारण करके शुभ्र वस्त्र से पोंछन करके यंत्र के मध्य में रखें । देव की गंधार्चन से पूजा करके यंत्र के प्रत्येक आवरण की पूजा करें । यंत्रस्थ देवताओं की नामावलि के साथ “नमः श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि” कहते हुये अंगुष्ठ तर्जनी से गंधपुष्पाक्षत छोड़ें तथा अर्घपात्र के जल से तर्पण करे (स्वयं करे तो वाम हाथ से अनामिका व अंगुष्ठ के सहयोग से तर्पण करे) देव से आज्ञा ग्रहण करें । 

सचिन्मयः परोदेव परामृतरस प्रिय । अनुज्ञां देहि गणेश परिवारार्चनाय मे ॥

 प्रथमावरणम् :- 
षट्कोण मध्ये – 
अग्निकोणे – ॐ गं हस्ति हृदयाय नमः हृदय श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ १ ॥ 
नैर्ऋत्ये – ॐ गीं पिशाचि शिरसि स्वाहा, पिशाचि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ २ ॥ 
वायव्ये – ॐ गूं लिखे शिखायै वषट्, शिखा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ ३ ॥
 ऐशान्ये – ॐ गें स्वाहा कवचाय हुं कवच श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ ४ ॥ 
मध्याग्रे – ॐ गौं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा नेत्रत्रयाय वौषट्, नेत्रत्रयाय श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ ५ ॥ 
दिक्षु – ॐ गः हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । अस्त्राय फट् अस्त्र श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ ६ ॥ 

पुष्पाञ्जलि मादाय :- 
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥ पूजिता: तर्पिताः सन्तु कहकर विशेषार्घ से जल छोड़ें ।
 द्वितीयावरणम् :- अष्टदले पूर्वादि क्रमेण – 
ॐ ब्राह्मयै नमः, ब्राह्मी श्री पा० पू० त० नमः ॥ १ ॥ 
ॐ महेश्वर्यै नमः, माहेश्वरी श्री पा० ॥ २ ॥ 
ॐ कौमार्यै नमः, कौमारी श्री पा० पू० त० ॥ ३ ॥ 
ॐ वैष्णव्यै नमः, वैष्णवी श्री पा० ॥ ४ ॥ 
ॐ वाराह्यै नमः, वाराहीं श्री पा० ॥ ५ ॥ 
ॐ इन्द्राण्यै नमः, इन्द्राणी श्री पा० ॥ ६ ॥ 
ॐ चामुण्डायै नमः, चामुण्डा श्री पा० ॥ ७ ॥ 
ॐ महालक्ष्म्यै नमः, महालक्ष्मी श्री पा० पू० त०॥८॥ 

पुष्पाञ्जलि – 
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । 
भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम् ॥ 
पूजिता तर्पिताः सन्तु से जल छोडें । 

तृतीयावरणम् :- 
अष्टदल के बाहर कर्णिका समीपे – भूपूर मध्ये । दशो दिशाओं में – 
पूर्वे – ॐ वक्रतुण्डाय नमः, वक्रतुण्ड श्री० पा० त० नमः ॥ १ ॥ 
आग्नेये – ॐ एकदंष्ट्राय नमः श्री० पा० ॥ २ ॥ 
दक्षिणे – लंबोदराय नमः श्री० पा० ॥ ३ ॥ 
नैर्ऋत्ये – ॐ विकटाय नमः श्री पा० ॥ ४ ॥ 
पश्चिमे – ॐ धूम्रवर्णाय नमः श्री० पा० ॥ ५ ॥ 
वायव्ये – ॐ विघ्नराजाय नमः श्री० पा० ॥ ६ ॥ 
उत्तरे – ॐ गजाननाय नमः श्री० पा० ॥ ७ ॥ 
ऐशान्ये – ॐ विनायकाय नमः श्री० पा० ॥ ८ ॥ प्राच्येशानयोर्मध्ये–ॐ गणपतये नमः श्री० पा०॥९॥ पश्चिमनिर्ऋतियोर्मध्ये – ॐ हस्तिदंताय नमः, हस्तिदंत श्री० पा० त० नमः ॥ १० ॥ 

पुष्पाञ्जलि – 
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । 
भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥ 
पूजिता: तर्पिताः सन्तु से जल छोड़ें । 

चतुर्थावरणम् :- भुपूरे दशदिक्षु – 
पूर्वे – ॐ इन्द्राय नमः, इन्द्र श्री पा० पू० त० नमः ॥ १ ॥ 
ॐ अग्नये नमः श्री पा० ॥ २ ॥ 
ॐ यमाय नमः श्री पा० ॥ ३ ॥ 
ॐ निर्ऋतये नमः श्री पा० ॥ ४ ॥ 
ॐ वरुणाय नमः श्री पा० ॥ ४ ॥ 
ॐ वायवे नमः श्री पा० ॥ ५ ॥ 
ॐ कुबेराय नमः श्री पा० ॥ ६ ॥ 
ऐशान्ये – ॐ ईशानाय नम० श्री पा० ॥ ७ ॥ इन्द्रेईशानयोर्मध्ये–ॐ ब्रह्मणे नमः ब्रह्मा श्री पा०॥८॥ 
वरुणनैर्ऋतर्योर्मध्ये – ॐ अनंताय नमः अनन्त श्री पा० पू० त० ॥ ९ ॥ 

पुष्पाञ्जलि –
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । 
भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ॥ 
पूजिताः तर्पिताः सन्तु से जल छोड़ें । 

पंचमावरणम् – भुपूरे इन्द्रादि लोकपाल समीपे – 
ॐ वं वज्राय नमः श्री पा० ॥ १ ॥ 
ॐ शं शक्त्यै नमः श्री० पा० ॥ २ ॥ 
ॐ दं दण्डाय नमः श्री पा० ॥ ३ ॥ 
ॐ खं खड्गाय नमः श्री० पा० ॥ ४ ॥ 
ॐ पां पाशाय नमः श्री० पा० ॥ ५ ॥ 
ॐ अं अंकुशाय नमः श्री० पा० ॥ ६ ॥ 
ॐ गं गदायै नमः श्री० पा० ॥ ७ ॥ 
ॐ त्रिं त्रिशूलाय नमः श्री पा० ॥ ८ ॥ 
ॐ पं पद्माय नमः श्री पा० ॥ ९ ॥ 
ॐ चं चक्राय नमः, चक्र श्री पा० पू० त० नमः॥१०॥ 
पुष्पाञ्जलि – 
ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । 
भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ॥ 
‘पूजिता: तर्पिता: सन्तु’ से जल छोडें । 

॥ पुरश्चरण विधिः ॥ 
वीरभद्र, उड्डीश तंत्र, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि के अनुसार रक्तचंदन (कपि) अथवा श्वेताद्रर्क (श्वेतआक) की प्रतिमा अपने अंगुष्ठ परिमाण की पुष्य नक्षत्र में बनायें । 

अन्य ग्रन्थों में प्रतिमा को हाथी के ऊपर बैठकर बनाने को कहा है । अभाव में पत्थर या मिट्टी से बने हाथी पर बैठकर बनायें । यह भी नहीं हो सके तो हाथी के चित्रासन पर बैठकर बनाये । 

मूर्ति को गल्ले में रखने से धन वृद्धि होती है । शत्रुनाश के लिये निम्बकाष्ठ की प्रतिमा बनाये अथवा लवण की प्रतिमा बनायें । गुड़ से निर्मित प्रतिमा सौभाग्य को देने वाली तथा बाँबी की मिट्टी से बनी प्रतिमा अभीष्ट की सिद्धि करती है । 
साधक एकलक्ष जप संख्या पूरी करके हवनादि कर्म करें । कृष्णपक्ष की चतुर्दशी से शुक्लपक्ष की चतुर्दशी पर्यन्त गुड़ तथा पायसान्न निवेदित करें । 
कृष्णपक्ष की अष्टमी से चतुर्दशी पर्यन्त नित्य साढ़े आठ हजार जप करे ८५० आहुतियाँ देकर तर्पणादि करें । इससे अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त करें । 

कुबेर ने इस मंत्र के प्रभाव से नौ निधियों को प्राप्त किया तथा सुग्रीव एवं विभीषण ने भी गणपति के वर से राज्य को प्राप्त किया । मधुमिश्रित लाजा होम करने से संसार को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त होवे, कन्या यदि करे तो शीघ्र वर को प्राप्त करें । 

भोजन से पूर्व गणपति के निमित्त ग्रासान्न निकाल देवे तथा भोजन करते समय भी जप करने से मंत्र सिद्ध होता है । 
शय्या पर सोये हुये उच्छिष्टावस्था में जप करने से शत्रु भी वश में हो जाता है । 
कटु-तैल से मिश्रित राजीपुष्पों के हवन से शत्रुओं में विद्वेषण पैदा होवे । वाद विवाद में यह मंत्र विजय प्रदान करता है । 

नदी के जल से २७ बार अभिमंत्रित कर मुँह धोये तो वाक् सिद्धि होवें । 
साधक लाल वस्त्र पहन कर लाल चंदन लगाकर ताम्बूल खाते हुये या नैवेद्य के मोदकादि को खाते हुये रक्तचंदन की माला पर जप करे, 
👉विशेष:--तुलसी की माला ग्रहण नहीं करें । 

पूजित मूर्ति को मद्यपात्र में रखकर एक हाथ नीचे भूमि में गाड़ें और उस पर बैठकर अहर्निश जप करे तो एक सप्ताह के अन्दर सभी उपद्रव शांत होकर धन वैभव की प्राप्ति होवे । यह तामस प्रयोग है अत: नियम व्रत व सावधानी से करना चाहिये । 

बलि विधानम् :– 
बलि मंत्रः- गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्ट गणेशाय महायक्षायायं बलिः।
मधु, मांस माषान्न, पायसान्न अथवा फलादि से बलि प्रदान करें। 

शुक्र_का_छिपा_हुआ_महल" एक अनसुनी रहस्यमयी कथा

#शुक्र_का_छिपा_हुआ_महल" – एक अनसुनी रहस्यमयी कथा 🌟


  हिमालय की सबसे ऊँची चोटी के पीछे एक ऐसा घना वन था, जहाँ सूर्य की किरणें भी झिझककर प्रवेश करती थीं। इस वन के सबसे गहन हिस्से में एक प्राचीन, चमकदार महल खड़ा था – जिसका नाम था "#शुक्र_विलास"। इस महल का द्वार केवल तभी खुलता था, जब आकाश में शुक्र ग्रह पूर्ण शक्ति के साथ उदित होता और पृथ्वी पर किसी योग्य आत्मा की #कुंडली_में_शुक्र_राजयोग जागृत होने वाला होता।

इस महल का रक्षक था एक रहस्यमयी योद्धा – "#विलासिनी" नाम की एक दिव्य स्त्री, जो कभी देवताओं की सेवा में थी, कभी दैत्यों की गुरु बनी। वह कहती थी – "शुक्र राजयोग वह नहीं जो किताबों में लिखा है, बल्कि वह #आंतरिक_प्रकाश है जो व्यक्ति को राजा बना देता है, परंतु यदि इसे गलत समझा जाए तो राजा से रंक भी बना देता है।"

एक रात, एक युवक अमर नाम का, जो जीवन में हर सुख से वंचित था, इस वन में भटक गया। उसकी #कुण्डली_में_शुक्र केंद्र में विराजमान था, परंतु नीच राशि में और पाप ग्रहों से दृष्ट। विलासिनी ने उसे देखते ही कहा – "तुम्हारे भीतर शुक्र राजयोग सो रहा है। पहचानो इसे, जगाओ इसे, अन्यथा यह सोया हुआ राजा तुम्हें कभी राज नहीं देगा।"

★★★ #शुक्र_राजयोग_की_पहचान – विलासिनी का पहला रहस्य ★★★

विलासिनी ने अमर को एक दर्पण दिखाया और कहा – "देखो, कुंडली में #शुक्र जब केंद्र (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण (1, 5, 9) में हो, विशेषकर अपनी उच्च राशि मीन, स्वराशि #वृषभ_तुला में, या बृहस्पति, बुध, चंद्र जैसे शुभ ग्रहों के साथ युति/दृष्टि बनाए, तो वहाँ शुक्र राजयोग जन्म लेता है।"

वह आगे बोली – "सबसे गुप्त संकेत यह है – यदि शुक्र 12वें घर में हो (मोक्ष भाव में) और लग्नेश से संबंध बनाए, तो जातक को #राजसी_वैभव मिलता है, परंतु संसार से दूर। यदि शुक्र 4-7-10 में हो और 9वें से संबंध, तो वह व्यक्ति समाज का राजा बनता है। यदि शुक्र नीच का होकर भी उच्च का फल दे (#नीचभंग_राजयोग), तो वह सबसे बड़ा आश्चर्य होता है – गरीबी से राजपाट तक का सफर।"

लाभ – अमर ने पूछा, "इससे क्या मिलता है?" विलासिनी मुस्कुराई – "अनंत सौंदर्य, आकर्षण, धन-वैभव, वैवाहिक सुख, कला में निपुणता, विलासिता, रत्न-जड़ित जीवन, स्त्री-सुख, ऐश्वर्य, और सबसे बड़ा – आत्मिक शांति के साथ #भौतिक_राज।"

#हानि – फिर गंभीर होकर बोली – "यदि यह योग पाप ग्रहों से दूषित हो, तो अति भोग से रोग, व्यभिचार, धन का नाश, वैवाहिक कलह, त्वचा-रोग, गुप्त रोग, और सबसे बड़ा – आंतरिक खालीपन। यह योग सोने की जंजीर बन जाता है – बाँधता है, आजाद नहीं करता।"

★★★ #शुक्र_राजयोग_कैसे_कार्य_करता_है – दूसरा रहस्य ★★★

"यह योग चुपचाप कार्य करता है," विलासिनी ने कहा। "जैसे चंद्रमा रात में चुपके से खिलता है। #शुक्र की शक्ति 25-28 वर्ष की आयु में जागृत होती है। यह धीरे-धीरे आकर्षण बढ़ाता है, लोग स्वतः तुम्हारे पास आते हैं, धन के नए मार्ग खुलते हैं, कला-संस्कृति में सफलता मिलती है। परंतु यदि इसे जगाया न जाए, तो यह नींद में ही रह जाता है।"

★★★ अब #गुप्त_उपाय – जो आज तक किसी ने नहीं जाना ★★★

विलासिनी ने अमर को एक प्राचीन पांडुलिपि दिखाई और कहा – "ये उपाय मैं तुम्हें इसलिए दे रही हूँ क्योंकि तुम योग्य हो। ये गुप्त हैं, शास्त्रों में भी स्पष्ट नहीं लिखे, परंतु खगोलीय गणना से सिद्ध।"

सरल घरेलू उपाय (प्रारंभिक जागरण) हर शुक्रवार सूर्यास्त के ठीक 48 मिनट बाद (शुक्र उदय का समय) दर्पण के सामने सफेद चावल की खीर बनाकर उसमें 11 इलायची डालो। फिर "ॐ शुं शुक्राय नमः" 21 बार बोलकर खीर किसी कन्या को खिलाओ। यह शुक्र की आंतरिक ऊर्जा को जागृत करता है।

वैदिक ज्योतिषीय + रत्न उपाय (मजबूत आधार) शुक्र के नक्षत्र (भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा) में हीरा (कम से कम 0.5 कैरेट, 6 धातुओं में) धारण करो। परंतु गुप्त विधि – धारण से पहले हीरे को 108 बार "ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः" से अभिमंत्रित करो, और शुक्र की होरा में।

वनस्पति का गुप्त उपाय (प्रकृति का रहस्य) गूलर (Ficus racemosa) की जड़ को शुक्रवार को खोदकर निकालो (शुक्र की दशा में), उसे चांदी के ताबीज में बंद करो। गूलर शुक्र की ऊर्जा को स्थिर करता है, क्योंकि इसकी जड़ें भूमि के गर्भ में गहराई तक जाती हैं – ठीक वैसे ही जैसे शुक्र जीवन के गहरे सुख देता है। इसे गले में धारण करने से 43 दिनों में आकर्षण दोगुना हो जाता है।

तांत्रिक गुप्त विधि (सबसे शक्तिशाली) एक सफेद कपड़े पर शुक्र यंत्र बनाओ। बीच में "ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः" लिखो। फिर शुक्र की रात्रि (शुक्रवार की रात) में 1008 बार इस मंत्र का जाप करो, बीच-बीच में सफेद पुष्प चढ़ाओ। यह यंत्र को जीवन भर घर के पूजा स्थल में रखो। यह उपाय 1000 वर्ष पुरानी गुप्त परंपरा से लिया गया है।

हवन का अनोखा तरीका शुक्र की 20° डिग्री पर जब कोई शुभ ग्रह हो (जैसे बृहस्पति), तब 11 किलो घी, सफेद चंदन, कपूर, इलायची, केसर से हवन करो। आहुति के साथ "ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं..." (वैदिक मंत्र) बोलो। यह हवन केवल एक बार, परंतु जीवन भर शुक्र को राजसी बनाए रखता है।

★★★ वैज्ञानिक विश्लेषण – कैसे ये कार्य करते हैं ★★★

ये उपाय केवल अंधविश्वास नहीं। शुक्र ग्रह पृथ्वी का सबसे निकटतम ग्रह है, और इसका प्रकाश (सबसे चमकीला) मानव मस्तिष्क की तरंगों पर प्रभाव डालता है – विशेषकर सौंदर्य और आकर्षण केंद्रों पर। सफेद वस्तुओं का दान और इलायची का उपयोग सेरोटोनिन बढ़ाता है, जो खुशी और आकर्षण का हार्मोन है।

हीरा (कार्बन का क्रिस्टल) उच्च कंपन वाली ऊर्जा रखता है – यह शरीर की विद्युत तरंगों को संतुलित करता है, जिससे आकर्षण बढ़ता है। गूलर की जड़ में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो त्वचा और प्रजनन स्वास्थ्य को मजबूत करते हैं – शुक्र के कारक क्षेत्र।

मंत्र जाप (108 बार) मस्तिष्क की थेटा तरंगों को सक्रिय करता है – वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि यह तनाव कम करता है और आकर्षण बढ़ाता है। हवन से निकलने वाला धुआँ (घी+चंदन) नकारात्मक आयनों को हटाता है, वातावरण को शुद्ध करता है – जिससे शुक्र की ऊर्जा बिना बाधा के कार्य करती है।

अमर ने ये उपाय किए। कुछ वर्षों बाद वह वन से लौटा – अब एक राजा की तरह जी रहा था, न कि धन से, बल्कि आंतरिक वैभव से।

याद रखो – शुक्र राजयोग को जगाना तुम्हारे हाथ में है। इसे जगाओ, परंतु संयम से – अन्यथा महल का द्वार हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
ॐ शुं शुक्राय नमः 🌙✨

बुधवार, 14 जनवरी 2026

रावण की बेटी सुवर्णमत्स्या

रावण की बेटी सुवर्णमत्स्या
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 रावण की बेटी का उल्‍लेख थाईलैंड की रामकियेन रामायण और कंबोडिया की रामकेर रामायण में किया गया है, जबकि वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास के रामचरित मानस में इसका उल्लेख नहीं किया गया है।

रामकियेन और रामकेर रामायण के मुताबिक, रावण के तीन पत्नियों से 7 बेटे थे। इनमें पहली पत्‍नी मंदोदरी से दो बेटे मेघनाद और अक्षय कुमार थे। वहीं, दूसरी पत्‍नी धन्यमालिनी से अतिकाय और त्रिशिरा नाम के दो बेटे थे। तीसरी पत्‍नी से प्रहस्थ, नरांतक और देवांतक नाम के तीन बेटे थे। दोनों रामायण में बताया गया है कि सात बेटों के अलावा रावण की एक बेटी भी थी, जिसका नाम सुवर्णमछा या सुवर्णमत्‍स्‍य था। कहा जाता है कि सुवर्णमत्‍स्‍य देखने में बहुत सुंदर थी। उसे स्‍वर्ण जलपरी भी कहा जाता है। एक अन्‍य रामायण ‘अद्भुत रामायण’ में राम जी की पत्‍नी सीता जी को भी रावण की बेटी बताया गया है। 
       दशानन रावण की बेटी सुवर्णमत्‍स्‍य का शरीर सोने की तरह दमकता था। इसीलिए उसको सुवर्णमछा भी कहा जाता था। इसका शाब्दिक अर्थ होता है, सोने की मछली। इसीलिए थाईलैंड और कंबोडिया में सुनहरी मछली को ठीक उसी तरह से पूजा जाता है, जैसे चीन में ड्रैगन की पूजा होती है
     राम जी ने लंका पर विजय अभियान के दौरान समुद्र पार करने के लिए नल और नील को सेतु बनाने का काम सौंपा। राम जी के आदेश पर जब नल और नील लंका तक समुद्र पर सेतु बना रहे थे, तब रावण ने अपनी बेटी सुवर्णमत्‍स्‍य को ही ये योजना नाकाम करने का काम सौंपा था। पिता की आज्ञा पाकर सुवर्णमछा ने वानरसेना की ओर से समुद्र में फेंके जाने वाले पत्‍थरों और चट्टानों को गायब करना शुरू कर दिया। उसने इस काम के लिए समुद्र में रहने वाले अपने पूरे दल की मदद ली।

रामकियेन और रामकेर रामायण में लिखा गया है कि जब वानरसेना की ओर से डाले जाने वाले पत्‍थर गायब होने लगे तो हनुमानजी ने समुद्र में उतरकर देखा कि आखिर ये चट्टानें जा कहां रही हैं? उन्‍होंने देखा कि पानी के अंदर रहने वाले लोग पत्‍थर और चट्टानें उठाकर कहीं ले जा रहे हैं। उन्‍होंने उनका पीछा किया तो देखा कि एक मत्‍स्‍य कन्‍या उनको इस कार्य के लिए निर्देश दे रही है। कथा में कहा गया है कि सुवर्णमछा ने जैसे ही हनुमानजी को देखा, उनसे प्रेम हो गया। हनुमानजी उसके मन की स्थिति भांप लेते हैं और समुद्रतल पर ले जाकर पूछते हैं कि आप कौन हैं देवी ? वह बताती हैं कि मैं रावण की बेटी हूं। फिर हनुमान जी उसे समझाते हैं कि रावण क्‍या गलत कार्य कर रहा है। हनुमानजी के समझाने पर सुवर्णमछा सभी चट्टानें लौटा देती हैं, तब रामसेतु के निर्माण का कार्य पूरा हो पाता है। थाई रामायण रामकियेन के अनुसार महाबली हनुमान जी के आशीर्वाद से स्वर्णमछा को एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई थी जिसका नाम मैकचनू (मछानु) था। 

धन्यवाद।🙏

सोमवार, 12 जनवरी 2026

नक्षत्र माला

✓•अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है।

✓•सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं है। फिर अभिजित् का किया क्या जाय ? इसे मूहूर्त की संज्ञा देना अधिक उपयुक्त है। इसे जाति परिवर्तन वा धर्मान्तरण माना जाय। यह नक्षत्र मूहूर्त का आवरण डाल कर अहोरात्र में एक बार आता है। दिन के मध्यभाग मे इसकी उपस्थिति होती है। यह मुहूर्त रूप से मध्याह में १ घटी पर्यन्त रहता है। इस अभिजित मुहूर्त में पुरुषोत्तम राम का जन्म हुआ है। अभिजित् मुहूर्त जातक का फल ऐसा कहा गया है ...

"अतिसुललित कान्तिः सम्मतः सज्जनानां
 ननु भवति विनीतश्चारुकीर्तिः सुरूपः ।
 द्विजवरसुरभक्तिर्व्यक्तवाद मानवः स्याद् अभिजिति यदि सूतिर्भूपतिः स स्ववंशे ॥" 
                 (दुण्डिराज )

✓•जिसका जन्म अभिजित मुहूर्त में होता है, वह अत्यन्त शोभायमान कान्ति से युक्त तथा सत्पुरुषों द्वारा सम्मानित होता है। वह जातक निश्चय ही विनयी, सुन्दर कीर्तिमान, तथा सुरुपवान् होता है। वह द्विजश्रेष्ठ (ब्राह्मण) एवं देवता में भक्ति रखता है, प्रशस्त वक्ता होता है। वह अपने वंश में प्रमुख होता है।

 ✓•दिन के मध्य में सूर्य दिग्बली होता है। सूर्य के बलवान् होने से जातक राजा वा राजतुल्य शासक/प्रशासक होता है। मेरा जन्म ज्येष्ठकृष्ण दशमी के दिन ठीक मध्याह्न काल (अभिजित मुहूर्त) में हुआ है। सूर्य के उच्चच्युत (वृष में प्रवेश) होने से इस मुहूर्त के सम्पूर्ण फल में हास स्पष्ट है। मध्याह्न जातक जातकों को मैंने शासन प्रशासन में प्रविष्ट होते हुए देखा है। 

✓•२७ नक्षत्रों की सरणी में सब लोग वह रहे हैं। मैं इस में स्नान कर रहा हूँ। इसमें १०८ घाट हैं। हर घाट अनोखा है। इन घाटों की सुषमा किश्चित कथ्य है। श्री १०८ को मेरा प्रणाम ।

✓•१. अश्विनीनक्षत्र...
 इसमें ३ तारे हैं। घोड़ा के मुख सदृश इस का आकार है। आश्विन मास की पूर्णिमा के आस पास चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है। यह लघु वा क्षित्र संज्ञक नक्षत्र है। अश्विनीकुमार इसके देवता हैं। मेष राशि के १३° अंश २०' कला तक इसका क्षेत्र है। शीर्ष एवं प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध पर इसका नियन्त्रण है। चिन्तन प्रक्रिया पर इसका विशेष प्रभाव होता है। आवेश में आना ऊहापोह, कल्पनाशीलता, तन्द्रा, तनाव, आत्मविस्मृति, अपस्मार, उपता, अनिद्रा, आसक्ति, अन्यमनस्कता, ऐंठन, अंगघात, लकवा, सिरपीड़ा का विचार इस नक्षत्र से किया जाता है। 

इस नक्षत्र का स्वामी केतु है तथा यह नक्षत्र जिस राशि में पड़ता है, उसका स्वामी मंगल है। अतः अश्विनी नक्षत्र जात व्यक्ति के स्वभाव में केतु एवं मंगल की भूमिका का वर्चस्व होता है। इस नक्षत्र में सूर्य उच्च का तथा शनि नीच का होता है। सूर्य इस नक्षत्र पर प्रतिवर्ष वैशाख के प्रारंभ में लगभग १३.१/४ दिन के लिये आता है, जब कि चन्द्रमा प्रति सत्ताइसवें दिन इस नक्षत्र का भोग करता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक विचारशील, अध्ययन शील, झगड़ालू, ज्योतिष वैद्यक में रुचि रखने वाले, भ्रमणप्रिय, चंचलस्वभाव, अर्शरोगी, बुद्धिमान, तथा महाकांक्षी होते हैं।

✓•२. भरणी नक्षत्र...
 इसमें छोटे-छोटे तारों से छोटा सा रिकोग बनता है। यह अश्विनी के आगे पूर्व की ओर है। ३ इसे योन्याकार बताया गया है। यह मेष राशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' तक फैला हुआ है। इस का स्वामी शुक्र है। प्रमस्तिष्कीय मध्य भाग तथा सिर इसका प्रभाव क्षेत्र है। भरणीजात व्यक्ति का मस्तिष्क शुक्र और मंगल के प्रभाव से युक्त होता है। मंगल तम्बाकू का कारक है तथा शुक्र मदिरा एवं रसीले पदार्थों का कारक है। अतः ऐसा जातक धूम्रपान, मदपान करता है, रसीले पदार्थों में रुचि रखता है। सुखानुभूति की विशेष चाह, रसिक स्वभाव, मांसाहारी होने पर अत्यधिक क्रूरता एवं आक्रामकता, नीच संगता, साहस, उद्देश्य प्राप्ति मे सफल, चातुर्य, सच्चाई, प्रासाद एवं रोग मुक्तता ऐसे जातक में सामान्यतः देखी जाती है।

 इस नक्षत्र के दूषित होने पर, सिर के अग्रभाग में चोट रति रोग से अस्वस्थता, हड़बड़ी, सिर का नजला, कफ, जुकाम चक्षुपीडा, धमनीविकार, व्यसन चटोरेपन की प्रवृत्ति जातक में पायी जाती है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक बलवान् विरोधियों को नीचा दिखाने वाले, धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाले, धोखा देने वाले, निम्न स्तर के कार्यों में लगे रहने वाले, कलात्मक अभिरुचियों वाले, यात्री एवं चर प्रकृति के होते हैं।

✓•३. कृत्तिका नक्षत्र...
यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है। कार्तिक के महीने में रात्र्यारंभ में यह पूर्व दिशा में दिखाई पड़ता है। इसमें ६ तारे माने गये हैं। इसकी आकृति क्षुर सदृश कही गई है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर होता है। इस नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। इसका प्रथम चरण मेष राशि के २६° ४०' से लेकर ३०° तक है। अन्य तीन चरण वृष राशि के १०° तक फैले हैं। इसके दूसरे चरण में चन्द्रमा उच्च का होता है।

 सिर का अगला भाग, मस्तिष्क दृष्टि भाग, ललाट पर इसके प्रथम चरण का तथा मुख, कण्ठ, निम्नहनु,कपोल पर इसके अन्य तीन चरणों का प्रभाव रहता है। यह नक्षत्र मेष एवं वृष राशियों का योजक है। पहले चरण पर सूर्य एवं मंगल का प्रभाव तथा शेष तीन चरणों पर सूर्य एवं शुक्र का प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र पर दूषित प्रभाव होने से तीव्र ज्वर, मस्तिष्क ज्वर, चेचक, झाई, मुहासा, दृष्टिदोष, कण्ठावरोध, कण्ठ प्रदाह, विस्मृति, चेहरे पर धब्बा मस्सा होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक हृष्टपुष्ट, युयुत्सु, श्रेष्ठ, प्रधान, तार्किक, विषयाकांक्षी, आसक्त, तीव्र, प्रसिद्ध, मैत्रीपरायण, सहृदयपूर्ण व्यवहार करने वाले, शांति के इच्छुक, द्यूतप्रिय, धनीएवं सामाजिक क्रिया कलापों में भाग लेने वाले होते हैं।

✓•४. रोहिणी नक्षत्र...
इसमें ५ तारे माने जाते हैं। यह गाड़ी के सदृश होता है। कृत्तिका के कुछ दक्षिण में इस की स्थिति देखी जाती है। कहा जाता है जब शनि और मंगल रोहिणी के तारों के बीच से हो कर जाते हैं, (शकट भेदन) तो प्रलय होता है। केवल चन्द्रमा को इसका भेदन करते हुए देखा जाता है। इसी कारण चन्द्रमा को रोहिणी पति कहते हैं। यह नक्षत्र वृष राशि के १०° से लेकर २३° २०' रहता है। इसलिये रोहिणी जात जातक पर चन्द्र एवं शुक्र का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है। ऐसे जातक सौम्य प्रकृति, सुहासप्रिय, सौन्दर्य प्रेमी, संगीत में रुचि रखने वाले, ललित कला, सरस साहित्य, नाट्य शास्त्र, यात्रा एवं उत्सव प्रिय होते हैं। मातृस्नेह प्राप्त करने वाले, विपरीतयोनि के साथ सतत जीवन जीने वाले मृदु हृदय, मधुर भाषी, प्रियदर्शी, परोपकारी, शुद्धात्मा तथा स्थिर विचारों के होते हैं।

 इस नक्षत्र के दूषित होने पर कण्ठ स्वर विकृत होता है, छाती में पीड़ा होती है, हृदय को ठेस पहुंचती है। तालु, ग्रीवा, जिह्वा, मुंह, शीर्ष प्रभाग, अनुमस्तिष्क पर इसका विशेष प्रभाव होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक स्वच्छताप्रिय, असत्यवादी, चापलूस, संगीतज्ञ, समाजसेवी, यात्री प्रसन्नचित, अन्धविश्वासी, सत्यनिष्ठ तथा आस्तिक होते हैं।

✓•५. मृगशिरा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग वृष राशि में तथा शेष आधा भाग मिथुन में होता है। वृष के २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा मिथुन राशि के ६° ४०' तक उत्तरार्धभाग का विस्तार है। मृगशिरा के उत्तरार्ध भाग में पैदा होने वाले मंगल और बुध के संयुक्त प्रभाव में होते हैं। इसके पूर्वार्ध में जो जातक पैदा होते हैं, उन पर मंगल और शुक्र का सम्मिलित प्रभाव होता है। मृगशिरा का स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के प्रभाव में सम्पूर्ण वाक् तन्त्र होता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर पर स्त्रियों को अनियमित मासिक सूजन, मूत्रकृच्छ्र, रतिपीड़ा, नाक से रक्त स्राव, दन्त शूल, प्रीवास्थिका विच्छेद, कन्धे में/ के आस पास पीड़ा, बाहु पीड़ा होती है। 

इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले अधिकांश जातक धनवान् अनैतिक कार्यों से धनार्जन करने वाले, अविश्वासी, उन्नतिगामी, कार्यनिपुण, झूठे, आडम्बरी, पाखण्डी, प्रतिभाशाली तथा धर्म में पाखण्डी होते हैं। इसके उत्तरार्ध में उत्पन्न जातक साहसी उत्साही, विनोदी, उर्वर मस्तिष्क, वाक् पद्, सततसावधान एवं चुम्बकीय व्यक्तित्व से सम्पन्न होते हैं। शीघ्र उत्तेजित होना, तुरन्त प्रत्युत्तर देना, वासनोन्मुख, स्वार्थपरता, उद्यमता, अस्थैर्य इनके स्वभाव का अंग होता है।

✓•६. आर्द्रा नक्षत्र...
यह राहु का नक्षत्र है। मिथुन राशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक इसका विस्तार है। स्कन्ध, बाहु एवं हाथ पर इसका प्रभाव रहता है। श्वासनली, प्रसिका तथा कर्णेनली पर इसका नियन्त्रण हैं। यह नक्षत्र दूषित होने पर सूखी खाँसी, गले का सूखना, कान का जाम हो जाना, स्वर भंग, श्वसन क्रिया में पीड़ा करता है।

इस नक्षत्र में उत्पन्न हुआ जातक प्रखर प्रतिभावान् पूर्वानुमान में दक्ष, पूर्वाभासयुक्त, निष्पकट, किन्तु आलोचक, सच्चरित्र, शोधपरक मस्तिष्क से सम्पन्न होता है। इन्द्रजालिक एवं तात्रिक योग्यताओं का धनी होता है। निन्दित कार्य करने वाला कृतघ्न, विश्वासघाती, अभिचारकर्मक तथा मध्यवय में अत्यन्त कष्ट पाने वाला जातक इस नक्षत्र की देन है। यह नक्षत्र सन्तानोत्पादन मे निर्बल होता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक अल्पवीर्य एवं स्खलनरोगी होते हैं तथा गणित सांख्यिकी वाणिज्य में विशेषयोग्यता रखते हैं। बुध की राशि एवं राहु के इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोग अधिकतर मधुर वाक् तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं, वैद्य एवं मंत्रज्ञ होते हैं, मदसेवन करते हैं, घमण्डी, दम्भी एवं यायावर होते हैं, आडम्बर पूर्ण 'जीवन व्यतीत करते हैं।

✓•७. पुनर्व नक्षत्र...
यह गुरु का नक्षत्र है। इसके तीन पाद मिथुन राशि में अंतिम चौथा पाद कर्क राशि में होता है। यह मिथुन में २०° से लेकर ३०° तथा कर्क में ३° २०' तक फैला हुआ है। कन्धे और गले से लेकर फेफड़े, अन्तः श्वासनली, प्रास-नली, छाती का ऊपरी भाग, स्तनाम पर्यन्त इसका प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गलगण्ड, श्वासनलीशोथ, कान की सूजन, रक्तविकार यक्ष्मा, शीतज्वर न्यूमोनिया छाती में जलन तथा हृदय प्रदाह होता है।

 नक्षत्र स्वामी गुरु तथा राशि स्वामी बुध के प्रभाव से अधिकांश जातक विचार पूर्वक कार्य करने वाले मेधावी प्रज्ञावान् होते हैं। विस्तृत दृष्टिकोण तीव्रबुद्धि, अच्छी स्मरणशक्ति, पूर्वानुमान में कुशल, व्यावहारिक कार्य क्षमता से युक्त शुद्ध सत्यवादी उच्चविचारों वाले धार्मिक कार्यकता, दिव्यज्ञान सम्पन्न, धनी, आत्मकेन्द्रित होना इसके लिये सहज है।

 चन्द्रमा की राशि तथा गुरु के नक्षत्र पुनर्वसु में पैदा होने वाले जातक महत्वपूर्व जीवन जीने वाले, आचारविचार का ध्यान रखने वाले, सुन्दर कल्पनाशक्ति से युक्त, विश्वसनीय, क्षमाशील, सौन्दर्योपासक, प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत करने वाले, दानी, न्यायप्रिय, दयालु, धनाढ्य, शिक्षक, राजनेता, कवि एवं तीर्थयात्री होते हैं।

✓•८. पुष्य नक्षत्र...
इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह कर्क राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। पौषमास में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर आता है। पूरा वक्षस्थल, हृदय, फुफ्फुस, यकृत, अग्न्याशय इस के प्रभाव में रहता है। इसके दूषित होने पर राजयक्ष्मा, अन्तः श्वसनीयप्रणाली में व्रण, पित्त अश्मरी, घृणा, जुगुप्सा, हिचकी, पौलिया, श्वास कास, तपेदिक ज्वर का उदय होता है। इसनक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मितव्ययी, बुद्धिमान, अल्पव्ययी (कंजूस भी), विवादी चिन्तनशील, सावधान, तत्पर, आत्मकेन्द्रित क्रमबद्ध, नियमबद्ध, सहनशील, उद्योगशील, स्पष्टभाषी एवं कार्य निपुण होते हैं। अधिकांश जातक बड़े परिवार वाले तथा बृहत् स्रोतों से युक्त होते हैं। इनका मन अस्थिर रहता है। ये भ्रमणशील प्रकृति के होते हैं। कठिन कार्यों को भी दक्षतापूर्वक निपटाने में सफल होते हैं। साधारण सी बात पर चिन्ता करते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी ये साहस नहीं छोड़ते। इनकी आर्थिक स्थिति साधारण ही होती है। ये ईश्वर भक्त एवं दार्शनिक स्वभाव के होते हैं। पुष्य नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक दीर्घायु होते हैं तथा सांसारिक दृष्टि से सफल माने जाते हैं। जब भी शनि इस नक्षत्र पर आता है तो जातक आजीविका एवं सम्पत्ति द्वारा विशेष लाभ पाता है।

✓•९. आश्लेषा यह बुध का नक्षत्र है। कर्क राशि में १६° ४०' से लेकर ३०० तक इसका वर्चस्व है। फुफ्फुस, हृदय, यकृत, प्लीहा, अग्न्याशय, अधोमासनली, हृदय महाशिरा पर इसका प्रभाव जाना जाता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर, श्वास कास वायुगोला आमवात गठिया मन्दाग्नि अपच का रोग होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक बुध और चन्द्रमा के सम्मिलित प्रभाव से युक्त होते हैं। धैर्यहीनता, परिवर्तनशीलता, कल्पनाशीलता, वारियता इनका विशेष गुण होता है ये कार्यकुशल, अनर्गलवक्ता, बहुभाषी, विदूषक, विद्वान, विद्याव्यसनी, संगीत साहित्य कलाविद, स्वार्थी, प्रपञ्ची, मायावी एवं अविश्वसनीय होते हैं। स्वांगरचने, अभिनय करने में ये दक्ष होते हैं। दूसरों की भाषा आसानी से समझ लेते हैं। दूसरों की अनुकृति करने में पटु होते हैं। ये धनवान् यथार्थवादी, स्त्री में लीन, मृदुभोजी, सरस व्यञ्जन प्रिय, हँसमुख, सरल और धूर्त होते हैं।

✓•१०. मघा नक्षत्र...
यह केतु का नक्षत्र है। सिंह राशि का प्रारंभ इसी से होता है। यह सिंह राशि के १३° २०' पर्यन्त फैला हुआ है। इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र पीठ, रीढ़ की हड्डी, हृदयस्पन्दन सुषुम्णा नाड़ी, आमाशय, महाधमनी एवं नाभि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर हृदरोग, हृदय में अत्यधिक एवं अचानक स्पन्दन, ठेस, पीठ में दर्द, उद्रिरण, आमाशयिक व्रण, मूर्छा, पागलपन, भ्रान्ति, शंसय, जठराग्निघ्नता एवं उदरपीड़ा होती है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक स्पष्टवादी, युयुत्सु लड़ाकू, शक्तिशाली, निर्भीक, साहसी निर्लज्ज ढीठ, कामी, अनुरागी बैरागी, अभिमानी दानी, शीघ्रकोपी, शीघ्रतुष्टी, शीघ्रगामी, शीघ्रकर्मी, स्वार्यतत्पर, उच्चाभिलाषी, उष्णप्रकृति, औम, शीघ्रविश्वासी, धनी, कार्यपटु, उत्साही, अविलम्बी, अधिक श्रम न करने वाले, ईश्वरपरायण, न्याय प्रिय, गुप्त कार्यों के प्रति यत्नशील तथा संशयी होते हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य और केतु का सम्मिलित प्रभाव काम करता है। ऐसे जातक अपने से बड़ों के प्रति आदर भाव रखते हैं, एकाएक चोट खाते हैं, उन्नति के मार्ग में बार बार बाधाओं का सामना करते हैं, तेज बोलने वाले एवं चिन्ताग्रस्त मनः स्थिति के होते हैं।

✓•११. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र...
शुक्र का यह नक्षत्र सूर्य की राशि सिंह में १३° २०' से २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। हृदय रीढ रज्जु सुषुम्नानाडी तथा उदरभाग पर इसका विशेष प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दषित होने पर सन्तान कष्ट, विपरीत योनिपीड़ा, स्त्रियों को गर्भाशय का रोग, बार बार गर्भ स्राव, मृतसन्तान, अनियमित अतुधर्म (मासिकस्राव), प्रेम वैफल्य, हदपीड़ा, उदर विकार, अरुचि, रक्ताल्पता, हृदय में सूजन व्रण तथा रक्तचापाधिक्य का रोग होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक उदात्त हृदय, प्रगल्भमन, प्रियदर्शी, हँसमुख, विलासी और आरामप्रिय, कवि, उदार, दीनचित्त, सावधान, सत्यनिष्ठ, शुद्ध, सरल, विनोदी, क्रीडावान्, उद्यमशील, आत्मसंस्थ, भूषाप्रिय, सेनानी सभ्य और सुहृद होते हैं। ये जातक कोमल हृदय, अपराध से डरने वाले, करुणरस बहाने वाले, सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाले, सुभाषित शस्त्र एवं शास्त्र वेत्ता, पशुपालक, सम्मान प्रिय, स्वाभिमानी, शुद्धाचारी एवं विपरीतयोनि की प्रशंसा करने वाले होते हैं। ऐसे जातक प्रेमपथिक तथा पाप से दूर रहते हैं। साहित्य एवं स्वच्छ राजनीति का क्षेत्र इन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त रहता है।

✓•१२. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र...
 इस नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि में २६° ४०' से ले कर पूरा ३०° तक है। इसका शेषतीन चरण कन्या राशि में ०° से १०° तक व्याप्त है। इस नक्षत्र का अधिपति सूर्य है। इस का प्रभाव क्षेत्र रीढ रज्जु का अंतिम भाग, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र एवं कुक्षि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर उदरशूल, पीठदर्द, मस्तिष्कीय उद्घान्ति, मलावरोध, रक्तदूषण, त्वविकार, ज्वर, आत्रपुच्छशोथ का रोग होता है। 

इस नक्षत्र के प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य का सम्पूर्ण प्रभाव होता है तथा इसके अन्य तीन चरणों में पैदाहोने वालों पर सूर्य तथा बुध का संयुक्त प्रभाव रहता है। प्रथमपाद जात व्यक्ति आत्मबलसम्पन्न, उदार चेता, संकीर्णविचारों से दूर रहने वाले तथा नैतिक मापदण्डों पर चलने वाले होते हैं। इनकी स्मरणशक्ति तीव्र होती है तथा ये अल्पभोजी एवं अल्प सन्तानवान् होते हैं। उच्चाभिलाषी, अधिकार प्राप्त, देश भक्त एवं हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। अन्य तीन पादों में पैदा होने पर बुध के प्रभाव से इनमें विद्याध्ययन की प्रवृत्ति पैदा होती है। ये विषय विशेषज्ञ, ज्योतिषी, खगोलज्ञ, गणितज्ञ, वाग्मी, मुखर, अभियन्ता, कूटनीतिज्ञ, कुशाग्रबुद्धि, लेखक, व्यापार प्रवीण तथा निश्च्छल होते हैं। इस नक्षत्र में पैदा होने वालों का दाँत आगे निकला होता है।

✓•१३. हस्त नक्षत्र ...
यह नक्षत्र कन्याराशि में १०° से लेकर २३° २०' तक विस्तार वाला है। इसका स्वामी चन्द्रमा है। छोटी आँत, वृक्क, मूत्राशय पर इसका वर्चस्व है। दूषित होने पर तत्संबंधी अंगों में विकार उत्पन्न होता है। उदर में वायु का भरना, आंतों का उतरना, आँतों में दर्द, आंतों में मल का रुकना, आँतों का शिथिल होना, आंतों में कीड़े पड़ना, अतिसार, आँव, मूत्ररोग, गुर्दे में पथरी होना, रोग इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक में सामान्यतः होते है। बुध की राशि एवं चन्द्रमा के नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक पर इन ग्रहों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है। ऐसे जातक वेदज्ञ, सिद्धान्तशास्त्री, पौराणिक कथाकार, ज्योतिषी होते हैं। इनमें व्यापारिक बुद्धि होती है। ये उद्यमी, कार्यकुशल, चोर, शिल्पी, मद्यप, तरलपदार्थों के शौकीन होते हैं। ऐसे जातक अधिकांशतः कृतघ्नी, कपटी, असत्यवादी, अभिमानी, उत्तरदायित्व न निभाने वाले, गायन प्रेमी, लम्बे कद के होते हैं। ऐसे जातक अधिकतर साधारण जीवन जीने वाले होते हैं। इसमें पैदा हुआ जातक बुद्धिमान् होता है। 

✓•१४. चित्रा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग कन्या राशि में तथा शेष आधा भाग तुला राशि में पड़ता है। कन्या में २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा तुला में ०° से लेकर ६° ४०' तक उत्तरार्ध भाग फैला है। इस का नक्षत्र स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले जातकों पर मंगल एवं बुध का मिश्र प्रभाव रहता है। इसके उत्तरार्ध भाग में जायमान लोगों पर शुक्र एवं मंगल का मिश्र प्रभाव होता है।

 इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र कटि है। इस के दूषित होने पर कमर का दर्द तथा कटिस्थ अंगों में विकार उत्पन्न होता है। मूत्र नलिका में जलन, वृक्क शैथिल्य, उत्तेजना, मस्तिष्क ताप, शिरपीडा, बुक्क अश्मरी, मूत्रावरोध, वस्तिशूल का रोग ऐसे जातकों को प्रायः होता है।

 इसमें पूर्वार्धजात लोग हास्यप्रिय प्रयोगवादी शक्तिवन्त, तीक्ष्ण तर्कशील, असहनशील, साहसी, व्यापारी, उद्यमी वाकुशल, भव्य आकृति एवं बहुकम होते हैं। ऐसे जातक अद्भुतकर्मा, आक्रामक बलिष्ठ, दीर्घकाय तथा सामान्य आर्थिक स्थिति के नायक होते हैं। उत्तरार्धजात लोग श्रृंगारप्रिय, प्रत्यक्षानुमान एवं परीक्षण करने वाले, उत्कृष्ट अभिरुचिवाले आदर्शवादी, उत्तमकर्मक, संगीत प्रेमी तथा मृदुकटु स्वभावाले होते हैं। ये अतिकामुक तथा यौन रोगी होते हैं।

✓•१५. स्वानी नक्षत्र...
राहु का यह नक्षत्र तुलाराशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक विस्तार वाला है। वस्ति भाग पर इस का पूरा नियन्त्रण है। मूत्राशय, मलाशय, शुक्राशय, गर्भाशय पर इसका विशेष प्रभाव है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गर्भाशय में व्रण गर्भस्खलन, बन्ध्यापन का दोष स्त्रियों में होता है। जननेन्द्रिय में अति उत्तेजना वा शिथलन पुरुषों में होता है। मलाशय दोष से शरीर पर चकते पड़ते हैं तथा कुष्ठ होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए जातक संवेदनशील, दयालु, मिलनसार, स्पष्ट भाषी, अन्तर्ज्यानी भविष्यवक्ता, समालोचक विनम्र, भावुक, मदिरादि सेवी, बातचीत के मर्म को समझने वाले तथ्य की गहराई में पहुँचने वाले, साधु, योगी, तपस्वी, यती, चरित्री होते हैं। इनकी अद्भुत स्मरणशक्ति होती है। ये आचारशील विवेकी शुद्धान्तःकरण के होते हैं। ये शीघ्ररुष्ट हो जाते हैं, घुमक्कड़ होते हैं। इन्हें विलम्ब से सफलता मिलती है।

✓•१६. विशाखा नक्षत्र...
 इस नक्षत्र के प्रथम तीन चरण तुलाराशि में २०° से ३०° तक तथा अन्तिम चरण वृश्चिक राशि में ०° से ३° २०' तक फैले हुए हैं। इसका स्वामी गुरु है। जनन और उत्सर्जन अंग इसके अधिकार में हैं। इसके दूषित होने पर मधुमेह का रोग, जिससे चिड़चिड़ापन, चक्कर आना, सुस्ती, आलस्य आता है। गर्भाशय एवं जननेन्द्रिय के रोग, पौरुष ग्रन्थि का शिथिलन, जलोदर, रक्त स्राव, उलझन, घबराहट एवं मोटापा होता है।

 शुक्र की राशि एवं गुरु के नक्षत्र भाग में पैदा होने वाले जातक प्रसन्नवदन, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व, नम्र, आस्थावान्, परम्परावादी, सभ्य, ईश्वर भक्त, न्यायप्रिय, विद्वान् वाक् कुशल, चमकदार एवं स्वच्छ वेश भूषा, लालची, ईर्ष्यालु, अभिमानी एवं शिक्षक होते हैं। ऐसे जातक मनोरंजन प्रिय, रतिप्रिय, सुखी, जीवन के उत्तरार्ध में सफल तथा विश्वसनीय होते हैं।

 मंगल की राशि वृश्चिक में विशाखा के चतुर्थचरण जात लोग उदार, दयालु अतिवादी स्पष्टवादी स्वच्छन्द उत्साही सादगीपसन्द, भद्र, गौरवान्वित अनियंत्रित इच्छाशक्तिवाले, शूर, कूटनीतिज्ञ होते हैं। व्यर्थदोषरोपण एवं छिद्रान्वेषण करते हैं। विचार एवं कार्य दोनों में प्रवीण होते हैं। गुरु के पीड़ित होने पर चोर तथा लड़ाकू होते हैं।

✓•१७. अनुराधा नक्षत्र...
वृश्चिक राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' पर्यन्त इस का प्रस्तार है। इसका स्वामी शनि है। गुह्यांग पर इसका नियन्त्रण है। इसके दूषित होने पर स्त्रियों को मासिक कष्ट होते है। गुदा स्थान में मस्से उभरते हैं। कोष्ठबद्धता, काँच का निकलना, अर्श, वायु प्रकोप, सन्धिवात, सन्निपात तथा तीक्ष्ण दर्द होता है। 

इस नक्षत्र में जयमान लोग दृढनिश्चयी, शुध्वमना, अभियकर, शक्तिवान् अधिकारपूर्ण वाणी से युक्त, स्वार्थी, हिंसात्मक प्रवृत्ति, क्रूर, बलशाली, नीच मनोवृत्ति, मलिन मन, प्रतिशोधी, आक्रामक, पराक्रमी, निर्भीक, शिवभक्त, धैर्यवान्, एकान्तप्रेमी रहस्यपूर्ण, शोधकर्ता, आविष्कारक प्रयोगवादी, गुप्तकार्यों मे लगे रहने वाले, चिन्तनशील, दुर्धर्ष, असामाजिक कृत्यों में लीन हरते हैं। ऐसे जातक स्वधर्म में स्थित तथा प्रशस्त विचार धारा के होते हैं। दर्शनशास्त्र, ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी कार्यों में रुचि रखते हैं। ये जातक अल्पसुखी, चतुराई से काम निकालने वाले तथा मनोश्लेषी होते हैं। आश्चर्यजनक कार्यों को करने वाले ऐसे जातक प्रायः सर्वभक्षी एवं दुःखी बचपन वाले होते हैं।

✓•१८. ज्येष्ठा नक्षत्र....
 यह नक्षत्र वृश्चिक राशि में १६° २०' से ३०° पर्यन्त व्याप्त है। इसका स्वामी बुध है। मलद्वार वृषण, गुप्तांग डिम्बन्धि पर इसका वर्चस्व है। इसके दूषित होने पर गुदा विकृति, अर्शपीड़ा, स्त्रियों में अनियंत्रित मासिक रक्त स्राव, प्रदर कमर दर्द होता है। इस नक्षत्र में बृहस्पति के होने पर नितम्ब वा श्रोणि प्रदेश विस्तृत तथा भव्य होता है। 

इसमें पैदा होने वाले जातक अध्ययन शील, अध्यवसायी, कार्यशील, क्रिया तत्पर, शोधकर्मी, निष्कपट, सरलचित, हास्यप्रधान, तीक्षणबुद्धि, कृच्छ्र स्वभाव, स्पष्टवादी, वाग्युद्धपटु, तर्कशास्त्री, विद्वान होते हैं। सतत काम में लगे रहने वाले प्रयोगवादी मस्तिष्क, वाक्चातुर्य युक्त, तीव्रता से कार्यों का निपटारा करते हैं। ऐसे जातक अतिशयता की सीमा छूने वाले, विकट क्रोधी, प्रख्यात, विजयी, उठाईगीर, ठग, चोर, लुच्चा, धूर्त होते. हैं। वैज्ञानिक रुचि एवं अस्थिर मान्यताओं से युक्त ये दूत का काम करने वाले वा सेनानी होते हैं। ये उच्चस्वर वाले अभिमानी तथा मित्रों के प्रति नम्र रहते हैं। ये कुलविरोधी एवं विघ्नों से सदा घिरे रहते हैं।

✓•१९ मूल नक्षत्र...
 इस नक्षत्र से धनुराशि का प्रारंभ होता है। यह ०° से १३° २०' धनु में फैला है। इसका स्वामी केतु है। दोनों जघन उर्वस्थि, श्रोणि मेखला, नितम्ब का अग्रभाग इसका प्रभाव क्षेत्र है। इसके दूषित होने पर जघन प्रदेश का सौन्दर्य क्षीण होता है। शुभप्रभाव में होने पर पुरुष मल्लयुद्ध के योग्य जंघा वाला तथा स्त्री सुरति प्रवीण होती है।

 इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक उदार, सत्यवान्, आदरणीय, शिष्ट, सदाचारी, अनुशासित, प्रसादचित्त, प्रगल्भ, उच्चाभिलाषी, प्रज्ञावान्, आस्थावान्, चिन्तनशील, देवपूजक, गुरुत्वयुक्त होते हैं। वे प्राचीनता के पोषक, उत्कर्षचेता आशावादी, मन्त्रशक्ति सम्पन्न, अच्छेपरामर्शदाता, क्षमी, लोक हितैषी, धार्मिक अनुष्ठानों पर व्यय करने वाले, अभिमानी, दृढ निश्चयी तथा स्वस्थ होते हैं। मूलजातक सदैव समय का सदुपयोग करते है। गुप्त कार्यों में संलग्न रहते हैं, अभिचार कर्म में दक्ष एवं विरोधियों पर विजय पाने में समर्थ होते हैं।

✓•२०. पूर्वाषाढ नक्षत्र...
 यह धनुराशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। इसका अधिपति ग्रह शुक्र है। यह नक्षत्र जघनतट के सौन्दर्य एवं मादकता की कुञ्जी है। जाँघों की पुष्टता एवं मसृणता पर इसका अधिकार है। इस के दूषित होने पर जाँघें लोमयुक्त एवं अस्निग्ध होती हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले व्यक्ति दूसरों से सम्मानवाने वाले बलकामी, बहुयोनि भोगी, दुर्बलकाय, गायन-वादन-प्रेमी, नाट्यशास्त्री, अभिनेता, स्त्रियों से मान पाने वाले, मानसिक ऊहापोह से युक्त तथा शीघ्र सफलता पाने वाले होते हैं। ये मुक्तहस्त, आवश्यकता से अधिक दानी, भद्र, व्यापक दृष्टिकोण वाले, न्यायी, संवेदनशील, संतुलित, सहनशील, अनुचर, अपव्ययी, अत्याधुनिक, संग्रही, निर्बल हृदय, वचनबद्ध तथा स्वप्रशंसक होते हैं।

✓•२१. उत्तराषाढ नक्षत्र...
सूर्य के स्वामित्व वाला यह नक्षत्र अपने प्रथम चरण से धनराशि को २६° ४०' से ३०° तक तथा अपने शेष तीन चरणों से मकरराशि को ०° से १०° तक व्याप्त किये है। इसका प्रभाव क्षेत्र जानु घुटना है। इसके दूषित होने पर घुटने का दर्द होता है। गठिया, संधिवात जानु अस्थिघात होता है। चक्षुपीड़ा, हृदय रोग, उदर रोग, फुफ्फुसरोग, शीतपित्त, छाती में दर्द, अस्थिज्वर, चर्मरोग, कुष्ठ एवं क्षय होता है। सूर्य का नक्षत्र होने से ये रोग सूर्य की निर्बलता के कारण होते हैं।

 इसके प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातक सूर्य और गुरु के प्रभाव के कारण प्रायः अध्ययनशील, कठिन विषयों के ज्ञाता, महत्वाकांक्षी जीवन के अभिलाषी, पुष्ट शरीर, श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त होते हैं। शेष तीन वरणों में पैदा होने वाले सूर्य और शनि के मिश्र प्रभाव के कारण कूटनीतिज्ञ, निम्नस्तर का आचरण करने वाले, प्रशासन में दक्ष, योजनबद्ध ढंग से काम करने वाले, आलोचनाप्रिय एवं वैज्ञानिक प्रतिभा के धनी होते हैं। ये आलसी और दीर्घसूत्र होकर भी दूसरों को उपदेश करते हैं।

✓•२२. श्रवण नक्षत्र....
 इसका स्वामी चन्द्रमा है। यह मकरराशि में १०° से लेकर २३°२०' तक व्याप्त है। जानु और उसकी गति का यह नियन्त्रक है। इसके दोष युक्त होने पर घुटने की गतिशीलता क्षीण होती है, सूजन आती है। चन्द्रमा का नक्षत्र होने से हाथी पाँव का रोग होता है। शनि की राशि में स्थित होने से सन्निपात, सन्धिपात, शीतज्वर, वायुगुल्म, क्षय का प्रकोप होता है। चित्तविक्षेप, स्मरण हास, गहन चिन्ता का रोग चन्द्रमा के निर्बल होने से होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मनस्वी, महिमामय, घोर उदात्त, सचेत, अतिवादी, आशंकित, विनोदी, हास्य प्रिय, बुद्धिमान् एवं विचारशील होते हैं। इनमें साहस की कमी होती है, व्यर्थ के कार्यों में लगे रहते हैं, कार्यों को टालते रहते हैं तथा बाद में पश्चाताप करते हैं। ये सहनशील, विष्णु के भक्त, अद्भुत धारणाशक्ति रखते हैं, आश्चर्यचकित करने वाले कार्य करते हैं। ये प्रसिद्ध होते हैं तथा सुन्दर साथी का वरण करते हैं। ये चंचल, मातृपितृ पूजक, अच्छे भोजन के शौकीन तथा शरीर से स्वस्थ होते हैं। शनि के क्षेत्र में होने से श्रवणजात लोग लालची, नीचमनोवृत्ति दोषदर्शी, चिड़चिड़े होते हैं ये विद्वान् होकर भी दुःखी होते हैं।

✓•२३. धनिष्ठा नक्षत्र...
 इस नक्षत्र का पूर्वार्ध मकर राशि में २३° २०' से लेकर ३०° तक तथा उत्तरार्ध कुम्भराशि में से ६° ४०' पर्यन्त फैला है। नक्षत्र स्वामी मंगल है। घुटना और उसके नीचे का भाग इसके प्रभाव क्षेत्र ० में है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर घुटने में व्रण बोट होने से लंगड़पन होता है। पूर्वार्धजात जातक अधिकांशतः अदूरदर्शी, उन्नति में व्यवधानपाने वाले शोचनीय आर्थिक स्थिति में रहने वाले श्रम एवं संघर्ष से उन्नति को प्राप्त होने वाले, स्त्री प्रेमी, क्रोधी, अभिमानी, लोहकर्मी, वाहन चालक, चालाक, घोर स्वार्थी, अवीर्यवान्, अपशब्दों का प्रयोग करने वाले, असंयत तथा पशुपालक होते हैं। उत्तरार्धजात जातक शीघ्रकोपी, शीघ्र उतेजित होने वाले वादविवाद करने वाले झगड़ालू, कार्य तत्पर, वैज्ञानिक मस्तिष्क, अनुसंधित्सु तकनीकी कार्यों में निपुण, परिश्रमी तथा तीव्र स्वरोच्चार करने वाले होते हैं। ये हृष्टपुष्ट, अध्यवसायी, व्यस्त मनोवृत्ति तथा गम्भीर होते हैं। अपने को धनी दिखाने की चेष्टा में ये दान भी देते हैं।

✓•२४. शतभिषा नक्षत्र ...
इसका स्वामी राहु है। यह नक्षत्र कुम्भराशि में ६° ४०' से लेकर २०° पर्यन्त व्याप्त है। घुटने तथा ऐड़ी के बीच के भाग पर इसका प्रभाव आँका जाता है। इसके दूषित होने पर टाँगों में दर्द या टाँग की क्षति होती है। टोंग की पेशियाँ अशक्त वा ढीली पड़ जाती हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर शनि और राहु का मिश्र प्रभाव होता है। ऐसे जातक अच्छी सूझबूझवाले तेजतर्रार मौलिक विचारधारा के धैर्यवान, अध्यवसायी, अतिवादी, उप, आलसी, अकर्मण्य, तंद्रिल, आरामपसन्द, सुस्त, ऐकान्तिक, प्राचीनता के पोषक, कूटनीतिज्ञ, छिद्रान्वेषी, भुलक्कड़, तृष्णालु होते हैं। अधिकतर ये सेवाकर्मी बिना सोचविचार के कार्य में जुट जाने वाले तथा मशीनी एवं तकनीकी कार्यों में रुचि लेने वाले होते हैं। ये प्रकृतितः उच्चविचार वाले, साधुसेवी, कट्टरपंथी, अहंकारी, हठी तथा अद्भुतकल्पनाशील होते हैं।

✓•२५. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र...
इसनक्षत्र के प्रथम तीन चरण कुम्भराशि में २०° से ३०° पर्यन्त तथा शेष चौथा चरण मीन राशि में ०° से ३°२०' पर्यन्त व्याप्त रहता है। इस नक्षत्र का अधिपति गुरु है। टाँग का निचला भाग, टखने है एवं ऐड़ी का ऊपरी भाग इस के प्रभाव में रहते हैं। इसके दूषित होने पर रखने की हड्डी में मोच, सूजन तथा गतिविक्षेप होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक शनि और गुरु के प्रभाव में रहते हैं। प्रथमतीन चरणों के अन्तर्गत जन्मने वाले अधिकांश लोग ईश्वरभक्त, स्त्रियों से संकोच करने वाले, आराम पसन्द, पूजापाठ में लीन रहने वाले होते हैं। ये अनायास सफलता प्राप्त करते हैं, वृद्धावस्था में अकस्मात् धन प्राप्त करते हैं। ये यात्राप्रिय, कवि, लेखक विधिज्ञ एवं सतर्क होते हैं। शिक्षण कार्य में विशेष रुचि होती है। ये मानवतापूर्ण व्यवहार करते हैं, आशावान् दार्शनिक ज्योतिषी वैयाकरण निस्स्वार्थी उदात्त हृदय शास्त्री एवं अनुशासित होते हैं। इस नक्षत्र पर बुरा प्रभाव होने पर ये नास्तिक, वेश्यागामी अशान्त एवं क्रूर जीवन जीते हैं। इस नक्षत्र के चौथे चरण में पैदा होने वाले दया की मूर्ति, महादानी, करुणासागर, ज्ञानी, सत्यव्रती, प्रियदर्शी, विनम्र, शुद्धात्मा तथा शान्तचित्त होते हैं। ये आजीविका के लिये सम्मानप्रद व्यवसाय का चयन करते हैं।

✓•२६. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र...
 इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह नक्षत्र मीन राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। इसका अधिकार पाँव के ऊपरी भाग पर है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर नक्षत्रस्वामी शनि से संबंधित शारीरिक विकृतियाँ प्रकट होती हैं। सन्धिवात, स्नायुदौर्बल्य, उदरवायु कोप, आंत्रच्युति, सूखारोग, शीत, नर्सों का उभरना तथा पाँव में चोट लगती है। 

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक शनि और गुरु के मिश्र गुणों से बने हुए होते हैं। अधिकांश जातक प्रसन्नचित्त, उन्नति के पथ पर अग्रसर होने वाले, स्त्रियों द्वारा मान पाने वाले, अकस्मात् हानि उठाने वाले, शत्रुओं से घिरे हुए, दैनन्दिन कार्यो में तन्द्रालु, विद्याव्यसनी, उच्चाचार युक्त एवं समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। ये दृढ़ चरित्र, उदार, मुक्तहस्त, सुरूप, निरपेक्ष चिन्तक, दीनसेवी होते हैं। धर्मशास्त्र के ज्ञाता, अर्थ सञ्चय में कुशल, बलिष्ठ और मध्यम काय होते हैं। पुरातात्विक खोजों में ये विशेषरुचि रखते हैं। ये शिथिल कर्मी तथा अभियन्त्रविद् होते हैं।

✓•२७. रेवती नक्षत्र...
 यह बुध का नक्षत्र है। मीनराशि में १६° ४०' से लेकर ३०° तक यह फैला है। इसका प्रभाव क्षेत्र पादतल, पादांगुलियाँ, पादांगुष्ठ एवं ऍड़ी का अधोभाग है। यह विकृत वा दूषित होने पर पादतल में बेवाई पैदा करता है, काँटे गड़ते हैं, पैर समाट होता है, जातक तेज दौड़ नहीं पाता। पाँव फूलता है, पाँव टेढ़ा होता है।

  इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक बुध एवं गुरु के मिश्र प्रभाव के कारण सात्विक वृत्ति के होते हैं। सरल स्वभाव, विद्यावान् गुणवान् धनवान् चरित्रवान् तथा द्युतिमान् होते हैं। ये द्विस्वभावी द्वैधी वा संशयी होते हैं। इनमें आध्यात्मिक शक्ति का एकाएक वा शीघ्र प्रस्फुटन होता है। ये चतुरता निकालने वाले, परिपक्व विचार वाले, निर्णय लेने के पूर्व बारम्बार सोचने वाले, तथा शुभेच्छु होते हैं। स्वामीभक्त, राष्ट्र भक्त निर्लज्ज तथा पूर्वानुमान में कुशल होते हैं। लेखन क्रीडन प्रकाशन अध्यापन में इनकी वृत्ति सहज होती है।

रविवार, 4 जनवरी 2026

🍁 प्राणायाम 🍁

🍁 प्राणायाम 🍁
संकल्प रामराज्य चैनल द्वारा शास्त्र सम्मत व्याख्या👉

एकाक्षरं परं ब्रह्म, प्राणायामाः परं तपः । – मनुस्मृति २.८३

एक अक्षर (ॐ) ही (ब्रह्म प्राप्ति का साधन होने से) सर्वश्रेष्ठ है, तीन प्राणायाम ही (चान्द्रायण आदि व्रतों से भी) श्रेष्ठ तप है।

प्राण + आयाम =

प्राण (प्र + अन् + अच्) = श्वास, जीवनशक्ति, जीवनदायी वायु अर्थात् वायु या प्राणवायु, अन्दर खींचा हुआ साँस, ऊर्जा, बल, शक्ति, सामर्थ्य, परमात्मा, ब्रह्म, ज्ञानेन्द्रिय, जीव या आत्मा आदि।

आयाम (आ+यम्) = प्रसार, विस्तार, फैलाना, विस्तार करना, निग्रह, नियंत्रण, रोकथाम आदि।

अतः प्राणायाम का अर्थ हुआ अन्दर खींचे हुए प्राणवायु को प्रसार या विस्तार देना अर्थात् प्राण (श्वास) का आयाम (नियंत्रण)।

ऐतरेयोपनिषद् १.४ में इंद्रिय और इंद्रिय अधिष्ठाता देवताओं की उत्पत्ति के संदर्भ में आया है : “नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी…।” अर्थात् नासिकारंध्र प्रकट हुए, नासिकारंध्रों से ‘प्राण’ हुआ और प्राण से वायु।

तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥
– बृहदारण्यक उपनिषद् ३.९.९

शाकल्य ने प्रश्न किया – कहते हैं जो वायु है, एक सा ही बहता है, फिर अध्यर्ध (डेढ़) किस प्रकार है?
याज्ञवल्क्य : क्योंकि इसी में यह सब ऋद्धि (वृद्धि) को प्राप्त होता है।
शाकल्य ने पुनः प्रश्न किया – एक देव कौन है?
याज्ञवल्क्य : प्राण ही एक देवता है, वह ब्रह्म है, उसी को ‘तत्’ (वह) कहते हैं।

प्राणों की इन सभी विशिष्टताओं को ध्यान में रख कर ही ऋषि ने भाव विभोर हो कर यह प्रार्थना की है –

नसोर्मे प्राणोऽस्तु। – पारस्कर गृह्यसूत्र २.३.२५

हे ईश्वर! मेरी नासिका में सदा प्राणों की अवस्थिति रहे।

प्राणायाम के तीन भेद हैं – १. पूरक (श्वास को भीतर ले जाकर फेफड़े को भरना) २. कुम्भक (श्वास को भीतर रोकना) और ३. रेचक (श्वास को बाहर निकालना)।

यथा पर्वतधातुनां दोषान् हरति पावकः ।
एवमन्तर्गतं पापं प्राणायामेन दह्यते ॥

जिस प्रकार पर्वत से निकले धातुओं का मल अग्नि से जल जाता है, उसी प्रकार प्राणायाम से आंतरिक पाप जल जाता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार इसकी व्याख्या :
आधुनिक विज्ञान के अनुसार विशाल से विशालतम शरीर क्षुद्र से क्षुद्रतम कोशिकाओं से निर्मित है। यह ऐसा ही है जैसे मधुमक्खी का छत्ता। इन कोशिकाओं का आकार अत्यंत सूक्ष्म होता है। जैसे तर्कुरूपी पेशी-कोशिका ६० से १०० माइक्रॉन तक लंबी होती है।

इन कोशिकाओं को ऊर्जा प्राप्ति हेतु ग्लूकोज के विखण्डन के लिये प्रतिक्षण प्राण या प्राणवायु की आवश्यकता होती है। सोते समय स्थिर दिखने वाली पेशी कोशिकाएँ (muscular cells) भी भूख, प्यास से बेहाल होकर ऊष्मा ऊर्जा की प्राप्ति के लिये लगातार खाती, साँस लेती तथा मल उत्सर्जन करती हैं। इस प्रकार विश्व के प्रत्येक प्राणी की प्रत्येक कोशिका को जिस चीज की प्रतिक्षण समान रूप से आवश्यकता है, वह है – प्राण।

एक कोशकीय अमीबा (amoeba) जैसे प्राणी को इसे ग्रहण करने में बड़ी सुविधा है। वह अपने चारों ओर से कहीं से भी इसे परासरण (osmosis) क्रिया द्वारा इसे प्राप्त कर सकता है तथा विसरण (diffusion) द्वारा अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकल सकता है। 

किन्तु हमारे शरीर में कोशिकाओं का समूह किसी विशाल बस्ती के सदृश है जहां स्वच्छ वायु तथा जल के लिए अलग और अपशिष्ट पदार्थों के लिए अलग व्यवस्था होती है। जहां पोषक आहार ग्लूकोज आदि को ‘रक्तरस’ (plasma) के रूप में नालियों द्वारा भेजा जाता है। किन्तु प्राण वायु का इस रक्तरस में विलयन बहुत कम हो पता है। अतः इसके लिए उभयावतल डिस्क जैसी या चकती जैसी रक्त-कणिकाएँ (red blood corpuscles) रूपी छोटे-छोटे डिब्बों में बंद करके इसी रक्त में तैराकर धमनी (artery) धमनिका (arteriole) तथा केशिकाओं (capillary) रूपी बंद नालियों के द्वारा तैराकर अंतिम छोर की कोशिकाओं तक पहुँचाया जाता है। इन नलिकाओं तथा कणिकाओं की लघुता अत्यंत विस्मयजनक है। धमनिका का व्यास लगभग ०.०१ मिलीमीटर या १० माइक्रॉन (एक मिलीमीटर का सौवाँ भाग) तक होता है। इसके अंदर लगभग ०.००७ मिलीमीटर या ७-८ माइक्रॉन व्यास की रक्त-कणिकाएँ अपने डिब्बे में प्राणवायु को लेकर तैरती हैं। इनकी लघुता का अनुमान आप ऐसे लगा सकते हैं कि एक घन मिलीमीटर रक्त में इन कोशिकाओं की संख्या लगभग ५० लाख होती है। अर्थात् यदि शरीर में ३ लीटर रक्त है तो इसमें १५ खरब कणिकाएँ समाती हैं जिन्हें प्राण फफड़ो से मिलता है और इन्हें पूरे शरीर में पहुँचाने के लिए हृदय को जीवन भर निरन्तर प्रति मिनट औसतन ७० बार आकुंचन करते हुए प्रति आकुंचनों के बीच ०.४ सेकेण्ड का समय विश्राम के नाम पर मिलता है।

फेफड़े में सामान्यतः ३०० से ४०० करोड़ वायुकोष्ठक (alveoli) होते हैं। इनके चारों ओर रक्तकोशिकाओं का अत्यंत घना जाल बिछा रहता है। इन वायुकोष्ठकों से ऑक्सीजन का रुधिर में तथा रुधिर की कार्बन डाइ ऑक्साइड का वायुकोष्ठकों में विसरण होता रहता है। सामान्य श्वास-प्रश्वास के समय बहुत कम वायुकोष्ठक ही वायु से भरते हैं जो सामान्य चर्या के लिए तो ठीक है किन्तु प्राणायाम के उपाय से रुधिर को अधिकतम ऑक्सीजन उपलब्ध होती है तथा इसकी अधिकतम मलिनता दूर होती है। इससे रुधिर का रंग अतिस्वच्छ लाल हो जाता है तथा यह शरीर की प्रत्येक कोशिका को अधिकतम ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम हो जाता है।

निष्कर्ष :-----
शास्त्रों के अनुसार विचार करें अथवा आधुनिक विज्ञान के अनुसार, उपरोक्त तथ्यों से इस बात की पुष्टि होती है कि प्राणायाम करने से शरीर को ‘प्राण’ के रूप में अतिरिक्त ऊर्जा का लाभ मिलता है जिससे लंबी आयु भी मिलती है। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि प्राणायाम करने से पाप-ताप तो जल ही जाते हैं, शारीरिक उन्नति भी अद्भुत ढंग से होती है। हजारों वर्ष की लंबी आयु भी इससे मिल सकती है। सुन्दरता और स्वास्थ्य के लिए तो यह मानो वरदान ही है।

गच्छंस्तिष्ठन् सदा कालं वायुस्वीकरणं परम् ।
सर्वकालप्रयोगेण सहस्रायुर्भवेन्नरः ॥